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पाँच दैत्यों का सामना करने की रूपरेखा, बेवरिज रिपोर्ट (Beveridge Report)

बीमार होने पर अस्पताल जाना, नौकरी छूटने पर बेरोज़गारी भत्ता पाना और उम्र ढलने पर पेंशन से गुज़ारा करना आज कई देशों में स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन महज़ 100 वर्ष पहले तक ऐसा सुरक्षा तंत्र केवल कुछ श्रमिकों को मिला विशेषाधिकार था। राज्य हर नागरिक के जीवन की शुरुआत से अंत तक ज़िम्मेदारी लेगा—इस विचार को एक रूपरेखा में पिरोने वाला दस्तावेज़ ही ‘बेवरिज रिपोर्ट (Beveridge Report)’ है।

सरल शब्दों में, बेवरिज रिपोर्ट ‘विश्व युद्ध क्रमांक 2 के दौरान 1942 में ब्रिटेन में प्रस्तुत वह सरकारी रिपोर्ट है, जिसने ऐसी सामाजिक बीमा व्यवस्था को केंद्र में रखकर युद्ध के बाद की कल्याण व्यवस्था नए सिरे से बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें सभी नागरिक समान बीमा अंशदान दें और जोखिम आने पर समान लाभ पाएँ।’ इसका औपचारिक नाम ‘सामाजिक बीमा और संबद्ध सेवाएँ (Social Insurance and Allied Services)’ है और इसे युद्धोत्तर ब्रिटिश कल्याणकारी राज्य का प्रस्थान बिंदु माना जाता है।

इस सामग्री में हम क्रमशः रिपोर्ट की पृष्ठभूमि, पाँच दैत्यों के रूप में समस्याओं की पहचान, योजना को आधार देने वाले सिद्धांतों और पूर्वशर्तों तथा वास्तविक व्यवस्थाओं में उसके लागू होने की प्रक्रिया और शेष चुनौतियों को देखेंगे।

1942 की बेवरिज रिपोर्ट के पाँच दैत्य और उनसे निपटने की दिशा: अभाव का संबंध सामाजिक बीमा से, बीमारी का स्वास्थ्य और चिकित्सा से, अज्ञान का शिक्षा से, बदहाली का आवास सुधार से तथा निष्क्रियता का व्यापक बेरोज़गारी और रोज़गार बनाए रखने से है। सामाजिक बीमा की तीन पूर्वशर्तें बाल भत्ता, व्यापक स्वास्थ्य एवं पुनर्वास सेवाएँ और रोज़गार बनाए रखना हैं।
बेवरिज रिपोर्ट के पाँच दैत्य और सामाजिक बीमा को आधार देने वाली तीन पूर्वशर्तें। स्रोत: ब्रिटिश संसद, 1942 की बेवरिज रिपोर्ट · हैंसर्ड, बेवरिज रिपोर्ट: चिकित्सा सेवाएँ (1943).

कल्याणकारी राज्य की रूपरेखा: बेवरिज रिपोर्ट की संरचना और विरासत

युद्ध के बीच जन्मी रिपोर्ट

1940 के दशक में ब्रिटेन के एक शहर की सर्द सड़क पर कोट और टोपी पहने लोग सरकारी प्रकाशनों की एक छोटी दुकान के सामने कतार में खड़े हैं और कुछ लोगों के हाथों में धूसर आवरण वाली पुस्तिकाएँ हैं।

1941 के 6वें महीने में ब्रिटेन की गठबंधन सरकार के बिना विभाग वाले मंत्री आर्थर ग्रीनवुड (Arthur Greenwood) ने बिखरी हुई सामाजिक बीमा व्यवस्थाओं की जाँच के लिए एक अंतरविभागीय समिति बनाई। उदारवादी अर्थशास्त्री विलियम बेवरिज (William Beveridge) इसके अध्यक्ष बने। उस समय ब्रिटेन में स्वास्थ्य बीमा, बेरोज़गारी बीमा, पेंशन और कार्यस्थल दुर्घटना मुआवज़ा अलग-अलग चलते थे, जिससे पात्रता और लाभों में असमानता थी तथा बहुत से लोग इनके दायरे से बाहर रह जाते थे।

बेवरिज ने महज़ प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित करने से आगे बढ़कर युद्धोत्तर समाज की दिशा बताने वाली रिपोर्ट लिखी। उन्होंने कहा, “विश्व इतिहास के क्रांतिकारी क्षण पैबंद लगाने के नहीं, क्रांति करने के अवसर होते हैं,” और पुराने ढाँचे से बँधे न रहने की वकालत की।

(1) ज़बरदस्त प्रतिक्रिया
1942 के 12वें महीने की शुरुआत में प्रकाशित होते ही रिपोर्ट इतनी चर्चित हो गई कि लोग इसे खरीदने के लिए कतारों में लग गए। पूरी रिपोर्ट और उसके सारांश की मिलाकर 1944 के 2वें महीने तक 60 × दस हज़ार से अधिक प्रतियाँ बिकीं, और प्रकाशन के तुरंत बाद हुए जनमत सर्वेक्षण में अधिकांश नागरिकों ने कहा कि वे रिपोर्ट के बारे में जानते हैं।

(2) युद्ध और बलिदान के बदले एक वादा
बमबारी और विस्थापन का साथ मिलकर सामना करने वाले नागरिकों ने इस रिपोर्ट को एक ऐसे वादे के रूप में पढ़ा कि युद्ध समाप्त होने पर बेहतर समाज आएगा। विस्थापन के दौरान शहरी ग़रीबों की दयनीय जीवन स्थितियाँ सामने आने से भी सुधार के पक्ष में जनमत मज़बूत हुआ।


पाँच दैत्यों के रूप में समस्याओं की पहचान

1930 के दशक में ब्रिटेन की एक श्रमिक बस्ती के पुराने ईंट के मकानों वाली गली में कपड़े टँगे हैं; दरवाज़े पर माँ और बच्चा, दीवार से टिककर खड़ा बेरोज़गार पुरुष तथा दहलीज़ पर बैठा दुबला बच्चा दिखाई देते हैं।

बेवरिज ने युद्धोत्तर पुनर्निर्माण का रास्ता रोकने वाली पाँच सामाजिक बुराइयों को ‘पाँच दैत्य (Five Giants)’ कहा। उनके अनुसार सामाजिक बीमा इनमें से पहले दैत्य से लड़ने का हथियार था, जबकि बाकी दैत्यों का सामना अन्य नीतियों को मिलकर करना था।

  • अभाव (Want): आय बंद हो जाने या अपर्याप्त होने से जीवन की बुनियादी ज़रूरतें पूरी न कर पाने की स्थिति, जिसका सामाजिक बीमा सीधे सामना करता है।
  • बीमारी (Disease): पैसे न होने के कारण इलाज न मिल पाने की समस्या, जिसके लिए सभी नागरिकों के लिए चिकित्सा सेवाएँ आवश्यक हैं।
  • अज्ञान (Ignorance): शिक्षा के अवसरों की कमी की स्थिति, जिसका समाधान सार्वजनिक शिक्षा का विस्तार है।
  • बदहाली (Squalor): तंग और जर्जर आवासीय परिस्थितियाँ, जिनसे निपटना आवास नीति का काम है।
  • निष्क्रियता (Idleness): इसका अर्थ व्यापक बेरोज़गारी है, जिसमें काम करने की इच्छा होने पर भी नौकरी नहीं मिलती।

रिपोर्ट ने युद्ध से पहले विभिन्न शहरों में हुए ग़रीबी सर्वेक्षणों का विश्लेषण करके माना कि अधिकांश अभाव बेरोज़गारी, बीमारी और वृद्धावस्था जैसी स्थितियों में आय बंद होने से पैदा होता है, जबकि बाकी परिवार के आकार की तुलना में आय अपर्याप्त होने से उत्पन्न होता है।


योजना को आधार देने वाले सिद्धांत और तीन पूर्वशर्तें

1940 के दशक के एक सरकारी दफ़्तर में खिड़की के पास रखी मेज़ पर धूसर आवरण वाली मोटी रिपोर्ट, फ़ाउंटेन पेन, गोल चश्मा, खाली कार्डों का बंडल और लकड़ी की दस्तावेज़ ट्रे रखी हुई है।

बेवरिज योजना के केंद्र में सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य सामाजिक बीमा था। उन्हें आय और संपत्ति जाँचकर ग़रीबी साबित करवाने वाली साधन जाँच (Means Test) नापसंद थी और उनका मानना था कि बीमा अंशदान देने वाले हर व्यक्ति को अधिकार के रूप में लाभ मिलना चाहिए।

(1) छह सिद्धांत
रिपोर्ट ने छह सिद्धांत रखे: समान राशि का निर्वाह लाभ, समान राशि का बीमा अंशदान, प्रशासनिक ज़िम्मेदारी का एकीकरण, लाभों का पर्याप्त स्तर, सभी जोखिमों और लोगों को समेटने वाली व्यापकता तथा जीवन स्थितियों के अनुसार बीमित व्यक्तियों का वर्गीकरण। राज्य को केवल न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी देनी थी और उससे ऊपर की सुरक्षा व्यक्ति स्वयं बढ़ा सके, इसकी गुंजाइश छोड़ी गई थी।

(2) योजना की सफलता की पूर्वशर्तें
बेवरिज ने कहा कि केवल सामाजिक बीमा से अभाव दूर नहीं हो सकता और इसके साथ तीन शर्तें भी रखीं।

  • बाल भत्ता (Children's Allowances): परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होने से पैदा होने वाली ग़रीबी रोकने के लिए दिया जाने वाला भत्ता।
  • व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ (Comprehensive Health and Rehabilitation Services): ऐसी चिकित्सा व्यवस्था जिसमें हर व्यक्ति इलाज और पुनर्वास सेवाएँ प्राप्त कर सके।
  • रोज़गार बनाए रखना (Maintenance of Employment): व्यापक बेरोज़गारी से बचने पर ही बीमा व्यवस्था की वित्तीय स्थिति भी टिक सकती है।

वास्तविक व्यवस्थाओं में उतरी विरासत और शेष चुनौतियाँ

1940 के दशक के अंतिम वर्षों में ब्रिटेन के एक उजले सार्वजनिक चिकित्सालय के प्रतीक्षालय में सफ़ेद वर्दी पहने नर्स गोद में शिशु लिए माँ का आत्मीयता से स्वागत कर रही है और छड़ी लिए एक वृद्ध लकड़ी की कुर्सी पर प्रतीक्षा कर रहा है।

युद्ध के अंतिम चरण में, 1945 के 6वें महीने में सबसे पहले बाल भत्ते का प्रावधान करने वाला परिवार भत्ता अधिनियम बना। उसी वर्ष आम चुनाव में पाँच दैत्यों को हराने का वादा करने वाली लेबर पार्टी की बड़ी जीत के बाद बाकी प्रस्ताव भी क़ानून बन गए। विडंबना यह रही कि स्वयं बेवरिज उस चुनाव में अपनी सीट हार गए।

पालने से क़ब्र तक

1946 में राष्ट्रीय बीमा अधिनियम और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा अधिनियम तथा 1948 में राष्ट्रीय सहायता अधिनियम एक के बाद एक बने। 1948 के 7वें महीने की 5 तारीख को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (National Health Service) शुरू हुई, जिसमें सभी नागरिक इलाज के ख़र्च की चिंता किए बिना उपचार पा सकते थे, और ‘पालने से क़ब्र तक’ की अभिव्यक्ति ब्रिटिश कल्याणकारी राज्य का प्रतीक बन गई।

आलोचनाएँ और सीमाएँ

समान राशि वाले लाभों की आलोचना हुई कि वे महँगाई और क्षेत्रीय अंतरों को ध्यान में नहीं रखते, इसलिए गुज़ारे की गारंटी देने के लिए अपर्याप्त हैं। अंततः साधन जाँच पर आधारित सार्वजनिक सहायता पर निर्भर लोगों की संख्या बढ़ी। इसके अलावा, विवाहित महिलाओं को पति पर निर्भर मानकर योजना तैयार करना आज भी इसकी प्रमुख सीमाओं में गिना जाता है।


बेवरिज रिपोर्ट ने बिखरी हुई सामाजिक बीमा व्यवस्थाओं को एकजुट किया और अभाव, बीमारी, अज्ञान, बदहाली तथा निष्क्रियता नामक पाँच दैत्यों का सामना करने के लिए युद्धोत्तर समाज की रूपरेखा प्रस्तुत की। यह रूपरेखा राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा और राष्ट्रीय बीमा के रूप में साकार हुई तथा दुनिया के कई देशों की कल्याण व्यवस्थाओं के लिए आदर्श बनी।

80 वर्ष बीत जाने के बाद भी कल्याण व्यवस्था से जुड़ी बहसें अंततः बेवरिज के इसी प्रश्न पर लौटती हैं कि किसे, कितनी और किस तरीके से सुरक्षा की गारंटी दी जाए।

किसी समाज को किन दैत्यों का सामना करना है, इसकी सही पहचान करना बेहतर कल्याण व्यवस्था की रूपरेखा बनाने का पहला कदम है।

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