सुपरमार्केट से खरीदे गए दूध के एक पैकेट की कीमत में केवल डेयरी फार्म पर दूध दुहने का काम शामिल नहीं होता। कच्चे दूध को ढोना, उसे पाश्चुरीकृत करके पैक करना, प्रशीतित ट्रक से दुकान तक पहुँचाना, विज्ञापन करना और खराब उत्पाद बदलकर देना—ऐसी अनगिनत गतिविधियाँ उस कीमत में समाई होती हैं। कोई कंपनी ग्राहक तक मूल्य पहुँचाने के लिए जिन गतिविधियों से गुजरती है, उनके आपसी जुड़ाव को एक शृंखला के रूप में देखने का साधन ही ‘मूल्य शृंखला (Value Chain)’ है।
सरल शब्दों में, मूल्य शृंखला का अर्थ है ‘कंपनी के काम को गतिविधियों की छोटी-छोटी इकाइयों में बाँटकर यह देखने का ढाँचा कि किस चरण में मूल्य पैदा होता है और किस चरण में लागत के रूप में पैसा व्यर्थ खर्च होता है।’ हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल के माइकल पोर्टर (Michael Porter) ने 1985 में अपनी पुस्तक ‘प्रतिस्पर्धात्मक लाभ (Competitive Advantage)’ में इसे पहली बार व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया था।
इस सामग्री में हम क्रम से मूल्य शृंखला की मूल अवधारणा, गतिविधियों को बाँटने के तरीके, वास्तविक कंपनियों के उदाहरण, और इस विश्लेषण के उपयोग तथा सीमाओं पर विचार करेंगे।
गतिविधियों को हिस्सों में बाँटकर प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता समझने का तरीका
मूल्य शृंखला क्या है?

पोर्टर का मानना था कि कंपनी को एक समग्र इकाई के रूप में देखने पर उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के स्रोत स्पष्ट नहीं दिखते। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि कच्चा माल आने से लेकर तैयार उत्पाद ग्राहक तक पहुँचने की प्रक्रिया को कई गतिविधियों में बाँटकर देखा जाए कि प्रत्येक गतिविधि लागत और मूल्य में कितना योगदान देती है।
(1) गतिविधियों की इकाइयों के आधार पर देखते हैं
मूल्य शृंखला में विभाजन विभागों के बजाय गतिविधियों के आधार पर किया जाता है। एक ही बिक्री विभाग के भीतर भी ऑर्डर लेना और ग्राहकों को परामर्श देना अलग-अलग गतिविधियाँ मानी जा सकती हैं।
(2) लक्ष्य मार्जिन बचाना है
ग्राहक द्वारा चुकाए जाने वाले कुल मूल्य में से सभी गतिविधियों पर आई लागत घटाने के बाद बची राशि को ‘मार्जिन (Margin)’ कहते हैं। पोर्टर के आरेख में शृंखला का सिरा तीर की तरह नुकीला होने का कारण भी इसी मार्जिन को दर्शाना है।
(3) व्यावसायिक इकाई के स्तर पर शृंखला बनाते हैं
पोर्टर का मानना था कि मूल्य शृंखला पूरी कंपनी के बजाय प्रत्येक व्यावसायिक इकाई के स्तर पर बनानी चाहिए। ऐसा इसलिए है कि कई व्यवसायों को एक साथ जोड़ देने पर प्रत्येक व्यवसाय की खूबियाँ और कमियाँ एक-दूसरे की आड़ में छिप जाती हैं।
प्राथमिक गतिविधियाँ और सहायक गतिविधियाँ

मूल्य शृंखला में पाँच ‘प्राथमिक गतिविधियाँ (Primary Activities)’ होती हैं, जिनसे उत्पाद सीधे होकर गुजरता है, और चार ‘सहायक गतिविधियाँ (Support Activities)’ होती हैं, जो पीछे से इन्हें सहारा देती हैं। पहले प्राथमिक गतिविधियाँ इस प्रकार हैं।
- आवक रसद (Inbound Logistics): कच्चा माल और पुर्जे प्राप्त करना, उनका भंडारण करना और उन्हें उत्पादन स्थल तक पहुँचाना।
- संचालन (Operations): कच्चे माल को तैयार उत्पाद या सेवा में बदलने वाली उत्पादन गतिविधियाँ।
- जावक रसद (Outbound Logistics): तैयार उत्पादों का भंडारण करना और उन्हें ग्राहकों तक पहुँचाना।
- विपणन और बिक्री (Marketing and Sales): ग्राहकों को उत्पाद के बारे में बताना और उन्हें उसे खरीदने के लिए प्रेरित करना।
- सेवा (Service): स्थापना, मरम्मत और उत्पाद बदलने जैसी गतिविधियाँ, जो बिक्री के बाद भी उत्पाद का मूल्य बनाए रखती हैं।
सहायक गतिविधियाँ किसी एक चरण तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरी शृंखला में काम करती हैं।
- कंपनी का आधारभूत ढाँचा (Firm Infrastructure): योजना, वित्त, लेखांकन और कानूनी कार्य जैसी व्यवस्थाएँ, जो पूरी कंपनी को आधार देती हैं।
- मानव संसाधन प्रबंधन (Human Resource Management): लोगों की भर्ती करना, उन्हें प्रशिक्षण देना और पारिश्रमिक व पुरस्कार देना।
- प्रौद्योगिकी विकास (Technology Development): उत्पादों और प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने वाला अनुसंधान और व्यावहारिक तकनीकी ज्ञान।
- खरीद (Procurement): बाहर से कच्चा माल, उपकरण और सेवाएँ खरीदने की गतिविधियाँ।

उदाहरणों से समझें मूल्य शृंखला

मूल्य शृंखला दिखाती है कि कंपनी कहाँ पैसा बचाती है और कहाँ मूल्य पैदा करती है।
[उदाहरण 1] आइकिया के चपटे डिब्बे
फर्नीचर आकार में बड़ा होता है, इसलिए उसे ढोने में अधिक खर्च आता है और ढुलाई के दौरान उसके क्षतिग्रस्त होने की आशंका भी रहती है। आइकिया (IKEA) ने 1950 के दशक से फर्नीचर को अलग-अलग हिस्सों में चपटे डिब्बों में पैक करना शुरू किया और उसे जोड़ने का काम ग्राहकों पर छोड़ दिया। इससे जावक रसद में खाली जगह ढोने की बर्बादी कम हुई और जोड़ने की लागत ग्राहकों पर डालकर कम कीमत के रूप में मूल्य पैदा किया गया।
[उदाहरण 2] मुस्कुराते चेहरे का वक्र
लगभग 1992 में ताइवान की एसर (Acer) के संस्थापक स्टैन शिह (Stan Shih) ने ध्यान दिया कि पर्सनल कंप्यूटर उद्योग में अनुसंधान एवं विकास तथा ब्रांड और सेवाओं जैसे शृंखला के दोनों सिरों पर मूल्य संवर्धन अधिक होता है, जबकि बीच के संयोजन और उत्पादन में कम होता है। इसे ग्राफ पर दिखाने से मुस्कुराते मुँह का आकार बनता है, इसलिए इसे ‘स्माइलिंग कर्व (Smiling Curve)’ कहा जाता है। इस अवलोकन के आधार पर एसर ने अनुसंधान एवं विकास तथा अपने ब्रांड के विपणन पर ध्यान केंद्रित किया।
मूल्य शृंखला विश्लेषण के उपयोग और सीमाएँ

मूल्य शृंखला विश्लेषण प्रतिस्पर्धात्मक रणनीति बनाने का शुरुआती आधार बनता है।
(1) लागत घटाने की गुंजाइश तलाशते हैं
प्रत्येक गतिविधि की लागत अलग-अलग निकालने पर वे गतिविधियाँ सामने आती हैं जिन पर प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक खर्च हो रहा है। इन गतिविधियों में सुधार करके या उन्हें बाहरी पक्ष को सौंपकर लागत में बढ़त हासिल की जा सकती है।
(2) अलग पहचान बनाने के अवसर तलाशते हैं
ग्राहक जिन गतिविधियों को विशेष रूप से मूल्यवान मानते हैं, उन्हें पहचानकर वहाँ संसाधन केंद्रित करने से प्रतिस्पर्धियों से अलग मूल्य पैदा किया जा सकता है।
(3) गतिविधियों के बीच जुड़ाव देखते हैं
पोर्टर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अलग-अलग गतिविधियों से अधिक महत्वपूर्ण उनके आपस में जुड़ने का तरीका हो सकता है। डिज़ाइन के चरण में पुर्जों की संख्या घटाने से संयोजन और मरम्मत दोनों का आसान होना इसका अच्छा उदाहरण है।
(4) यह हर उद्योग पर पूरी तरह लागू नहीं होती
मूल्य शृंखला का ढाँचा कच्चे माल को क्रमिक रूप से संसाधित करने वाले विनिर्माण उद्योग को आधार बनाकर बनाया गया था। 1998 में चार्ल्स स्टैबेल (Charles Stabell) और ऑयस्टाइन फ़्येल्डस्टाड (Øystein Fjeldstad) ने सुझाव दिया कि अस्पतालों या परामर्श कंपनियों जैसे ग्राहकों की समस्याएँ सुलझाने वाले उद्यमों को ‘मूल्य केंद्र (Value Shop)’ और बैंकों या दूरसंचार कंपनियों जैसे ग्राहकों को आपस में जोड़ने वाले उद्यमों को ‘मूल्य नेटवर्क (Value Network)’ के रूप में देखा जाना चाहिए।
मूल्य शृंखला दिखाती है कि किसी कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता अनेक गतिविधियों के आपसी तालमेल का परिणाम है, किसी एक विभाग की प्रतिभा का नहीं। आज इस अवधारणा का विस्तार ‘वैश्विक मूल्य शृंखला (Global Value Chain)’ तक हो गया है, जिसमें किसी उत्पाद का डिज़ाइन, पुर्जों का उत्पादन और संयोजन अलग-अलग देशों में फैला होता है; इसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय व्यापार को समझाने में भी किया जाता है।
अपनी कंपनी की शृंखला को एक-एक कड़ी खोलकर सामने रखना और ईमानदारी से देखना कि कहाँ मूल्य पैदा होता है और कहाँ उसका क्षय होता है—यही टिकाऊ प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देने वाली रणनीति का पहला कदम है।