लोगों से भरे रेस्तराँ या शोरगुल वाली महफ़िल में भी हम सामने बैठे दोस्त की बात आसानी से समझ लेते हैं। तब भी, जब आसपास दर्जनों लोग एक साथ बोल रहे हों। लेकिन हैरानी की बात है कि बातचीत में डूबे होने के दौरान दूर से कोई हमारा नाम पुकारे, तो हमारा सिर अपने आप उस ओर घूम जाता है। जबकि हम स्पष्ट रूप से उस आवाज़ पर ध्यान नहीं दे रहे थे।
इस तरह ‘कई आवाज़ों के मिले-जुले माहौल में अपनी इच्छित आवाज़ पर ध्यान देकर उसे चुनकर सुनने और साथ ही अनसुनी की जा रही आवाज़ों में भी अपने नाम जैसी महत्वपूर्ण जानकारी पर प्रतिक्रिया देने की घटना’ को ‘कॉकटेल पार्टी प्रभाव (Cocktail Party Effect)’ कहते हैं। हाथों में कॉकटेल के गिलास लिए अलग-अलग बातचीत करते लोगों की पार्टी की कल्पना करें, तो यह नाम आसानी से समझ में आता है।
इस लेख में हम क्रम से देखेंगे कि कॉकटेल पार्टी प्रभाव पर शुरुआती शोध किस पृष्ठभूमि में हुआ, अनसुनी की गई आवाज़ों के प्रसंस्करण को लेकर कौन-से सिद्धांत हैं, इस घटना में लोगों के बीच क्या अंतर छिपे हैं और रोज़मर्रा के जीवन तथा तकनीक में इसका क्या उपयोग है।
शोर में एक आवाज़ चुनकर सुनने की क्षमता, कॉकटेल पार्टी प्रभाव
केवल एक कान से सुनने का प्रयोग

इस घटना का पहली बार व्यवस्थित अध्ययन ब्रिटिश इंजीनियर और संज्ञानात्मक वैज्ञानिक कॉलिन चेरी (Colin Cherry) ने किया था। 1953 में प्रकाशित अपने शोध में उन्होंने इस प्रश्न को ‘कॉकटेल पार्टी समस्या’ कहा कि कई लोगों के एक साथ बोलने पर इंसान केवल एक आवाज़ का अनुसरण कैसे कर पाता है, और प्रयोगों के ज़रिए इसकी गहराई से पड़ताल की।
(1) द्विकर्णीय श्रवण कार्य
चेरी ने हेडफ़ोन पहने प्रतिभागियों के दोनों कानों में एक ही समय पर अलग-अलग बातें सुनाईं। इसे ‘द्विकर्णीय श्रवण (Dichotic Listening)’ कहते हैं।
(2) सुनकर दोहराना
प्रतिभागियों को एक कान में सुनाई दे रही बात ज्यों की त्यों ज़ोर से दोहरानी थी। इससे उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से केवल एक कान पर केंद्रित हो जाता था।
(3) जिस कान की बात अनसुनी की गई, उसकी याद
प्रयोग समाप्त होने के बाद दूसरे कान से सुनी गई बात के बारे में पूछने पर प्रतिभागियों को उसका अर्थ लगभग याद नहीं था। हालाँकि, उन्होंने आवाज़ की भौतिक विशेषताएँ पहचान ली थीं, जैसे वह पुरुष की थी या महिला की, और वह बोलने की आवाज़ थी या केवल कोई ध्वनि।
छाँटकर अनसुनी की गई आवाज़ का प्रसंस्करण कहाँ तक होता है?

चेरी के नतीजों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह समझाने के लिए सिद्धांत प्रस्तुत किए कि इंसान उन आवाज़ों को कैसे संभालता है जिन पर वह ध्यान नहीं देता।
- फ़िल्टर सिद्धांत (Filter Theory): इसे डोनाल्ड ब्रॉडबेंट (Donald Broadbent) ने 1958 में प्रस्तुत किया था। उनके अनुसार, आवाज़ों को पहले उनके तारत्व या दिशा जैसी भौतिक विशेषताओं के आधार पर छाँटा जाता है और जिन आवाज़ों को नहीं चुना जाता, उन्हें उनका अर्थ समझने से पहले ही रोक दिया जाता है।
- क्षीणन सिद्धांत (Attenuation Theory): ऐन ट्रीज़मैन (Anne Treisman) के अनुसार, छाँटकर अलग की गई आवाज़ पूरी तरह रुकती नहीं है, बल्कि उसकी तीव्रता कम हो जाती है और वह भीतर आती रहती है। इसलिए अपने नाम जैसे महत्वपूर्ण शब्द कमज़ोर संकेत के रूप में भी पहचाने जा सकते हैं।
- विलंबित चयन सिद्धांत (Late Selection Theory): इस मत के अनुसार, आने वाली सभी आवाज़ों का अर्थ तक प्रसंस्करण होता है और किस आवाज़ पर प्रतिक्रिया देनी है, इसका चयन उसके बाद किया जाता है।
फ़िल्टर सिद्धांत को चुनौती देने वाला निर्णायक प्रमाण नाम ही था। 1959 में नेविल मोरे (Neville Moray) ने सुनकर दोहराने का कार्य कर रहे प्रतिभागियों के दूसरे कान में सुनाई जा रही बातों के बीच उनका नाम भी मिला दिया। यदि आवाज़ों को केवल भौतिक विशेषताओं के आधार पर छाँटा जाता, तो नाम भी सुनाई नहीं देना चाहिए था, लेकिन कुछ प्रतिभागियों ने अपना नाम पहचान लिया।
हर किसी को अपना नाम सुनाई नहीं देता

अक्सर कॉकटेल पार्टी प्रभाव को हर किसी के साथ होने वाली घटना माना जाता है, लेकिन प्रयोगों के नतीजे कुछ अलग हैं। मोरे के प्रयोग में लगभग 3 में से 1 प्रतिभागी ने अपना नाम सुनने की बात कही थी, और 1995 में नोएल वुड (Noelle Wood) तथा नेल्सन कोवान (Nelson Cowan) ने अधिक परिष्कृत विधि से प्रयोग दोहराया, तब भी यह अनुपात 34.6% था।
तो अपना नाम कौन पहचान पाता है? 2001 में एंड्रयू कॉनवे (Andrew Conway) की शोध टीम ने इसका उत्तर ‘कार्यशील स्मृति (Working Memory)’ की क्षमता में खोजा। कार्यशील स्मृति का अर्थ है सोचते समय आवश्यक जानकारी को कुछ देर तक मन में बनाए रखने और उसका उपयोग करने की क्षमता।
शोध में पाया गया कि अधिक कार्यशील स्मृति क्षमता वाले लोगों में केवल 20% ने अपना नाम पहचाना, जबकि कम क्षमता वाले लोगों में 65% ने उसे पहचाना। इसका अर्थ है कि अपना नाम सुन पाना किसी उत्कृष्ट क्षमता का प्रमाण होने के बजाय, बाधा डालने वाली आवाज़ों को रोकने की क्षमता कम होने से ध्यान आसानी से भटक जाने का परिणाम भी हो सकता है।
रोज़मर्रा के जीवन और तकनीक में कॉकटेल पार्टी प्रभाव

कॉकटेल पार्टी प्रभाव प्रयोगशाला के बाहर भी कई रूपों में दिखाई देता है।
जीवन और तकनीक में मिलने वाले उदाहरण
- नाम से पुकारना (Calling by Name): कक्षा या बैठक में किसी को नाम से पुकारकर संबोधित करने पर उसका ध्यान कहीं अधिक आसानी से खींचा जा सकता है।
- श्रवण बाधा और श्रवण यंत्र (Hearing Aid): सुनने की क्षमता घटने पर शोर के बीच एक आवाज़ चुनकर सुनना विशेष रूप से कठिन हो जाता है। इसलिए श्रवण यंत्रों में बोली को स्पष्ट करने और आसपास का शोर कम करने वाली सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- वाक् पहचान (Speech Recognition): ऐसी रिकॉर्डिंग में, जिसमें कई लोग एक साथ बोल रहे हों, केवल एक व्यक्ति की आवाज़ अलग करना वाक् तकनीक में भी लंबे समय से एक कठिन कार्य माना जाता रहा है।
- एकाग्रता का वातावरण (Focus Environment): पढ़ाई या काम करते समय आसपास की बातचीत विशेष रूप से परेशान करती है, क्योंकि अर्थपूर्ण बातें छनकर बाहर नहीं हो पातीं और हमारा ध्यान खींच लेती हैं।
अंततः मानव मस्तिष्क सभी आवाज़ों को एक समान सुनने के बजाय, उस समय महत्वपूर्ण आवाज़ को चुनकर और बाकी आवाज़ों को धीमा रखकर हमारे श्रवण की रक्षा करता है।
कॉकटेल पार्टी प्रभाव दिखाता है कि हम अपनी सोच से कहीं अधिक आवाज़ों को छाँटकर सुनते हैं और अनसुनी की जा रही आवाज़ें भी पूरी तरह गायब नहीं होतीं। यह यह भी बताता है कि चुनकर सुनने की यह क्षमता हर व्यक्ति में अलग होती है।
शोरगुल से भरी दुनिया में क्या सुनना है और किसे अनसुना कर देना है, यह अंततः हमारा ध्यान तय करता है। हमारे कान किस ओर लगे हैं, इस बात का एहसास होना ही व्यस्त और ध्यान भटकाने वाली दिनचर्या में एकाग्रता वापस पाने का पहला कदम है।
