इस बार हम कथानक की अवधारणा पर सामग्री तैयार करना चाहते हैं, जिसे फ़िल्मों, धारावाहिकों और उपन्यासों की पटकथा या कहानी लिखने के लिए जानना आवश्यक है। कथानक शब्द मुख्यतः कथात्मक सामग्री में इस्तेमाल होता है और किसी रचना की केंद्रीय कहानी, घटनाओं की संरचना तथा निरंतरता आदि को समझाने के काम आता है।
कथानक सामान्यतः आरंभ, मध्य और अंत के तीन चरणों से बना होता है। यह ऐसी संरचना है जो पात्रों के कार्यों, घटनाओं, टकरावों और उनके परिणामों सहित कहानी की प्रमुख घटनाओं को जोड़ती है।

कथानक की अवधारणा और मूल बातें
अच्छे कथानक के 8 मूल नियम
कथानक के विभिन्न प्रकारों को जानने से पहले, कथानक क्या है और उसे रचना में कैसे लागू किया जाता है, इस बारे में ध्यान देने योग्य बातें इस प्रकार हैं।
- किसी रचना में सबसे महत्वपूर्ण 2 तत्व कथानक और पात्र हैं।
- कथानक सभी तत्वों को पिरोने वाली शक्ति और उनका ढाँचा है।
- रचना शुरू करते समय कम से कम उसकी दिशा तय कर लेनी चाहिए।
- पहले दृश्य में जिज्ञासा जगानी चाहिए।
- पहली घटना होने से पहले पात्रों का परिचय दें।
- मुख्य पात्रों की संख्या 3 होना उपयुक्त है।
- पात्रों को कठिन परिस्थिति में डालें।
- कारण और परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- कथानक दर्शकों को ‘आख़िर क्यों’ के खेल में ले जाता है।
- तीन बार के नियम को अवश्य याद रखें। (उदाहरण: त्रिकोणीय संरचना, 3 घटनाएँ, 3 प्रयास आदि)
- दर्शक महत्वपूर्ण विषयवस्तु की अपेक्षा करते हैं, सुव्यवस्था चाहते हैं और सुसंगत एकरूपता चाहते हैं।
- अप्रत्याशित मोड़ों और खोजों से तनाव बनाए रखें।
- काले-सफ़ेद तर्क के बजाय धूसर क्षेत्र का उपयोग करें। (इससे आशय उन अवधारणाओं से है जिनका स्पष्ट उत्तर आसानी से नहीं मिलता।)
- जब अच्छे पक्ष का सामना अच्छे पक्ष से होता है, तो अच्छी कहानी बनती है। (उदाहरण: फ़िल्म—कैप्टन अमेरिका: सिविल वॉर)
- स्पष्ट उत्तर न होने पर टकराव बढ़ता है।
- दोनों पक्षों के दृष्टिकोण के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। (उदाहरण: अच्छाई और बुराई का संतुलन)
- रचना में नैतिकता का आधार स्थापित करना चाहिए। (सामाजिक प्रभाव पर विचार करें।)
- सभी परिस्थितियाँ तार्किक और विश्वसनीय होनी चाहिए।
- एक पूर्ण अंत तक पहुँचना अच्छा होता है। बेशक, ‘इन्सेप्शन’ जैसी फ़िल्मों में जानबूझकर खुला अंत भी रखा जाता है।
विभिन्न प्रकार के कथानक लिखने की विधि
खोज (पात्र-केंद्रित कथानक)
क्या प्राप्त करना चाहते हैं?
1. कथानक किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु की खोज पर आधारित होना चाहिए। कारण और उद्देश्य के बीच संबंध को समानांतर रूप से विकसित करें।
2. पात्रों को अनेक लोगों और स्थानों की तलाश में भटकने दें। लेकिन उनकी गतिविधियाँ स्पष्ट कारण-परिणाम संबंध से संचालित होनी चाहिए।
3. पूरे क्षेत्र का एक चक्कर लगवाएँ। फिर उसी जगह लौटें जहाँ से शुरुआत हुई थी।
4. समापन के चरण में आरंभिक परिस्थिति या पृष्ठभूमि काफ़ी बदल जाती है।
5. यात्रा का उद्देश्य ज्ञान की खोज है और यह मुख्य पात्र के परिपक्व होने की प्रक्रिया है।
6. अंक 1 में प्रेरणा देने वाली घटना शामिल होती है। खोज क्यों शुरू करनी चाहिए?
7. यात्रा के लिए साथी आवश्यक है।
8. सहायता करने वाला पात्र निर्धारित करें।
9. अंतिम अंक पात्र के स्वयं को नए सिरे से जानने के साथ समाप्त करें। खोज के सफल या असफल होने के बाद!
10. जो मिलता है, वह आरंभिक सोच से अलग होता है। इसका आशय ऐसी खोज से है जो किसी अप्रत्याशित घटना के सामने आने पर होती है।
11. बाधाएँ लाकर रुचि और तनाव बढ़ाएँ।
साहसिक यात्रा (कार्य-केंद्रित कथानक)
लक्ष्य की ओर निकल पड़ना
1. रचना का केंद्र स्वयं यात्रा होती है।
2. बाहरी दुनिया में कदम रखना। इसमें नए और विचित्र स्थानों तथा घटनाओं को लिया जाता है।
3. सौभाग्य की खोज में निकलें। वह घर पर नहीं मिल सकता।
4. किसी चीज़ से यात्रा शुरू करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए।
5. प्रत्येक अंक का कारण-परिणाम संबंध पहली घटना के संबंध के अनुरूप होना चाहिए।
6. मुख्य पात्र का परिवर्तन से गुज़रना आवश्यक नहीं है।
7. कभी-कभी इसके साथ प्रेम-कथा भी जुड़ती है।
8. सजीव और विस्तृत वर्णन करना चाहिए।
पीछा (कार्य-केंद्रित कथानक)
पीछा करने की क्रिया पर ध्यान केंद्रित करना
1. पीछा करने की प्रक्रिया स्वयं पात्रों से अधिक महत्वपूर्ण है।
2. पात्र सचमुच ख़तरनाक परिस्थिति में पड़ते हैं। (फ़िल्म ‘द फ़्यूजिटिव’)
3. भागने वाले को पकड़ने का उचित अवसर होना चाहिए। उसे थोड़े समय के लिए पकड़ा भी जा सकता है।
4. यह शारीरिक गतिविधियों पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
5. पात्र रोमांच पैदा करने वाले, सक्रिय और अनोखे होने चाहिए।
6. पात्रों की रूढ़ छवि से बाहर निकलना चाहिए। (वे बिल्कुल साधारण नहीं होने चाहिए।)
7. पीछा करने का स्थान जितना संकरा होगा, तनाव उतना ही बढ़ेगा।
8. पहले भाग में 3 चरण शामिल होने चाहिए। (पीछा करने के मूल नियम, ख़तरे की स्थापना, प्रेरणा देने वाली घटना)
बचाव (कार्य-केंद्रित कथानक)
पीड़ित को बुराई से बचाओ
1. यह कार्यों पर निर्भर करता है।
2. पात्रों का त्रिकोण मुख्य पात्र, खलनायक और पीड़ित से बनाएँ।
3. काले-सफ़ेद तर्क का उपयोग करें।
4. कहानी का केंद्र बुराई का पीछा करना है।
5. अच्छा पक्ष बुराई का पीछा करते हुए बाहरी दुनिया में निकलता है। वह बुराई के बिछाए जालों के रास्ते पर ही चलता है।
6. अच्छा पक्ष बुराई के साथ अपने संबंध के अनुसार कार्य करता है।
7. बुरा पक्ष अच्छे पक्ष की संपत्ति छीनने वाला कथात्मक साधन है।
8. वह मुख्य पात्र के रास्ते में बाधा डालता है।
9. पीड़ित सबसे कमज़ोर होता है और अच्छे पक्ष को बुराई के विरुद्ध खड़ा करने वाला कथात्मक साधन भी होता है।
10. बिछड़ना, पीछा करना, सामना और पुनर्मिलन जैसे चरणों का उचित उपयोग करें।
पलायन (कार्य-केंद्रित कथानक)
किसी जगह से निकल भागना कहानी का मूल है
1. मुख्य पात्र को अन्यायपूर्वक बंदी बनाया गया होना चाहिए और उसे निकल भागने का प्रयास करना चाहिए। (फ़िल्म ‘द बैटलशिप आइलैंड’)
2. काले-सफ़ेद तर्क का उपयोग करें।
3. मुख्य पात्र ही पीड़ित है।
4. पहले भाग में मुख्य पात्र के बंदी बनने की प्रक्रिया दिखानी चाहिए। फिर निकल भागने का पहला प्रयास विफल कर दें।
5. दूसरे भाग में निकल भागने की सुविचारित योजना दिखाई जाती है। लेकिन वह भी विफल हो जाती है।
6. अंतिम, तीसरे भाग में सफल पलायन दिखाया जाता है।
7. पहले और दूसरे भाग में बुरा पक्ष मुख्य पात्र को नियंत्रित करता है। लेकिन अंतिम भाग में नियंत्रण की क्षमता मुख्य पात्र के पास आ जाती है।
प्रतिशोध (कार्य-केंद्रित कथानक)
फ़िल्म ‘टेकन’ का एक दृश्य (स्रोत: ‘टेकन’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. अच्छा पक्ष शारीरिक और मानसिक क्षति के लिए बुरे पक्ष से भरपाई चाहता है।
2. प्रतिशोध लेने की क्रिया पर ही ध्यान केंद्रित करें।
3. यह मुख्य पात्र द्वारा अकेले लागू किया जाने वाला न्याय है।
4. मुख्य पात्र के पास प्रतिशोध लेने का नैतिक औचित्य होता है।
5. प्रतिशोध तब तक न्यायसंगत रहता है, जब तक वह मुख्य पात्र द्वारा झेली गई पीड़ा से आगे नहीं जाता।
6. पहले चरण में मुख्य पात्र का सामान्य जीवन दिखाया जाता है। लेकिन बुरा पक्ष उसका जीवन नष्ट कर देता है। (उदाहरण: फ़िल्म ‘टेकन’)
7. दूसरे नाटकीय चरण में प्रतिशोध की योजना बनाने और बुरे पक्ष की तलाश में निकलने को दिखाया जाता है।
8. अंतिम चरण में अच्छे और बुरे पक्ष का सामना होता है और अधिक पुख़्ता योजना के साथ मुक़ाबला किया जाता है।
पहेली (रहस्य)
पाठक या दर्शक के साथ मिलकर सुलझाया जाने वाला रहस्य
1. मूल तत्व चतुराई है। चतुराई को साधारण चीज़ों में छिपाएँ।
2. तनाव वास्तव में हो रही चीज़ों (वर्तमान) और अनिवार्य रूप से होनी चाहिए ऐसी चीज़ों (उद्देश्य) के बीच टकराव से पैदा होता है।
3. यह ऐसी चुनौती होनी चाहिए जिसे पाठक भी सुलझा सके।
4. उत्तर साधारण दिखना चाहिए।
5. पहले नाटकीय चरण में सामान्य तत्व (पात्र, स्थान, घटना) शामिल होते हैं।
6. दूसरे नाटकीय चरण में विशेष पहलू का परिचय दिया जाता है कि वे आपस में कैसे जुड़े हैं।
7. तीसरे नाटकीय चरण में समाधान होना चाहिए। बुरे पक्ष की प्रेरणा और घटनाक्रम का स्पष्टीकरण दें।
8. लक्षित दर्शक तय करने चाहिए।
9. तय करें कि अंत खुली संरचना वाला होगा या बंद संरचना वाला।
प्रतिद्वंद्विता (पात्र-केंद्रित कथानक)
कैप्टन अमेरिका: सिविल वॉर (स्रोत: फ़िल्म का मुख्य पोस्टर)
1. संघर्ष की जड़ उस परिणाम में है जो तब पैदा होता है जब एक अपरिहार्य शक्ति (चुनौती देने वाला) का सामना पीछे न हटने वाले पक्ष (रक्षक) से होता है।
2. प्रतिद्वंद्विता का मूल अच्छे और बुरे पक्ष के बीच सत्ता-संघर्ष है।
3. दोनों पक्षों की शत्रुता का बराबरी से टकराव होना चाहिए।
4. प्रतिद्वंद्वियों में एक-दूसरे का मुक़ाबला करने योग्य शक्ति होनी चाहिए।
5. कहानी संघर्ष के पहले क्षण से शुरू करें। उसके शुरू होने से पहले दोनों के बराबरी के संबंध को थोड़े समय के लिए ही सही, स्थापित कर दें।
6. घटनाक्रम बुरे पक्ष द्वारा अच्छे पक्ष का संकल्प तोड़ने से शुरू होता है। यह मुख्य पात्र (अच्छे पक्ष) के लिए उत्प्रेरक का काम करता है।
7. दोनों का शक्ति-संबंध वक्र के रूप में दर्शाया जा सकना चाहिए। इसका अर्थ ऐसी स्थिति है जिसमें एक पक्ष ऊपर उठता है तो दूसरा नीचे जाता है।
8. नैतिक मुद्दों पर पक्ष स्पष्ट रूप से बँटे होते हैं।
9. पहले नाटकीय चरण में बुरे पक्ष की बढ़त होती है। अच्छा पक्ष उससे पीड़ित होता है और प्रतिकूल परिस्थितियाँ झेलता है।
10. दूसरे नाटकीय चरण में भाग्य के पलटने से नीचे जाता शक्ति-वक्र दिशा बदलता है।
11. बुरा पक्ष अक्सर अच्छे पक्ष की शक्ति भाँप लेता है।
12. अच्छे पक्ष के चुनौती शुरू करने से पहले असंतुलित शक्तियों में संतुलन आ जाता है।
13. तीसरा नाटकीय चरण प्रतिद्वंद्वियों के बीच अपरिहार्य मुक़ाबला होता है।
14. घटना का समाधान होने के बाद अच्छा पक्ष अपने भीतर और आसपास की व्यवस्था पुनः स्थापित करता है।
पीड़ित (पात्र-केंद्रित कथानक)
मुख्य पात्र की कठिनाइयों पर विजय पाने की कहानी
1. सिंड्रेला को इसकी प्रतिनिधि रचना माना जाता है।
2. यह प्रतिद्वंद्विता के कथानक से मिलता-जुलता है, लेकिन अच्छा पक्ष बुरे पक्ष का बराबरी का प्रतिद्वंद्वी नहीं बन पाता।
3. नाटकीय चरणों का विकास प्रतिद्वंद्विता की तरह शक्ति-वक्र का अनुसरण करता है।
4. पीड़ित सामान्यतः विरोधी शक्तियों पर विजय पाता है।
5. दर्शक ऐसा पात्र चाहते हैं जिससे वे स्वयं को जोड़ सकें।
6. दर्शकों से अधिक श्रेष्ठ मुख्य पात्र समस्या पैदा करता है।
7. दर्शक चाहते हैं कि अच्छे लोग सुखी हों।
प्रलोभन (पात्र-केंद्रित कथानक)
अनुचित प्रलोभन में पड़ने के बाद उस पर विजय पाने वाला घटनाक्रम
1. यह मानव स्वभाव की प्रेरणाओं, आवश्यकताओं और आवेगों आदि की परीक्षा लेता है।
2. नैतिकता और प्रलोभन के प्रभाव के अनुसार इसका चित्रण अलग होता है। मुख्य पात्र प्रलोभन में पड़ने की क़ीमत के रूप में कठोर परीक्षाएँ झेलता है और उनसे मिली समझ के कारण सबसे निचली स्थिति से उच्चतम अवस्था तक पहुँचता है।
3. कथानक का संघर्ष आंतरिक होता है और मन के भीतर घटता है।
4. पहले नाटकीय चरण में अच्छे पक्ष का स्वभाव पहले स्थापित करें। उसके बाद बुरे पक्ष का परिचय दिया जाता है।
5. इसके बाद प्रलोभन की प्रकृति का परिचय दिया जाता है। इस चरण में अच्छे पक्ष पर प्रलोभन का प्रभाव स्थापित होता है और संघर्ष होता है।
6. अच्छा पक्ष प्रलोभन में पड़ जाता है। मुख्य पात्र कुछ समय तक प्रलोभन में पड़कर संतुष्टि अनुभव करता है।
7. अच्छा पक्ष प्रलोभन में पड़ने के अपने निर्णय को उचित ठहराता है।
8. प्रलोभन में पड़ने के बाद कुछ समय तक वह इस तथ्य को नकारता रहता है।
9. दूसरा नाटकीय चरण प्रलोभन में पड़ने के प्रभाव दिखाता है। आनंद समाप्त हो जाता है और नकारात्मक पहलू बढ़ते हैं। (उदाहरण: अवैध घटना के कारण गिरफ़्तारी)
10. वह ज़िम्मेदारी और दंड से बचने के तरीके तथा साधन खोजता है। ऐसा करते हुए फिर ग़लत निर्णय भी ले लेता है।
11. नकारात्मक प्रभाव वातावरण को और अधिक तनावपूर्ण बना देते हैं।
12. तीसरा नाटकीय चरण अच्छे पक्ष के आंतरिक संघर्ष को सुलझाता है। अंत पश्चात्ताप, सुलह और क्षमा के साथ होता है।
रूपांतरण (पात्र-केंद्रित कथानक)
हल्क और ब्लैक विडो (स्रोत: ‘अवेंजर्स: एज ऑफ़ अल्ट्रॉन’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. यह सामान्यतः किसी श्राप का परिणाम होता है।
2. उपचार का माध्यम सामान्यतः प्रेम होता है। (उदाहरण: अवेंजर्स में ब्लैक विडो के कारण मानव रूप में लौटने वाला हल्क)
3. उपचार के रूप में प्रेम के प्रकार—माता-पिता और संतान, पुरुष और स्त्री, मनुष्य, ईश्वर।
4. रूपांतरण मुख्य पात्र में होता है। (फ़िल्म ‘हल्क’)
5. मूल बात रूपांतरण की प्रक्रिया से गुज़रकर मानव रूप में लौटना है।
6. मुख्य पात्र के मन पर अधिक ध्यान दें।
7. मुख्य पात्र स्वभाव से दुखी व्यक्ति होता है।
8. मुख्य पात्र का जीवन वर्जनाओं और अनुष्ठानिक प्रक्रियाओं से बँधा होता है।
9. मुख्य पात्र संकट से बाहर निकलना चाहता है। संकट से निकलने का रास्ता ही मुक्ति है।
10. श्राप तोड़ने की शर्तें बुरे पक्ष के हाथ में होती हैं।
11. श्राप टूट भी जाए तो मुख्य पात्र उसे समझा नहीं सकता और न ही उसे जल्दी घटित करा सकता है।
12. पहले नाटकीय चरण में श्राप का कारण नहीं समझाया जा सकता। केवल उसकी स्थिति देखी जाती है।
13. कहानी ठीक उस घटना से पहले शुरू करें जिससे श्राप टूटता है।
14. बुरे पक्ष की भूमिका मुख्य पात्र का श्राप टूटने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना है।
15. बुरा पक्ष पहले जानबूझकर बनाया गया पीड़ित था, लेकिन बाद में चुना हुआ व्यक्ति बन जाता है।
16. दूसरे नाटकीय चरण में बुरे और अच्छे पक्ष के संबंध की प्रकृति पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
17. पात्र एक-दूसरे की भावनाओं की ओर आकर्षित होते हैं।
18. तीसरे नाटकीय चरण में मुक्ति की शर्तें पूरी होती हैं और श्राप से आज़ादी मिलती है।
19. दर्शक श्राप की प्रकृति से सीख प्राप्त करते हैं।
व्यक्तित्व परिवर्तन (पात्र-केंद्रित कथानक)
मुख्य पात्र के व्यक्तित्व में परिवर्तन
1. मुख्य पात्र को जीवन के विभिन्न चरणों से गुज़रते हुए जिन परिवर्तनों का अनुभव होता है, उन्हें दिखाना चाहिए।
2. कथानक जीवन के एक हिस्से को अलग करके प्रस्तुत करता है। यह एक व्यक्तित्व से दूसरे व्यक्तित्व की ओर बढ़ने वाले परिवर्तन को दिखाता है।
3. परिवर्तन की प्रकृति पर ध्यान केंद्रित करें। अर्थात आरंभ से अंत तक मुख्य पात्र पर उसका क्या प्रभाव पड़ा।
4. पहला नाटकीय चरण अच्छे पक्ष को संकट में डालने वाली घटना से संबंधित होना चाहिए। यह परिवर्तन की शुरुआत है।
5. दूसरा नाटकीय चरण परिवर्तन के प्रभाव का वर्णन करता है। कहानी मुख्य पात्र के आत्मचिंतन पर केंद्रित होती है।
6. तीसरे नाटकीय चरण में ऐसी घटना होनी चाहिए जिससे सब कुछ स्पष्ट हो जाए। यह वास्तविक विकास और समझ पैदा होने का चरण है।
7. कभी-कभी ज्ञान की क़ीमत दुख के रूप में चुकानी पड़ती है।
परिपक्वता (पात्र-केंद्रित कथानक)
मुख्य पात्र का बचपन और बड़े होने का दौर
1. ऐसा मुख्य पात्र रचें जो बड़े होने के दौर के चरम पर हो। उसका लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता।
2. घटना होने से पहले समझाएँ कि पात्र कौन है, कैसे सोचता है और किस तरह जी रहा है।
3. बचपन के निष्कपट जीवन और वयस्क जीवन के बीच अंतर दिखाएँ।
4. मुख्य पात्र के नैतिक और मनोवैज्ञानिक विकास पर ध्यान केंद्रित करें।
5. ऐसी घटना घटित कराएँ जो मुख्य पात्र की मान्यताओं और समझ को चुनौती दे सके।
6. स्पष्ट करें कि मुख्य पात्र परिवर्तन पर ‘कैसी प्रतिक्रिया करता है?’
7. परिवर्तन की प्रक्रिया दिखाएँ और उसे धीरे-धीरे आगे बढ़ाएँ।
8. कम उम्र के मुख्य पात्र को विश्वसनीय बनाएँ। साथ ही उसे अपनी उम्र के अनुरूप भी रखें।
9. उसे एक ही बार में वयस्क बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। छोटी-छोटी सीखें ही विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
10. तय करें कि सीख की मनोवैज्ञानिक क़ीमत क्या होगी। वह ऐसी होनी चाहिए जिसे मुख्य पात्र सह सके।
प्रेम (पात्र-केंद्रित कथानक)
बाधाओं को पार करने वाला प्रेम
1. प्रेम के पात्र से मुलाक़ात हमेशा किसी महत्वपूर्ण बाधा के साथ होती है।
2. प्रेमियों के बीच कुछ बेमेल पहलू होते हैं। उदाहरण के लिए सामाजिक हैसियत, शारीरिक स्थिति और व्यक्तित्व की समस्याएँ।
3. बाधा पार करने का पहला प्रयास हमेशा विफल होता है। प्रेम को समर्पण और दृढ़ता से प्रमाणित करना चाहिए।
4. एक व्यक्ति को दूसरे से अधिक सक्रिय होना चाहिए।
5. सुखद अंत होना आवश्यक नहीं है। अंत अधकचरा न करें।
6. मुख्य पात्र को आकर्षक और विश्वसनीय बनाएँ। वह अनोखा, रोचक और गहराई वाला पात्र महसूस होना चाहिए।
7. यह भावनात्मक और विश्वसनीय होना चाहिए। भय, ऊब, घृणा, आकर्षण, निराशा, पुनर्मिलन और भावनात्मक थकावट आदि को विषय बनाएँ।
8. पात्रों की सच्ची भावनाओं पर निर्भर करना चाहिए।
9. प्रेम प्रयास से प्राप्त होता है। पात्रों को विभिन्न परीक्षाओं से गुज़रने दें।
वर्जित प्रेम (पात्र-केंद्रित कथानक)
फ़िल्म ‘टाइटैनिक’ का प्रतिष्ठित दृश्य (स्रोत: फ़िल्म ‘टाइटैनिक’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. यह समाज की परंपराओं के विरुद्ध प्रेम है। इसका विरोध करने वाली शक्ति अवश्य होती है। (फ़िल्म ‘टाइटैनिक’)
2. प्रेमी सामाजिक परंपराओं की अनदेखी करके अपने जुनून के पीछे जाते हैं। सामान्यतः इसके दुखद परिणाम होते हैं।
3. व्यभिचार वर्जित प्रेम का सबसे आम रूप है।
4. पहला नाटकीय चरण दोनों व्यक्तियों के संबंध को परिभाषित करता है और उनकी स्थितियाँ बताता है।
5. दूसरा नाटकीय चरण संबंध के मूल तक पहुँचता है। सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण वे संकट में पड़ जाते हैं।
6. तीसरा नाटकीय चरण अंतिम स्थिति तक पहुँचने और नैतिक मुद्दों को सुलझाने का समय है। मृत्यु, दबाव, निर्वासन आदि।
बलिदान (पात्र-केंद्रित कथानक)
अवेंजर्स 4 में आयरन मैन का बलिदान (स्रोत: ‘अवेंजर्स: एंडगेम’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. बलिदान के लिए व्यक्ति को बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। अच्छे पक्ष को ख़तरनाक कार्य करना होता है।
2. अच्छा पक्ष निचले नैतिक स्तर से उदात्त स्तर तक महत्वपूर्ण परिवर्तन से गुज़रता है।
3. घटना मुख्य पात्र को निर्णायक फ़ैसला लेने के लिए प्रेरित करती है।
4. बुनियादी पृष्ठभूमि स्थापित करें ताकि बलिदान का निर्णय लेने की प्रक्रिया समझ में आए।
5. सभी घटनाएँ मुख्य पात्र का प्रतिबिंब होती हैं। वे पात्र की परीक्षा लेती हैं और उसके व्यक्तित्व को विकसित करती हैं।
6. पात्र के कार्यों की प्रेरणा स्पष्ट करें ताकि उसे पूरी तरह समझा जा सके।
7. विचारों की कड़ी के माध्यम से कार्यों की कड़ी दिखाएँ।
8. कहानी के केंद्र में नैतिक दुविधा रखें।
खोज और बोध (पात्र-केंद्रित कथानक)
म्योल्निर उठाने के योग्य बनने से पहले का थॉर (स्रोत: ‘थॉर 1: गरज का देवता’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. पात्र की खोज की प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करें। यह मानव प्रकृति की समझ पाने का प्रयास है।
2. पात्र के नई परिस्थिति में पड़ने से पहले मुख्य पात्र का परिचय देकर शुरुआत करें।
3. अतीत से चिपके रहने के बजाय घटनाओं को वर्तमान और भविष्य के अनुरूप पिरोएँ। पात्र को परिवर्तन के केंद्र में रखें और घटनात्मक कार्रवाई देर से शुरू करें।
4. उत्प्रेरक का काम करने वाला दृश्य अर्थपूर्ण और रोचक बनाना चाहिए।
5. पात्र को यथाशीघ्र संकट और टकराव में डालें। अतीत और वर्तमान के बीच तनाव बनाए रखें।
6. संतुलन बनाए रखना चाहिए। कार्य और भावना का संतुलित उपयोग करें ताकि वे घटनाओं के अनुरूप हों।
7. कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर न दिखाएँ।
8. पात्र पर दबाव न डालें और उसे उपदेश न दें। उसे स्वयं बोलने और स्वयं समझने दें।
अतिरेकपूर्ण आचरण (पात्र-केंद्रित कथानक)
सरकारी कर्मचारी से धीरे-धीरे अँधेरे रास्ते पर बढ़ता मुख्य पात्र (स्रोत: फ़िल्म ‘नेमलेस गैंगस्टर: रूल्स ऑफ़ द टाइम’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. यह पात्र के मनोवैज्ञानिक पतन के बारे में है।
2. पात्र के पतन का कारण उसके व्यक्तित्व की कमी को बनाएँ।
3. पतन तीन चरणों में आगे बढ़ता है। 1) मुख्य पात्र का पहले का रूप, 2) बिगड़ते समय उसकी स्थिति, 3) क्या होता है?
4. व्यक्तित्व का ऐसा चित्रण करें कि मुख्य पात्र के पतन पर सहानुभूति हो सके।
5. पात्र के व्यक्तित्व के विकास पर विशेष ध्यान दें। सहानुभूति पैदा होना चित्रण की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है।
6. अतिनाटकीयता से बचें। भावनाएँ न थोपें।
7. दर्शकों को पर्याप्त जानकारी दें ताकि वे भावनात्मक रूप से जुड़ सकें।
8. पात्र से ऐसी ग़लती न कराएँ जो दर्शकों की समझ की सीमा से बाहर हो।
9. संकट के क्षण में केवल दो में से एक परिणाम रखें—मुख्य पात्र पूरी तरह नष्ट हो जाए या उसे मुक्ति मिल जाए।
10. कथानक के कारण और परिणाम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुख्य पात्र से जुड़े होते हैं।
11. उन्मत्त परिस्थितियों में भी मुख्य पात्र पर पकड़ न खोएँ। उसे अवास्तविक परिस्थितियों से न गुज़ारें।
12. मुख्य पात्र असाधारण परिस्थिति में पड़ा एक साधारण व्यक्ति है। (ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है।)
13. पात्र को चरम सीमा तक ले जाएँ।
उत्थान और पतन (पात्र-केंद्रित कथानक)
जीवन के शिखर और गर्त का अनुभव करने वाला मुख्य पात्र (स्रोत: फ़िल्म ‘डॉक्टर स्ट्रेंज’ का जारी किया गया स्थिर चित्र)
1. कहानी का ध्यान एक मुख्य पात्र पर केंद्रित करें।
2. पात्र में दृढ़ इच्छाशक्ति और करिश्मा होता है।
3. कहानी के मूल में नैतिक दुविधा होनी चाहिए और उसके माध्यम से पात्र की परीक्षा होनी चाहिए। यह दुविधा परिवर्तन की बुनियाद बनती है।
4. पात्र और घटनाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। घटनाएँ मुख्य पात्र के कारण होनी चाहिए।
5. महत्वपूर्ण घटना से पहले का पात्र दिखाएँ ताकि दर्शकों को पहले और बाद की तुलना का आधार मिले।
6. दिखाएँ कि घटनाओं के परिणामस्वरूप पात्र लगातार किस तरह बदलता है।
7. पूरा पतन पात्र के व्यक्तित्व के कारण होना चाहिए।
8. मानव मनोविज्ञान की पड़ताल और बारीक वर्णन महत्वपूर्ण हैं।
इस प्रकार हमने फ़िल्मों, धारावाहिकों, खेलों और उपन्यासों आदि की कहानी लिखने के लिए आवश्यक कथानक की अवधारणा तथा प्रत्येक प्रकार की विशेषताओं को जाना। फ़िल्म की पटकथा या उपन्यास लिखते समय कहानी का ढाँचा बनने वाले कथानक का उचित उपयोग करके पाठकों या दर्शकों में तनाव पैदा करना और उनकी रुचि बनाए रखना चाहिए।
इस सामग्री में बताए गए कथानक के प्रकार ऐसे महत्वपूर्ण ढाँचे हैं जिन्हें अधिकांश रचनाओं पर लागू किया जा सकता है। इसलिए नई रचना लिखने की इच्छा रखने वाले लेखकों या भावी लेखकों और निर्देशकों के लिए इस सामग्री का संदर्भ लेना सहायक होगा।