गेहूँ के आटे में पानी डालकर गूँधने पर शुरुआत में हाथों से चिपकने वाला आटा कुछ समय बाद चिकने और लचीले गुँथे आटे में बदल जाता है। चावल के आटे से फूली हुई ब्रेड बनाना कठिन होता है, लेकिन गेहूँ का गुँथा आटा यीस्ट से निकलने वाली गैस को अपने भीतर रोककर गुब्बारे की तरह फूल जाता है। कलगुक्सू नूडल्स का चबाने पर लचीला लगना और बागेत की कड़ी बनावट भी इसी वजह से होती है। इसका रहस्य है ‘ग्लूटेन (Gluten)’।
सरल शब्दों में, ग्लूटेन का अर्थ है ‘गेहूँ के आटे में मौजूद दो प्रकार के प्रोटीनों के पानी से मिलकर आपस में उलझने से बना जाल जैसा प्रोटीन समूह’। मुख्य बात यह है कि गेहूँ के आटे में ग्लूटेन पहले से तैयार अवस्था में मौजूद नहीं होता, बल्कि पानी डालकर गूँधने की प्रक्रिया में ही बनता है।
इस सामग्री में हम क्रम से ग्लूटेन बनने की प्रक्रिया, गेहूँ के आटे के प्रकार और उपयोग, ग्लूटेन को मजबूत या कमजोर बनाने के पाक रहस्य और उन लोगों के बारे में जानेंगे जिनके शरीर को ग्लूटेन अनुकूल नहीं पड़ता।
गुँथे आटे को चबाने पर लचीला बनाने वाले ग्लूटेन का विज्ञान
दो प्रोटीन मिलकर जाल बनाते हैं

गेहूँ के आटे में कई प्रोटीन होते हैं, जिनमें से ग्लूटेन बनाने वाले दो प्रोटीन ग्लियाडिन और ग्लूटेनिन हैं। ब्रेड बनाने वाले गेहूँ में ये दोनों कुल प्रोटीन का 75~85% होते हैं।
- ग्लियाडिन (Gliadin): यह छोटा और गोलाकार प्रोटीन है, जो गुँथे आटे को चिपचिपा बनाता है और आसानी से खिंचने देता है।
- ग्लूटेनिन (Glutenin): यह लंबी शृंखला वाला बड़ा प्रोटीन है, जो खिंचे हुए आटे को रबर बैंड की तरह अपनी मूल स्थिति में लौटने की प्रत्यास्थता देता है।
सूखे गेहूँ के आटे में ये दोनों प्रोटीन अलग-अलग बिखरे होते हैं। इसमें पानी डालकर गूँधने पर प्रोटीन पानी सोखकर खुलने लगते हैं और ग्लूटेनिन के अणु सल्फर परमाणुओं के बीच पुल बनाकर लंबी शृंखलाओं में जुड़ जाते हैं। इन शृंखलाओं के बीच ग्लियाडिन समा जाता है और ऐसा जाल बनता है जो आसानी से खिंचता है और फिर सिकुड़ भी जाता है।
यह जाल यीस्ट के किण्वन से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को छोटे गुब्बारों की तरह बंद रखता है। इससे गुँथा आटा फूलता है और ओवन में पकाने पर गर्मी से जमने वाला ग्लूटेन स्टार्च के साथ मिलकर ब्रेड का ढाँचा बनाता है। गुँथे आटे को पानी के भीतर मसलकर उसका स्टार्च धो देने पर रबर जैसा कड़ा धूसर पिंड बचता है। यही ग्लूटेन है।
गेहूँ के आटे के प्रकार ग्लूटेन की मात्रा के आधार पर बाँटे जाते हैं

बाज़ार में मिलने वाले गेहूँ के आटे को प्रोटीन की मात्रा, यानी ग्लूटेन बनाने की क्षमता के आधार पर तीन प्रकारों में बाँटा जाता है। प्रोटीन जितना अधिक होगा, गुँथा आटा उतना ही लचीला और चबाने में कड़ा होगा।
(1) अधिक प्रोटीन वाला आटा
इसमें प्रोटीन सबसे अधिक, लगभग 11~13% होता है। इसमें मजबूत ग्लूटेन बनता है, जो गैस को अच्छी तरह रोकता है। इसलिए इसका उपयोग ब्रेड, बागेत और पिज़्ज़ा के आटे जैसे खाद्य पदार्थों में होता है, जिन्हें खूब फूलना और चबाने पर लचीला लगना चाहिए।
(2) मध्यम प्रोटीन वाला आटा
इसमें प्रोटीन की मात्रा लगभग 9~10% के आसपास होती है। यह चबाने पर उचित लचीलापन देने के साथ नरम भी रहता है, इसलिए कलगुक्सू, सुजेबी और मांडू के आवरण जैसे नूडल्स तथा आटे से बने व्यंजनों और हमारे घरेलू भोजन में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है।
(3) कम प्रोटीन वाला आटा
इसमें प्रोटीन सबसे कम, लगभग 7~9% होता है। कम ग्लूटेन बनने से कुरकुरी और नरम बनावट मिलती है, इसलिए यह केक, कुकीज़ और तलने के लिए चढ़ाए जाने वाले घोल के अनुकूल है।
यही कारण है कि गेहूँ का आटा चुनते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उससे कौन-सा व्यंजन बनाना है।
पकाने के वे रहस्य जो ग्लूटेन को बढ़ाते और घटाते हैं

रसोइये केवल गेहूँ के आटे का प्रकार चुनकर ही नहीं, बल्कि गूँधने के तरीके से भी ग्लूटेन को नियंत्रित करते हैं।
ग्लूटेन को मजबूत बनाने के तरीके
- देर तक गूँधना (Kneading): आटे को जितनी देर तक गूँधा जाता है, प्रोटीन की शृंखलाएँ उतनी ही सघनता से जुड़ती हैं और चबाने पर उसका लचीलापन बढ़ता है।
- पर्याप्त पानी (Hydration): भरपूर पानी होने पर प्रोटीन अच्छी तरह खुलते हैं और ग्लूटेन आसानी से बनता है।
- नमक (Salt): नमक ग्लूटेन के जाल को कसकर गुँथे आटे को मजबूती देता है। इसी कारण नूडल्स के आटे में नमक डाला जाता है।
ग्लूटेन को कमजोर बनाने के तरीके
- तेल और मक्खन (Shortening): वसा प्रोटीनों को ढककर उन्हें आपस में जुड़ने से रोकती है। बेकिंग में इस्तेमाल होने वाली ठोस वसा को ‘शॉर्टनिंग’ कहने का नाम भी ग्लूटेन के तंतुओं को छोटा (short) करके तोड़ने के अर्थ से आया है।
- चीनी (Sugar): चीनी पहले पानी को बाँध लेती है, जिससे कम ग्लूटेन बनता है और गुँथा आटा नरम हो जाता है।
- कम मिलाना (Gentle Mixing): केक या तलने के घोल को हल्के हाथ से मिलाने का उद्देश्य ग्लूटेन बनने से रोकना है।
गुँथे आटे को कुछ देर आराम देने पर तना हुआ ग्लूटेन ढीला पड़ जाता है और उसे बेलकर फैलाना कहीं आसान हो जाता है। हाथ से आटे को खींचकर लंबे नूडल्स बनाना भी ग्लूटेन के इसी आसानी से खिंचने वाले गुण के कारण संभव होता है।
जिन लोगों के शरीर को ग्लूटेन अनुकूल नहीं पड़ता

अधिकांश लोगों के लिए ग्लूटेन केवल एक प्रकार का प्रोटीन है, लेकिन कुछ लोगों में यह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा करता है। ग्लूटेन केवल गेहूँ में ही नहीं, बल्कि जौ और राई में भी मिलते-जुलते रूप में पाया जाता है।
- सीलिएक रोग (Celiac Disease): यह एक स्वप्रतिरक्षी रोग है, जिसमें ग्लूटेन खाने पर प्रतिरक्षा तंत्र अपनी ही छोटी आँत पर हमला करता है और पोषक तत्वों के अवशोषण के लिए जिम्मेदार रसांकुरों को नुकसान पहुँचाता है। माना जाता है कि विश्व की लगभग 1% आबादी इस रोग से पीड़ित है और जीवन भर ग्लूटेन से परहेज़ वाला आहार ही इसका एकमात्र उपचार है।
- गेहूँ से एलर्जी (Wheat Allergy): इसमें प्रतिरक्षा तंत्र गेहूँ के प्रोटीनों के प्रति अत्यधिक प्रतिक्रिया करता है, जिससे खाने के कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों के भीतर पित्ती या साँस लेने में कठिनाई हो सकती है।
- गैर-सीलिएक ग्लूटेन संवेदनशीलता (Non-Celiac Gluten Sensitivity): इसमें सीलिएक रोग या एलर्जी न होने पर भी गेहूँ खाने से पेट फूलना या थकान होती है। इसके कारणों पर अभी शोध चल रहा है।
ऐसे लोगों के लिए ‘ग्लूटेन मुक्त’ खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं। अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानकों में आम तौर पर यह लेबल तब लगाया जा सकता है जब खाद्य पदार्थ के प्रति 1 किलोग्राम में ग्लूटेन 20 मिलीग्राम या उससे कम हो। हालाँकि, जिन लोगों को ग्लूटेन से कोई शारीरिक समस्या नहीं होती, उनके लिए ग्लूटेन मुक्त आहार विशेष रूप से अधिक स्वास्थ्यकर होने के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं।
ग्लूटेन एक छोटा-सा जाल है, जो गेहूँ के आटे, पानी और इंसानी हाथों की मेहनत के मेल से बनता है। इसी जाल की बदौलत मनुष्यों को फूली हुई ब्रेड और चबाने पर लचीले नूडल्स मिले तथा केवल आटा गूँधने का तरीका बदलकर वे मनचाही कुरकुरी या लचीली बनावट पाने लगे।
निश्चय ही, कुछ लोगों के लिए यह ऐसा घटक भी है जिससे परहेज़ करना चाहिए। लेकिन इसकी प्रक्रिया समझ लेने से गेहूँ का आटा चुनना और गूँधना बहुत आसान हो जाता है तथा अपने शरीर के अनुकूल आहार भी समझदारी से तैयार किया जा सकता है। गुँथे आटे के भीतर के इस अदृश्य जाल को समझना ही गेहूँ के आटे से स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर व्यंजन बनाने की दिशा में पहला कदम है।
