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सूचना को संभालने की क्षमता, सूचना साक्षरता (IL)

स्मार्टफ़ोन पर खोजते ही पल भर में दसियों हज़ार परिणाम सामने आ जाते हैं। लेकिन उनमें से भरोसेमंद सूचना चुनना, उसके स्रोत की जाँच करना और अपनी परिस्थिति के अनुसार उसका उपयोग करना—ये काम खोज का बॉक्स आपके लिए नहीं करता। सूचनाओं की भरमार के साथ जो क्षमता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, वही है ‘सूचना साक्षरता (Information Literacy)’।

सरल शब्दों में, सूचना साक्षरता का अर्थ है ‘ज़रूरी सूचना की आवश्यकता पहचानने, उसे खोजने, उसका मूल्यांकन करने और नैतिक ढंग से उसका उपयोग करने की क्षमता’। पुस्तकालय विज्ञान और पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान में लंबे समय से विकसित होती आई यह अवधारणा आज स्कूल, कार्यस्थल और दैनिक जीवन में एक मुख्य क्षमता के रूप में स्थापित हो चुकी है।

इस सामग्री में सूचना साक्षरता की परिभाषा और उसकी उत्पत्ति की पृष्ठभूमि से लेकर ACRL द्वारा प्रस्तुत मुख्य ढाँचे, रोज़मर्रा में काम आने वाली जाँच की आदतों और पुस्तकालयों द्वारा इस क्षमता को विकसित करने के तरीकों तक को आसानी से समझने योग्य रूप में प्रस्तुत किया गया है।


सूचना साक्षरता की अवधारणा और व्यावहारिक ढाँचा

सूचना साक्षरता क्या है?

सूचना साक्षरता की अवधारणा

1989 में अमेरिकन लाइब्रेरी एसोसिएशन (ALA) ने सूचना साक्षर व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया, ‘जो जानता हो कि सूचना की आवश्यकता कब है और जो उस सूचना को खोजकर उसका मूल्यांकन तथा प्रभावी उपयोग कर सकता हो’। यह शब्द केवल बहुत सारी पुस्तकें पढ़ने की क्षमता या खोज करने के कौशल को नहीं दर्शाता।

यह अवधारणा पुस्तकालयों के ‘ग्रंथसूची संबंधी प्रशिक्षण (Bibliographic Instruction)’ से शुरू हुई और कंप्यूटर तथा इंटरनेट के आम होने के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। कागज़ पर लिखी सूचियाँ पढ़ने के तरीके से आगे बढ़कर यह डेटाबेस, वेब और सोशल मीडिया को समेटने वाली ‘पूरे सूचना परिवेश को संभालने की क्षमता’ बन गई।

जहाँ मीडिया साक्षरता समाचार, वीडियो और विज्ञापन जैसे माध्यमों के संदेशों को आलोचनात्मक ढंग से समझने पर केंद्रित होती है, वहीं सूचना साक्षरता कार्यों, शोध और निर्णय लेने के लिए आवश्यक सूचना को ‘समस्या की पहचान → खोज → मूल्यांकन → उपयोग → नैतिकता’ की पूरी प्रक्रिया के रूप में देखती है। दोनों में कुछ समानताएँ हैं, लेकिन उनके शुरुआती बिंदु और लक्ष्य अलग हैं।

  • सूचना साक्षरता (Information Literacy): यह आवश्यकता पहचानने, सूचना खोजने, उसका मूल्यांकन करने और उपयोग करने की पूरी प्रक्रिया है।
  • मीडिया साक्षरता (Media Literacy): यह माध्यमों द्वारा तैयार किए गए संदेशों की आलोचनात्मक व्याख्या करने की क्षमता है।
  • डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy): यह डिजिटल उपकरणों और परिवेश के उपयोग से जुड़े कौशल और दृष्टिकोण हैं।

ACRL का ढाँचा: सूचना की कार्यप्रणाली को समझने के 6 दृष्टिकोण

2016 में एसोसिएशन ऑफ़ कॉलेज एंड रिसर्च लाइब्रेरीज़ (ACRL) ने ‘उच्च शिक्षा के लिए सूचना साक्षरता का ढाँचा’ में छह ‘फ़्रेम (Frame)’ प्रस्तुत किए। ये जाँच-सूची के बजाय सूचना को देखने के दृष्टिकोण जैसे हैं।

(1) प्रामाणिकता निर्मित होती है (Authority Is Constructed and Contextual)
किसे ‘विशेषज्ञ’ माना जाए, यह क्षेत्र और उद्देश्य पर निर्भर करता है। किसी अकादमिक शोधपत्र की प्रामाणिकता और किसी रोगी के अनुभव-विवरण की प्रामाणिकता के संदर्भ अलग होते हैं।

(2) सूचना का सृजन एक प्रक्रिया है (Information Creation as a Process)
ब्लॉग, समाचार और समकक्षों द्वारा समीक्षित शोधपत्र अलग-अलग प्रक्रियाओं से तैयार होते हैं। उनके स्वरूप को समझने से विश्वसनीयता का आकलन करना आसान होता है।

(3) सूचना का मूल्य होता है (Information Has Value)
कॉपीराइट, व्यक्तिगत जानकारी और सशुल्क डेटाबेस इस तथ्य को दर्शाते हैं कि सूचना का आर्थिक और कानूनी मूल्य होता है।

(4) शोध प्रश्नों के माध्यम से अन्वेषण है (Research as Inquiry)
अच्छा शोध उत्तर से नहीं, बल्कि बेहतर प्रश्न से शुरू होता है। प्रश्नों को परिष्कृत करना अपने आप में साक्षरता है।

(5) विद्वत् कार्य एक संवाद है (Scholarship as Conversation)
शोधपत्र अकेले बोलने वाला एकालाप नहीं, बल्कि पूर्ववर्ती शोध से जुड़ा संवाद होता है। संदर्भ देना उस संवाद में भाग लेने का एक तरीका है।

(6) खोज एक रणनीतिक अन्वेषण है (Searching as Strategic Exploration)
खोजशब्द बदलना, दूसरे डेटाबेस में जाना और बार-बार असफल होना खोज प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।


सरल उदाहरणों से समझें दैनिक जीवन में सूचना साक्षरता

सूचना साक्षरता केवल पुस्तकालय तक सीमित नहीं है। दैनिक जीवन में इसका उपयोग इस प्रकार होता है।

[उदाहरण 1] स्वास्थ्य संबंधी सूचना खोजना

सिरदर्द की दवा खोजते समय प्रचार करने वाले ब्लॉग और स्वास्थ्य प्राधिकरणों या अस्पतालों की सामग्री को समान महत्व नहीं दिया जाता। पहले लेखक, तारीख, प्रमाण (शोध और दिशानिर्देश) तथा जुड़े हितों (बिक्री का उद्देश्य) की जाँच की जाती है।

[उदाहरण 2] असाइनमेंट और रिपोर्ट के लिए सामग्री खोजना

‘जलवायु परिवर्तन के प्रभाव’ जैसे व्यापक विषय से शुरुआत करने पर परिणामों की भरमार हो जाती है। ‘शहरों में भीषण गर्मी और संवेदनशील समूह’ या ‘2015 के बाद दक्षिण कोरिया में हुए शोध’ जैसे विषयों से दायरा सीमित किया जाता है और AND, OR तथा उद्धरण चिह्नों जैसे खोज ऑपरेटरों से अनावश्यक परिणाम घटाए जाते हैं।

[उदाहरण 3] सोशल मीडिया पर ताज़ा खबरें

केवल सनसनीखेज़ शीर्षक और स्क्रीनशॉट देखकर खबर साझा नहीं की जाती। मूल सामग्री का लिंक, समाचार संस्थान या संगठन का नाम और किसी सुधार संबंधी खबर के प्रकाशित होने की जाँच करने के बाद ही उसे ‘तथ्य’ माना जाता है।

  • CRAAP जाँच (Currency·Relevance·Authority·Accuracy·Purpose): यह नवीनता, प्रासंगिकता, प्रामाणिकता, सटीकता और उद्देश्य की संक्षिप्त जाँच करने का तरीका है।
  • पार्श्व पठन (Lateral Reading): यह केवल उसी पृष्ठ को गहराई से पढ़ने के बजाय नए टैब में पहले लेखक और माध्यम के बारे में पड़ताल करने की आदत है।

पुस्तकालय सूचना साक्षरता कैसे विकसित करते हैं

सार्वजनिक और विश्वविद्यालय पुस्तकालय सूचना साक्षरता की व्यावहारिक कक्षाएँ हैं। पुस्तकालयाध्यक्षों की संदर्भ सेवाएँ, डेटाबेस का प्रशिक्षण, सामग्री खोजने की कक्षाएँ और फ़र्ज़ी खबरों पर कार्यशालाएँ—ये सभी इस क्षमता को विकसित करने वाली गतिविधियाँ हैं।

उपयोगकर्ता को ‘उत्तर पाने वाले व्यक्ति’ से ‘साथ मिलकर खोज करने वाले व्यक्ति’ की भूमिका में आने के लिए आमंत्रित किया जाता है। पुस्तकालयाध्यक्ष उसकी ओर से सही उत्तर लिखने के बजाय प्रश्नों को परिष्कृत करने, उपयुक्त उपकरण चुनने और मूल्यांकन के मानदंडों का उपयोग करने का अभ्यास करने में मदद करते हैं। पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान में सूचना साक्षरता शिक्षा का यही मूल है।

स्कूली पुस्तकालयों की अन्वेषण कक्षाएँ, विश्वविद्यालयों में डेटाबेस का परिचयात्मक प्रशिक्षण और सार्वजनिक पुस्तकालयों में जीवन के विभिन्न चरणों के अनुसार दी जाने वाली सूचना संबंधी शिक्षा—इन सभी का लक्ष्य एक है। उद्देश्य सूचना का ‘स्वामित्व’ पाना नहीं, बल्कि जब भी आवश्यकता हो, उसे ‘संभाल सकने का आत्मविश्वास’ विकसित करना है।

जैसे-जैसे सूचना बढ़ती है, ‘अधिक जानने’ की तुलना में ‘उसे अच्छी तरह संभालने’ की क्षमता जीवन में बदलाव लाती है। आवश्यकता के समय को पहचानना, खोजना, परखना और सही ढंग से उपयोग करना—इन आदतों को अपनाना ही सूचना साक्षरता की ओर पहला कदम है।

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