थ्रिलर फ़िल्में देखते समय अक्सर ऐसे दृश्य मिलते हैं जिनमें नायक और खलनायक एक ब्रीफ़केस के पीछे अपनी जान दाँव पर लगा देते हैं। लेकिन फ़िल्म खत्म होने के बाद ज़रा सोचें तो एहसास होता है कि उस ब्रीफ़केस में क्या था, यह अंत तक पता न चलने पर भी कहानी भरपूर दिलचस्प लगी। दर्शकों को बाँधे रखने वाली चीज़ ब्रीफ़केस के भीतर की वस्तु नहीं, बल्कि उसके इर्दगिर्द चलने वाली पीछा करने की घटनाएँ और तनाव थे।
फ़िल्म अध्ययन में ऐसे कथात्मक उपकरण को ‘मैकगफिन (MacGuffin)’ कहते हैं, जो पात्रों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है, लेकिन दर्शकों के लिए उसकी असलियत जानना उतना ज़रूरी नहीं होता। मैकगफिन की विशेषता यह है कि वह कहानी को आगे बढ़ाने वाले इंजन का काम करता है, लेकिन स्वयं कहानी का मुख्य पात्र नहीं बनता।
इस सामग्री में हम क्रम से समझेंगे कि मैकगफिन नाम कहाँ से आया, हिचकॉक ने इसकी क्या व्याख्या की, इसकी आवश्यक शर्तें क्या हैं, फ़िल्मों में इसके प्रमुख उदाहरण कौन से हैं और यह मिलते-जुलते कथात्मक उपकरणों से कैसे अलग है।
मैकगफिन का सिद्धांत और उपयोग
नाम की उत्पत्ति और हिचकॉक की व्याख्या


मैकगफिन शब्द को लोकप्रिय बनाने वाले व्यक्ति सस्पेंस फ़िल्मों के महान निर्देशक अल्फ़्रेड हिचकॉक (Alfred Hitchcock) थे। माना जाता है कि इसका पहली बार इस्तेमाल उनके साथ काम करने वाले पटकथा लेखक एंगस मैकफेल (Angus MacPhail) ने किया था। हिचकॉक ने 1962 में फ़्रांसीसी निर्देशक फ़्रांस्वा त्रूफ़ो (François Truffaut) के साथ एक लंबी बातचीत में नीचे दिए गए मज़ाक के ज़रिए मैकगफिन को समझाया था। यह बातचीत 1966 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई।
ट्रेन में बैठे दो आदमियों में से एक ऊपर रखे बंडल की ओर इशारा करके पूछता है कि वह क्या है। दूसरा जवाब देता है कि वह मैकगफिन है, यानी स्कॉटलैंड के पहाड़ी इलाकों में शेर पकड़ने का उपकरण। जब पहला आदमी कहता है कि स्कॉटलैंड के पहाड़ी इलाकों में तो शेर होते ही नहीं, तो दूसरा जवाब देता है कि फिर यह मैकगफिन भी नहीं है। इस कहानी से हिचकॉक यह दिखाना चाहते थे कि मैकगफिन असल में कुछ भी नहीं होता और उसका बस कोई नाम होना ही काफ़ी है।
उसी बातचीत में हिचकॉक ने यह भी कहा कि ठगों वाली कहानियों में आम तौर पर हार और जासूसी कहानियों में गोपनीय दस्तावेज़ मैकगफिन होते हैं। पात्र उस वस्तु को पाने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं, लेकिन दर्शकों को उसके बारे में ठीक-ठीक पता न होने पर भी कहानी समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। हिचकॉक के लिए मैकगफिन कहानी शुरू करने का बहाना था और फ़िल्म का असली मज़ा उस बहाने से पैदा होने वाले सस्पेंस में था।
मैकगफिन की तीन शर्तें

मैकगफिन दस्तावेज़ हो, गहने हों या पैसा, उसके बाहरी रूप से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। महत्वपूर्ण यह है कि कहानी में उसकी भूमिका क्या है। किसी कथात्मक उपकरण को मैकगफिन कहने के लिए आम तौर पर निम्नलिखित शर्तें होती हैं।
(1) पात्रों को उसकी सख्त ज़रूरत होती है
नायक और विरोधी पक्ष, दोनों उसे हासिल करने या सुरक्षित रखने की कोशिश करते हैं। यही इच्छा पीछा करने और पीछा किए जाने की घटनाओं को जन्म देती है।
(2) दर्शकों के लिए उसकी असलियत महत्वपूर्ण नहीं होती
दर्शकों की दिलचस्पी इस बात में अधिक होती है कि उस वस्तु के कारण पात्र किस ख़तरे में पड़ता है और उससे कैसे निकलता है, बजाय इसके कि वह वस्तु ठीक-ठीक क्या है।
(3) उसे किसी दूसरी चीज़ से बदल देने पर भी कहानी वैसी ही रहती है
यदि गोपनीय दस्तावेज़ों की जगह गहने रख देने पर भी फ़िल्म का घटनाक्रम लगभग वैसा ही रहता है, तो उस वस्तु को मैकगफिन माना जा सकता है। इसीलिए कभी मैकगफिन के बारे में अंत तक विस्तार से बताया ही नहीं जाता और कभी वह कहानी के बीच में चुपके से गायब हो जाता है।
फ़िल्मों में मैकगफिन के प्रमुख उदाहरण

हिचकॉक ने अपनी कई फ़िल्मों में मैकगफिन का खूब इस्तेमाल किया और बाद में अनेक निर्देशकों ने भी यह तरीका अपनाया। इसके कुछ प्रसिद्ध उदाहरण इस प्रकार हैं।
- 39 सीढ़ियाँ (The 39 Steps, 1935): एक जासूसी संगठन जिन सैन्य रहस्यों को चोरी-छिपे विदेश पहुँचाना चाहता है, उन्हीं के कारण नायक का पीछा होने लगता है।
- बदनाम (Notorious, 1946): शराब की बोतल में छिपा यूरेनियम अयस्क जासूसी अभियान का लक्ष्य बन जाता है।
- उत्तर-उत्तरपश्चिम की ओर मुड़ो (North by Northwest, 1959): एक प्रतिमा के भीतर छिपी माइक्रोफ़िल्म को लेकर पीछा करने की घटनाएँ होती हैं। त्रूफ़ो के साथ बातचीत में हिचकॉक ने इसे सबसे खोखला और इसीलिए सबसे बेहतरीन मैकगफिन बताया था।
- साइको (Psycho, 1960): मुख्य पात्र द्वारा कंपनी से चुराए गए 4 × दस हज़ार डॉलर शुरू में कहानी का केंद्र लगते हैं, लेकिन जल्द ही एक बिल्कुल अलग घटना के पीछे दब जाते हैं।
- पल्प फ़िक्शन (Pulp Fiction, 1994): जिस ब्रीफ़केस की रक्षा पात्र अपनी जान दाँव पर लगाकर करते हैं, उसके खुलने पर हर बार केवल रोशनी बाहर निकलती है। उसके भीतर क्या है, यह अंत तक सामने नहीं आता।
- मिशन इम्पॉसिबल 3 (Mission: Impossible III, 2006): ‘खरगोश का पैर (Rabbit's Foot)’, जिसे हर कोई हासिल करना चाहता है, वास्तव में क्या है, यह फ़िल्म के अंत तक पता नहीं चलता।
मिलते-जुलते उपकरणों से अंतर

मैकगफिन को अक्सर कुछ ऐसे कथात्मक उपकरणों के साथ गड्डमड्ड कर दिया जाता है जिनके नामों का इस्तेमाल मिलते-जुलते ढंग से होता है। इनके बीच का अंतर जानने से फ़िल्म देखते या कहानी लिखते समय इन उपकरणों को अधिक सटीकता से समझा और इस्तेमाल किया जा सकता है।
- चेखव की बंदूक (Chekhov's Gun): यह सिद्धांत कहता है कि शुरुआत में टाँगी गई बंदूक आगे चलकर ज़रूर चलनी चाहिए। जो दिखाया गया है उसका इस्तेमाल अवश्य होना चाहिए—इस दृष्टि से यह मैकगफिन के विपरीत है, जिसकी असलियत अंत तक महत्वपूर्ण नहीं होती।
- लाल हेरिंग मछली (Red Herring): यह ऐसा भ्रामक संकेत है जो जानबूझकर दर्शकों या पात्रों को ग़लत अपराधी या सुराग पर संदेह करने के लिए उकसाता है। इसका उद्देश्य दर्शकों को धोखे में डालकर दूसरी दिशा में ले जाना होता है।
- कथानक उपकरण (Plot Device): यह कहानी को आगे बढ़ाने वाले सभी उपकरणों के लिए इस्तेमाल होने वाला व्यापक शब्द है। मैकगफिन उन्हीं में से एक है।
कोरिया में मैकगफिन शब्द का इस्तेमाल अक्सर दर्शकों को उलझाने वाली चाल या ऐसे संकेत के अर्थ में होता है जिसका आगे कोई खुलासा नहीं किया जाता। लेकिन इसका मूल अर्थ दर्शकों को धोखा देने वाले भ्रामक संकेत की अपेक्षा पात्रों को सक्रिय करने वाले बहाने के अधिक करीब है। फ़िल्म देखते समय पात्र जिस वस्तु का पीछा कर रहे हैं उससे अधिक ध्यान उस वस्तु के कारण सामने आने वाले उनके निर्णयों और संबंधों पर दें, तो कहानी का असली केंद्र दिखाई देता है।
अपनी कहानी लिखते समय मैकगफिन का अच्छा इस्तेमाल करने के लिए दो बातें याद रखना उपयोगी है। पहली, पात्र उस वस्तु को क्यों चाहता है, इसका कारण इतना स्पष्ट होना चाहिए कि दर्शक उसे तुरंत समझकर स्वीकार कर लें। दूसरी, वस्तु की असलियत समझाने में समय लगाने के बजाय दृश्यों का सोच-समझकर इस्तेमाल उसके इर्दगिर्द पैदा होने वाले संकटों और निर्णयों को दिखाने में करना चाहिए।
जिस वस्तु के पीछे सब भाग रहे हैं उससे अधिक ध्यान उसका पीछा करने वाले लोगों की कहानी पर देना ही फ़िल्म को गहराई से समझने का पहला कदम है।