पुस्तकालय में जाने पर पुस्तकें विषय के अनुसार करीने से रखी मिलती हैं। खोज केंद्र पर अपनी मनचाही पुस्तक का स्थान पता करने के बाद आप अलमारियों के बीच घूमते हुए अपनी इच्छा से पुस्तकें निकालकर पढ़ सकते हैं। आज यह स्वाभाविक लगता है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब बहुमूल्य पुस्तकों को ज़ंजीरों से मेज़ों से बाँधकर रखा जाता था। आज के पुस्तकालयों के इस खुले स्वरूप की बुनियाद में पाँच पंक्तियों के छोटे-से सिद्धांत हैं। इन्हें ही ‘पुस्तकालय विज्ञान के 5 नियम (Five Laws of Library Science)’ कहा जाता है।
सरल शब्दों में, पुस्तकालय विज्ञान के 5 नियम वे ‘बुनियादी सिद्धांत हैं जो पाँच वाक्यों में बताते हैं कि पुस्तकालय किसके लिए और किस उद्देश्य से मौजूद है।’ भारत के गणितज्ञ और पुस्तकालयाध्यक्ष एस. आर. रंगनाथन (S. R. Ranganathan) ने इन्हें 1931 में ‘The Five Laws of Library Science’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था। आज भी इसे पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के विद्यार्थियों द्वारा सबसे पहले पढ़े जाने वाले शास्त्रीय ग्रंथों में गिना जाता है।
इस सामग्री में रंगनाथन के परिचय और पाँच नियमों के अर्थ से लेकर पुस्तकालयों के व्यावहारिक कामकाज में प्रत्येक नियम के स्वरूप तथा डिजिटल युग में इन नियमों को नए सिरे से समझने के तरीकों तक, सभी बातों को क्रम से समझाया गया है।
पुस्तकालय विज्ञान के 5 नियम: पुस्तकालय को निभाने चाहिए ये पाँच वचन
रंगनाथन और पाँच वाक्य


रंगनाथन (1892~1972) मूलतः विश्वविद्यालय में गणित पढ़ाने वाले प्राध्यापक थे। 1924 में भारत के मद्रास विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के पहले पुस्तकालयाध्यक्ष नियुक्त होने के बाद उन्होंने ब्रिटेन के लंदन में पुस्तकालय विज्ञान का अध्ययन किया। वापस लौटकर उन्होंने अपना पूरा जीवन पुस्तकालय संचालन और वर्गीकरण के शोध को समर्पित कर दिया। उनके निर्धारित पाँच नियम इस प्रकार हैं।
- नियम 1 (Books are for use): पुस्तकें उपयोग के लिए हैं।
- नियम 2 (Every reader his book): प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक मिले।
- नियम 3 (Every book its reader): प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक मिले।
- नियम 4 (Save the time of the reader): पाठक का समय बचाएँ।
- नियम 5 (The library is a growing organism): पुस्तकालय एक वर्धनशील जीव है।
इसके अलावा उन्होंने कोलन वर्गीकरण पद्धति (Colon Classification) विकसित करके वर्गीकरण सिद्धांत पर गहरा प्रभाव डाला। भारत में उन्हें पुस्तकालय विज्ञान के जनक के रूप में याद किया जाता है, और उनके जन्मदिन, महीने 8 की 12 तारीख, को पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है।
पुस्तकों और पाठकों को जोड़ने वाले तीन नियम

पहले तीन नियम पुस्तकों और पाठकों के संबंध को अलग-अलग दिशाओं से देखते हैं।
(1) पुस्तकें उपयोग के लिए हैं
पुस्तकों को सहेजने की भावना हद से बढ़ जाए तो उनके उपयोग से अधिक प्राथमिकता उनके संरक्षण को मिलने लगती है। रंगनाथन का मानना था कि पुस्तकों को बाँधकर रखने या भीतर छिपाकर रखने के बजाय, पुस्तकालय का स्थान, खुलने का समय, फर्नीचर और पुस्तकालयाध्यक्ष का व्यवहार तक उपयोग को केंद्र में रखकर तय किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी आसानी से आकर पढ़ सके।
(2) प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक मिले
पुस्तकालय को सामाजिक स्थिति, उम्र, लिंग या निवास स्थान की परवाह किए बिना हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता की पुस्तकें उपलब्ध करानी चाहिए। यह नियम बच्चों, बुज़ुर्गों और दूर रहने वाले निवासियों के लिए सेवाओं की तरह उन प्रयासों का आधार है, जिनमें पुस्तकालय स्वयं विभिन्न उपयोगकर्ताओं तक पहुँचता है।
(3) प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक मिले
दूसरी ओर, अलमारियों में रखी प्रत्येक पुस्तक को भी ऐसा पाठक मिलना चाहिए जो उसे पढ़े। उपयोगकर्ताओं को स्वयं अलमारियों में पुस्तकें देखने देने वाली मुक्त प्रवेश व्यवस्था, नई आई पुस्तकों की प्रदर्शनी और विषय के अनुसार पुस्तकों की व्यवस्था जैसे तरीके इसके अंतर्गत आते हैं, जो अनपढ़ी पड़ी पुस्तकों को पाठकों के सामने लाते हैं।
समय बचाने और साथ-साथ बढ़ने वाला पुस्तकालय

अंतिम दो नियम पुस्तकालय के काम करने के तरीके और लंबे समय तक बने रहने के तरीके से संबंधित हैं।
नियम 4: पाठक का समय बचाएँ
- वर्गीकरण और आह्वान संख्या (Classification): एक ही विषय की पुस्तकों को एक जगह रखकर मनचाही पुस्तक जल्दी ढूँढ़ने में मदद करते हैं।
- सूची और खोज (Catalog): सभी अलमारियों में घूमे बिना ही पुस्तक का स्थान और उसके उधार दिए जाने की स्थिति तुरंत जानने में मदद करते हैं।
- मार्गदर्शन और संकेतक (Signage): सामग्री कक्ष का नक्शा और अलमारियों के संकेतक भटकने में लगने वाला समय घटाते हैं।
पुस्तकें उधार लेने की जटिल प्रक्रियाओं को कम करना और उपयोगकर्ताओं को देर तक प्रतीक्षा न करवाना भी इसी नियम से जुड़ा है।
नियम 5: पुस्तकालय एक वर्धनशील जीव है
समय के साथ पुस्तकालय की पुस्तकों, उपयोगकर्ताओं और कर्मचारियों की संख्या बढ़ती है। इसलिए शुरुआत से ही अलमारियों और भवन में अतिरिक्त जगह रखनी चाहिए, और वर्गीकरण प्रणाली भी ऐसी बनानी चाहिए जिसमें नए विषय शामिल किए जा सकें। जिस तरह कोई जीव पुराने कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएँ लाता है, उसी तरह जिन सामग्रियों की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है, उन्हें चुनकर संग्रह से हटाना (Weeding) भी स्वस्थ विकास का हिस्सा है।
डिजिटल युग में 5 नियमों का पुनर्पाठ

इन पाँच नियमों को सामने आए 90 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, फिर भी पुस्तक की जगह सूचना और पुस्तकालय की जगह ऑनलाइन सेवा रखकर पढ़ने पर ये आज भी पूरी तरह लागू होते हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक संसाधन (E-resources): यदि सामग्री उपयोग के लिए है, तो चाहे वह कागज़ पर हो या स्क्रीन पर, हर व्यक्ति की उस तक आसान पहुँच होनी चाहिए।
- व्यक्तिगत रुचि के अनुसार सुझाव (Recommendation): पाठक की रुचि से मेल खाने वाली सामग्री ढूँढ़कर देना नियम 2 और नियम 3 को आज के तरीके से व्यवहार में लाना है।
- खोज की सुविधा (Usability): कुछ ही क्लिक में मनचाही सामग्री तक पहुँचाने वाला डिज़ाइन नियम 4 से जुड़ा है।
- स्थान की बदलती भूमिका (Library as Place): व्याख्यानों, बैठकों और चीज़ें बनाने की जगह जैसी नई भूमिकाएँ स्वीकार करना पुस्तकालय के उस विकास का रूप है जिसकी बात नियम 5 करता है।
1995 में पुस्तकालयाध्यक्ष माइकल गॉर्मन (Michael Gorman) ने इन नियमों के आधार पर ‘पुस्तकालय विज्ञान के नए 5 नियम’ प्रस्तावित किए। उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तकालय को मानवता की सेवा करनी चाहिए, ज्ञान के संप्रेषण के सभी रूपों का सम्मान करना चाहिए और तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। समय बदलने पर भी रंगनाथन के इन पाँच वाक्यों को बार-बार नए रूप में लिखे जाने का कारण यह है कि अंततः इनमें एक ही प्रश्न निहित है: ‘क्या यह पुस्तकालय पढ़ने वालों के लिए काम कर रहा है?’
केवल पुस्तकों की रक्षा करने तक सीमित रहने के बजाय पुस्तकों और लोगों को जोड़ना ही एक अच्छा पुस्तकालय बनाने की दिशा में पहला कदम है।