किसी देश में अखबार सरकार की अनुमति के बिना एक पंक्ति भी नहीं छाप सकते, तो किसी देश में सरकार की तीखी आलोचना करने वाले लेख रोज छपते हैं। सभी को ‘प्रेस’ कहा जाता है, लेकिन उनके काम और जिन दायित्वों का उन्हें पालन करना होता है, वे देश और समय के अनुसार इतने अलग होते हैं। आखिर प्रेस को किसके लिए और किन सिद्धांतों पर काम करना चाहिए?
इस प्रश्न के लिए पहली बार एक व्यवस्थित रूपरेखा प्रस्तुत करने वाली पुस्तक थी 1956 में प्रकाशित ‘प्रेस के 4 सिद्धांत (Four Theories of the Press)’। फ्रेडरिक सीबर्ट, थियोडोर पीटरसन और विल्बर श्रैम द्वारा मिलकर लिखी गई इस पुस्तक ने दुनिया के प्रेस को चार सिद्धांतों—सत्तावादी, स्वतंत्रतावादी, सामाजिक उत्तरदायित्व और सोवियत साम्यवादी सिद्धांत—में बाँटकर समझाया। लंबे समय तक इसे प्रेस के तुलनात्मक अध्ययन की आधारभूत पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ा गया।
इस सामग्री में हम क्रम से देखेंगे कि इन चारों सिद्धांतों की मान्यताएँ क्या थीं, सामाजिक उत्तरदायित्व सिद्धांत कहाँ से आया, इस रूपरेखा की क्या आलोचनाएँ हुईं और आज के समय से इसका क्या संबंध है।
प्रेस की भूमिका तय करने वाली चार विचारधाराएँ
सत्तावादी सिद्धांत और स्वतंत्रतावादी सिद्धांत

सबसे पहले, ये दोनों सिद्धांत इस प्रश्न पर अलग होते हैं कि ‘सत्य की खोज कौन करता है?’
(1) सत्तावादी सिद्धांत (Authoritarian Theory)
यूरोप में पुनर्जागरण के उत्तरार्ध में स्थापित हुई इस विचारधारा के अनुसार, सत्य का पता कुछ गिने-चुने बुद्धिमान लोग लगाते हैं और प्रेस उनके नेतृत्व वाली सरकार की सहायता का साधन है। इसलिए छपाई के लिए अनुमति और सेंसरशिप लागू होती है तथा शासक की आलोचना करना दंडनीय होता है।
(2) स्वतंत्रतावादी सिद्धांत (Libertarian Theory)
यह विचारधारा मिल्टन, लॉक, मिल और जेफरसन जैसे विचारकों के लेखन से विकसित हुई। इसके अनुसार, सत्य की खोज करना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है और विभिन्न मतों के स्वतंत्र रूप से टकराने वाले ‘विचारों के मुक्त बाजार’ में अंततः सत्य स्पष्ट हो जाता है। प्रेस सरकार पर निगरानी रखने वाले ‘4वें स्तंभ (Fourth Estate)’ की भूमिका निभाता है।
(3) दोनों में अंतर
सत्तावादी व्यवस्था में सरकार प्रेस के ऊपर होती है, जबकि स्वतंत्रतावादी व्यवस्था में प्रेस सरकार पर नजर रखने की स्थिति में होता है। आधुनिक लोकतांत्रिक देशों की प्रेस व्यवस्थाओं में से अधिकांश का आरंभ स्वतंत्रतावादी विचारधारा से हुआ।
सामाजिक उत्तरदायित्व सिद्धांत के उदय का कारण

20वीं सदी में प्रवेश करते ही स्वतंत्रतावादी सिद्धांत के सामने एक नई समस्या आई। अखबार और प्रसारण संस्थान विशाल कंपनियाँ बन गए, जिससे वह बाजार समाप्त हो गया जहाँ कोई भी आसानी से अखबार निकाल सकता था। परिणामस्वरूप, मुट्ठी भर मालिक व्यवहार में यह तय करने लगे कि किन लोगों और किन तथ्यों की जानकारी जनता तक पहुँचेगी।
- हचिन्स आयोग (Hutchins Commission): 1947 में रॉबर्ट हचिन्स के नेतृत्व वाले ‘प्रेस स्वतंत्रता आयोग’ ने ‘एक स्वतंत्र और उत्तरदायी प्रेस’ नामक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसने चेतावनी दी कि केवल सरकारी हस्तक्षेप रोकना पर्याप्त नहीं है; प्रेस को भी नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक हित को स्वयं अपनाना होगा।
- पाँच अपेक्षाएँ (Five Requirements): इनमें दिन भर की विश्वसनीय खबरें, सार्वजनिक अभिव्यक्ति का मंच, रूढ़ धारणाओं से मुक्त समावेशी रिपोर्टिंग, लोकतांत्रिक जीवन की गहराई में उतरने वाली कहानियाँ और ऐसा परिवेश शामिल था जिसमें सभी लोगों की समाचारों तक पहुँच हो।
- सामाजिक उत्तरदायित्व सिद्धांत (Social Responsibility Theory): इस विचार के अनुसार, प्रेस के पास अपार शक्ति है, इसलिए उसका दायित्व है कि वह सभी मतों को निष्पक्ष रूप से स्थान दे और नागरिकों को निर्णय लेने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराए। यह माना गया कि यदि प्रेस स्वयं उत्तरदायित्व नहीं निभाता, तो अन्य सार्वजनिक संस्थाएँ उससे इसकी माँग कर सकती हैं।
सीबर्ट और उनके सहलेखकों ने समझाया कि यह सिद्धांत केवल आयोग के विद्वानों के मन से निकली कोई अमूर्त कल्पना नहीं था, बल्कि उस धारा का हिस्सा था जिसकी चर्चा जिम्मेदार संपादक और प्रकाशक पहले से करते आए थे।
सोवियत साम्यवादी सिद्धांत और चारों सिद्धांतों की तुलना

चौथा सिद्धांत प्रेस के उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसका प्रतिनिधित्व उस समय सोवियत संघ करता था। पुस्तक ने इसे पुराने सत्तावाद का अधिक व्यापक और सक्रिय रूप माना।
(1) सोवियत साम्यवादी सिद्धांत (Soviet Communist Theory)
मार्क्सवाद में जड़ें रखने वाला यह सिद्धांत प्रेस को मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी के लक्ष्यों को पूरा करने का साधन मानता है। प्रेस का स्वामित्व राज्य के पास होता है और पार्टी उसकी दिशा तय करती है। समाजवाद के निर्माण में सहायता देने वाला प्रचार और शिक्षा उसका सबसे बड़ा कार्य है।
(2) स्वामित्व और नियंत्रण
सत्तावाद अनुमति और सेंसरशिप के माध्यम से, स्वतंत्रतावाद बाजार और निजी स्वामित्व के माध्यम से, सामाजिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत बाजार के साथ पेशेवर नैतिकता और सार्वजनिक अपेक्षाओं को जोड़कर, और सोवियत व्यवस्था राज्य के स्वामित्व तथा पार्टी के निर्देशन के माध्यम से प्रेस का संचालन करती है।
(3) प्रेस का उद्देश्य
इनके उद्देश्य क्रमशः सरकार की सहायता करना, सत्य की खोज करना, नागरिकों को निर्णय लेने में सहायता देना और समाजवादी समाज का निर्माण करना हैं।

आलोचनाएँ और आज की उपयोगिता

इस पुस्तक का प्रभाव इतना व्यापक था कि एक समय इसे ‘प्रेस के तुलनात्मक अध्ययन की बाइबिल’ कहा जाता था, लेकिन इसकी सीमाएँ भी स्पष्ट हैं।
(1) शीत युद्ध का दृष्टिकोण
पुस्तक जिस 1950 के दशक में लिखी गई थी, उस समय के अमेरिका और सोवियत संघ के टकराव की उस पर गहरी छाप है। इसलिए इसकी आलोचना हुई कि यह पश्चिमी स्वतंत्रतावाद को मानक मानती है और अन्य व्यवस्थाओं को कमतर आँकती है।
(2) वास्तविकता को समेट न पाने वाली सरलता
प्रेस को केवल चार खानों में बाँटने से विकासशील देशों के प्रेस, सार्वजनिक प्रसारण या आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे स्वरूपों को समझाना कठिन हो जाता है, जो किसी भी खाने में नहीं समाते।
(3) बाद में सामने आए विकल्प
2004 में डैनियल हैलिन और पाओलो मैनचिनी ने ‘मीडिया प्रणालियों की तुलना’ में पश्चिमी प्रेस को तीन प्रतिमानों—ध्रुवीकृत बहुलतावाद, लोकतांत्रिक निगमवाद और स्वतंत्रतावाद—में बाँटकर अधिक यथार्थपरक रूपरेखा प्रस्तुत की।
(4) आज भी बना हुआ प्रश्न
फिर भी, ‘प्रेस किसके लिए अस्तित्व में है?’ इस प्रश्न को चार उत्तरों में व्यवस्थित करने का इसका योगदान आज भी कायम है। फर्जी खबरों और प्लेटफॉर्म के युग में उत्तरदायित्व पर विचार करते समय भी यह प्रश्न फिर उठता है।
प्रेस का स्वरूप एक ऐसे दर्पण की तरह है जिसमें दिखता है कि उसका समाज सत्य, सत्ता और स्वतंत्रता को कैसे समझता है। ये चार सिद्धांत दिखाते हैं कि एक ही प्रश्न के अलग-अलग उत्तर रहे हैं और हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि आज हमारे आसपास का प्रेस किस उत्तर पर टिका है।
हमारे सामने आने वाली खबरें किसके लिए बनाई गई हैं, यह प्रश्न एक बार पूछना ही प्रेस के 4 सिद्धांतों को समझने की दिशा में पहला कदम है।