हर सुबह स्मार्टफ़ोन खोलते ही हम ढेरों समाचार लेखों, रियल टाइम में सबसे अधिक खोजे जा रहे शब्दों और सोशल मीडिया के ट्रेंड टैब से रूबरू होते हैं। किसी दिन कोई खास राजनीतिक मुद्दा पूरे इंटरनेट पर छाया रहता है, तो किसी दिन किसी मशहूर हस्ती का निजी जीवन या नए वायरस से जुड़ी खबरें सुर्खियों में होती हैं।
ऐसे में एक सवाल है जो हमें कभी खुद से पूछकर देखना चाहिए।
"आज मैं इस विषय पर इतना गहराई से क्यों सोच रहा हूँ और इसके बारे में बात क्यों कर रहा हूँ?"
हम अक्सर मानते हैं कि हम अपनी रुचि या अपने आकलन में महत्वपूर्ण लगने वाले विषय खुद चुनते हैं और उन पर विचार करते हैं। लेकिन पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन इस बारे में थोड़ा अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। जनसंचार माध्यम (Media) जिन विषयों को महत्वपूर्ण खबर बताकर बार-बार सामने लाते हैं, लोग भी स्वाभाविक रूप से उन्हें 'सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण मामला' मानने लगते हैं।
मीडिया जनता की रुचियों और प्राथमिकताओं को आकार देता है—इस विचार को ही 'एजेंडा निर्धारण सिद्धांत (Agenda-Setting Theory)' कहते हैं, जो पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन की प्रमुख अवधारणाओं में से एक है। इस लेख में हम एजेंडा निर्धारण सिद्धांत की अवधारणा, उसकी कार्यप्रणाली, ठोस उदाहरणों और नए मीडिया के युग में इसके विकसित होने के तरीकों पर गहराई से चर्चा करेंगे।
एजेंडा निर्धारण सिद्धांत की संरचना और वास्तविक जीवन में उसका अनुप्रयोग
एजेंडा निर्धारण सिद्धांत क्या है?

एजेंडा निर्धारण सिद्धांत की स्थापना अमेरिकी संचार विद्वानों मैक्सवेल मैककॉम्ब्स (Maxwell McCombs) और डोनाल्ड शॉ (Donald Shaw) द्वारा 1972 में प्रकाशित एक अध्ययन से हुई। उन्होंने 1968 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उत्तरी कैरोलाइना के चैपल हिल क्षेत्र के मतदाताओं पर अध्ययन करके मीडिया की खबरों और मतदाताओं द्वारा महत्वपूर्ण माने जाने वाले मुद्दों के बीच सहसंबंध की जाँच की।
नतीजे चौंकाने वाले थे। मीडिया ने जिन मुद्दों को प्रमुखता दी थी, जैसे अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और कल्याण, वे उन मुद्दों से लगभग पूरी तरह मेल खाते थे जिन्हें मतदाताओं ने "इस समय हमारे समाज की सबसे महत्वपूर्ण समस्या यही है" कहकर चुना था।
एक प्रसिद्ध कथन इस अध्ययन के मूल विचार को बहुत अच्छी तरह समेटता है। संचार विद्वान बर्नार्ड कोहेन (Bernard Cohen) ने कहा था:
"मीडिया लोगों को 'कैसे सोचना है (What to think)' यह बताने में भले ही विफल हो जाए, लेकिन 'किस बारे में सोचना है (What to think about)' यह बताने में बेहद प्रभावी होता है।
अर्थात, मीडिया किसी मामले में "यह सही है" या "गलत है" जैसी राय थोपे बिना भी, किसी मुद्दे को 'बार-बार' और 'प्रमुखता से' दिखाकर उसे जनता के मन में एक 'महत्वपूर्ण मामला' बना सकता है।
समझने में मदद करने वाले रोजमर्रा के उदाहरण

इस अवधारणा को थोड़ा और आसानी से समझने के लिए रोजमर्रा के कुछ उदाहरण लेते हैं।
उदाहरण 1: पर्यावरण प्रदूषण की खबरें और हमारी दिलचस्पी
मान लीजिए कि किसी दिन एक समाचार संस्थान ने 'प्लास्टिक कचरे की समस्या' पर विशेष पड़ताल की और पूरे हफ्ते उसे अपने मुख्य समाचार कार्यक्रम में सबसे पहले दिखाया। इन खबरों को देखने से पहले लोगों को एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाले कपों के उपयोग पर शायद खास अपराधबोध नहीं होता था। लेकिन जब रोज प्लास्टिक की समस्या पर खबरें आने लगती हैं, तो लोग दोस्तों से मिलकर कहने लगते हैं, "आजकल प्लास्टिक कचरे की समस्या सचमुच बहुत गंभीर हो गई है", "हमें अपना टंबलर साथ लेकर चलना चाहिए।" इस तरह मीडिया ने 'प्लास्टिक प्रदूषण' के एजेंडे को लोगों की सोच में प्रमुख स्थान दे दिया।
उदाहरण 2: रेस्तराँ की समीक्षाएँ और प्रमुख व्यंजन
यदि कोई भोजन संबंधी ब्लॉग या कार्यक्रम किसी खास रेस्तराँ के 'मसालेदार गल्बी-ज्जिम', यानी धीमी आँच पर पकाई गई मसालेदार पसलियों के व्यंजन, पर लगातार जोर देता है, तो वहाँ जाने वाले ग्राहक स्वाभाविक रूप से कहते हैं, "सुना है वहाँ का मसालेदार गल्बी-ज्जिम मशहूर है", और सबसे पहले उसी व्यंजन पर विचार करते हैं। उस रेस्तराँ का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन वास्तव में कौन-सा है, इससे अलग, मीडिया ने यह तय कर दिया कि लोग किस विकल्प पर विचार करेंगे, यानी उनका एजेंडा क्या होगा।
एजेंडा निर्धारण का विस्तार: स्तर 2 का एजेंडा निर्धारण (विशेषता एजेंडा निर्धारण)

शुरुआती एजेंडा निर्धारण सिद्धांत का ध्यान इस बात पर था कि "मीडिया हमें किस बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है", लेकिन बाद में शोधकर्ता एक कदम आगे बढ़े। इसे स्तर 2 का एजेंडा निर्धारण (Second-level Agenda Setting) या विशेषता एजेंडा निर्धारण (Attribute Agenda Setting) कहा जाता है।
इस अवधारणा के अनुसार मीडिया केवल किसी विषय या मुद्दे को चुनने तक सीमित नहीं रहता। वह उस विषय की 'किस विशेषता' पर जोर देता है, इसके आधार पर जनता के मूल्यांकन और रवैये को भी प्रभावित करता है।
- उदाहरण: नई तकनीक (AI) को अपनाने से जुड़ी खबरें
- 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का विकास' जैसे एक ही विषय पर खबर देते हुए भी मीडिया के प्रस्तुत करने के तरीके के अनुसार जनता की प्रतिक्रिया बदल जाती है।
- समाचार संस्थान A (सकारात्मक विशेषताओं पर जोर): "AI से उत्पादकता में क्रांतिकारी बदलाव और चिकित्सकीय निदान की सटीकता में सुधार" पर केंद्रित खबरें देता है → जनता AI को 'आशाजनक और उपयोगी तकनीक' मानती है।
- समाचार संस्थान B (नकारात्मक विशेषताओं पर जोर): "AI के कारण नौकरियाँ जाने और निजी जानकारी की गोपनीयता भंग होने का खतरा" पर केंद्रित खबरें देता है → जनता AI को 'खतरनाक और विनियमित किए जाने योग्य चीज' मानती है।
- 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का विकास' जैसे एक ही विषय पर खबर देते हुए भी मीडिया के प्रस्तुत करने के तरीके के अनुसार जनता की प्रतिक्रिया बदल जाती है।
इस तरह मीडिया किसी खास विशेषता को एक फ्रेम (Frame) में रखकर उस मुद्दे को देखने का जनता का 'नजरिया' भी गढ़ता है।
डिजिटल मीडिया के युग में एजेंडा निर्धारण: जब जनता एजेंडा बनाती है

पहले जब समाचार पत्रों और टेलीविजन प्रसारण का समाचार जगत पर एकाधिकार था, तब समाचार संस्थान गेटकीपर (Gatekeeper, द्वारपाल) की भूमिका पर भी एकाधिकार रखते थे और एकतरफा ढंग से एजेंडा तय करते थे। लेकिन आज इंटरनेट, सोशल मीडिया (SNS) और यूट्यूब के व्यापक प्रसार से यह संरचना काफी बदल गई है।
- उलटा एजेंडा निर्धारण (Reverse Agenda-Setting)
यह वह प्रक्रिया है जिसमें कोई घटना पहले ऑनलाइन समुदायों या सोशल मीडिया पर इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बनती है, जैसे किसी कंपनी का अनुचित व्यवहार या कोई प्रेरक नेक कार्य, और फिर उसकी सूचना पारंपरिक मीडिया, यानी समाचार पत्रों और प्रसारण संस्थानों, तक पहुँचकर प्रमुख खबर बन जाती है। इस तरह एक ऐसी धारा बनी है जिसमें जनता सीधे मीडिया का एजेंडा तय करती है।
- एल्गोरिदम और बिखरा हुआ एजेंडा
पहले पूरे देश के लोग 9 बजे के समाचार देखकर लगभग एक जैसे एजेंडे साझा करते थे, जबकि आज के समाज में यूट्यूब या एल्गोरिदम आधारित अनुशंसा प्रणालियों के कारण हर व्यक्ति को अलग-अलग जानकारी मिलती है। इससे पूरी जनता द्वारा साझा किए जाने वाले 'सामूहिक एजेंडे' कम होते जाते हैं और कभी-कभी 'प्रतिध्वनि कक्ष (Echo Chamber)' की स्थिति बनती है, जिसमें अलग-अलग समूह अपने-अपने अलग मुद्दों में ही डूबे रहते हैं।
मीडिया साक्षरता (Media Literacy) की आवश्यकता
एजेंडा निर्धारण सिद्धांत स्पष्ट रूप से दिखाता है कि रोज हमारे सामने आने वाला मीडिया केवल सूचना पहुँचाने वाला माध्यम नहीं है। मीडिया कोई पारदर्शी खिड़की नहीं है जो दुनिया की हर घटना को ज्यों का त्यों दिखाती हो। वह एक ऐसे फ्रेम की भूमिका निभाता है जो अपने तय मानदंडों और दृष्टिकोण के अनुसार केवल कुछ हिस्सों को आवर्धक काँच से उभारकर दिखाता और उन पर जोर देता है।
तो सूचना की इस बाढ़ के बीच जी रहे हमें कैसा रवैया अपनाना चाहिए?
सबसे जरूरी है 'स्वतंत्र और आलोचनात्मक सोच'। समाचार देखते या पढ़ते समय केवल प्रस्तुत सामग्री ग्रहण करने से आगे बढ़कर, हमें इस तरह के सवाल पूछने की आदत डालनी चाहिए।
"आज इतने सारे समाचार संस्थान इस घटना को इतनी प्रमुखता क्यों दे रहे हैं?
"क्या इस मुद्दे के पीछे कोई और महत्वपूर्ण समस्या दब गई है या उसका उल्लेख नहीं हो रहा है?
"मीडिया इस मामले के किन पहलुओं पर ही जोर दे रहा है?
एजेंडा निर्धारण सिद्धांत को समझना केवल पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययन का अकादमिक ज्ञान जुटाना नहीं है। इसका अर्थ है मीडिया द्वारा आकार दिए जा रहे जनमत के प्रवाह को थोड़ा पीछे हटकर देखना और अपना संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने के लिए 'मीडिया साक्षरता (Media Literacy)' का एक शक्तिशाली साधन हासिल करना।