मौसम का पूर्वानुमान देखते समय मौसम प्रस्तुतकर्ता एक बड़े नक्शे के सामने खड़े होकर हाथ से बताते हैं कि बादल किस दिशा से आ रहे हैं। लेकिन असली स्टूडियो में उनके पीछे नक्शा नहीं, बल्कि बिना किसी आकृति वाली हरी दीवार होती है। किसी खास रंग को चुनकर हटाने और उसकी जगह दूसरा वीडियो भरने की तकनीक ही ‘क्रोमा की (Chroma Key)’ है।
आसान शब्दों में, क्रोमा की का अर्थ है ‘स्क्रीन पर मौजूद किसी एक रंग को पारदर्शी बनाकर दृश्य को दूसरी पृष्ठभूमि के साथ जोड़ने की वीडियो संयोजन तकनीक’। क्रोमा (Chroma) का अर्थ रंग का गुण है, जबकि की (Key) का अर्थ स्क्रीन के किसी हिस्से को काटकर निकालने का काम है। पृष्ठभूमि के रंग के अनुसार इसे ग्रीन स्क्रीन या ब्लू स्क्रीन भी कहा जाता है, और समाचारों, फिल्मों तथा गेम प्रसारणों तक में इसका व्यापक उपयोग होता है।
इस सामग्री में हम क्रम से क्रोमा की के सिद्धांत, ब्लू स्क्रीन से ग्रीन स्क्रीन तक के इतिहास, पृष्ठभूमि का रंग चुनने के कारणों और साफ-सुथरे वीडियो संयोजन के लिए शूटिंग के तरीकों पर चर्चा करेंगे।
एक रंग से दुनिया बदलने वाला वीडियो संयोजन
क्रोमा की कैसे काम करता है?

क्रोमा की संयोजन तीन चरणों में होता है। इसकी मुख्य बात ऐसा रंग तय करना है जो केवल पृष्ठभूमि में हो और व्यक्ति में न हो।
(1) एक रंग की पृष्ठभूमि के सामने शूटिंग
व्यक्ति या वस्तु को समान रूप से रंगी हुई हरी या नीली पृष्ठभूमि के सामने रखकर शूट किया जाता है। पूरे दृश्य में पृष्ठभूमि का रंग जितना एकसमान हो, उतना अच्छा है।
(2) कीइंग (Keying)
संपादन उपकरण या प्रोग्राम स्क्रीन के हर बिंदु की तुलना तय रंग से करता है और पृष्ठभूमि के रंग वाले हिस्सों को पारदर्शी बनाकर व्यक्ति वाले हिस्से को जस का तस छोड़ देता है। बालों के सिरों जैसे आंशिक रूप से मिले हुए हिस्सों को अर्धपारदर्शी बनाया जाता है। इस तरह तैयार पारदर्शिता की जानकारी को ‘मैट (Matte)’ कहते हैं।
(3) पृष्ठभूमि का संयोजन
पारदर्शी हुई जगह पर अलग से फिल्माया गया दृश्य या कंप्यूटर ग्राफिक्स रखने से व्यक्ति ऐसा दिखता है मानो वह शुरू से वहीं मौजूद था। सीधे प्रसारण में यह प्रक्रिया वास्तविक समय में होती है।
काले कपड़े से नीले कपड़े और फिर हरे कपड़े तक

पृष्ठभूमि बदलने के प्रयास सिनेमा के इतिहास जितने ही पुराने हैं।
(1) काली पृष्ठभूमि और दोहरा एक्सपोज़र
1898 में ब्रिटेन के जॉर्ज अल्बर्ट स्मिथ (George Albert Smith) ने काले कपड़े की पृष्ठभूमि के सामने फिल्माए गए दृश्य को दूसरे दृश्य पर दोबारा फिल्माकर चढ़ाने वाले दोहरे एक्सपोज़र का उपयोग किया। यह तरीका इस बात पर आधारित था कि काले हिस्सों की छवि फिल्म पर नहीं बनती।
(2) ब्लू स्क्रीन का आगमन
1930 के दशक में अमेरिकी फिल्म कंपनी RKO में नीली पृष्ठभूमि इस्तेमाल करने का तरीका विकसित हुआ, और 1940 की फिल्म ‘बगदाद का चोर (The Thief of Bagdad)’ में लैरी बटलर (Larry Butler) ने बोतल से निकलने वाले जिन्न के दृश्य के लिए पूर्ण रूप से विकसित ब्लू स्क्रीन तकनीक का उपयोग किया। इस फिल्म को उसी वर्ष विशेष प्रभावों के लिए अकादमी पुरस्कार मिला।
(3) टेलीविज़न और ग्रीन स्क्रीन
‘क्रोमा की’ नाम मूल रूप से अमेरिकी कंपनी RCA का एक ट्रेडमार्क था, जिसे वह NBC के प्रसारणों में इस्तेमाल करती थी, और 1957 की शरद ऋतु में ‘द जॉर्ज गोबेल शो’ में इसका शुरुआती इस्तेमाल हुआ। बाद में पेट्रो व्लाहोस (Petro Vlahos) ने संयोजन तकनीक को निखारा और 1964 में अकादमी पुरस्कार प्राप्त किया। 1970 के दशक की शुरुआत से अमेरिकी और ब्रिटिश प्रसारण संस्थानों ने नीली पृष्ठभूमि की जगह हरी पृष्ठभूमि का उपयोग शुरू किया।
हरे और नीले रंग ही क्यों?

पृष्ठभूमि का रंग चुनने की पहली कसौटी यह है कि वह मनुष्य की त्वचा के रंग से अधिकतम अलग होना चाहिए। त्वचा में लालिमा अधिक होती है, इसलिए लाल रंग का उपयोग नहीं किया जाता और मुख्य रूप से हरा तथा नीला चुना जाता है।
(1) हरे रंग का अधिक उपयोग होने के कारण
हरे कपड़े नीले कपड़ों की तुलना में कम पहने जाते हैं, इसलिए कलाकार के कपड़ों के भी पृष्ठभूमि के साथ मिट जाने का खतरा कम होता है। दरअसल, यह कहा जाता है कि नीले सूट पहनना पसंद करने वाले मौसम प्रस्तुतकर्ताओं के कारण प्रसारण केंद्रों ने हरा रंग अपनाया। साथ ही, डिजिटल कैमरे के सेंसर में हरे रंग को ग्रहण करने वाले पिक्सेल लाल या नीले रंग के पिक्सेल से दोगुने होते हैं, इसलिए हरा संकेत अधिक साफ दर्ज होता है।
(2) जब नीले रंग की अब भी आवश्यकता होती है
जिस व्यक्ति या वस्तु को फिल्माया जा रहा हो उसमें हरा रंग अधिक होने पर नीली पृष्ठभूमि का उपयोग किया जाता है। 2002 की फिल्म ‘स्पाइडर-मैन (Spider-Man)’ में लाल और नीले कपड़े पहने स्पाइडर-मैन को ग्रीन स्क्रीन के सामने तथा पूरी तरह हरे कपड़े पहने ग्रीन गॉब्लिन को ब्लू स्क्रीन के सामने अलग-अलग फिल्माना पड़ा था। फिल्म के दौर में भी नीले रंग का उपयोग पहले इसलिए हुआ क्योंकि केवल नीली रोशनी पर प्रतिक्रिया देने वाली फिल्म बनाना आसान था।
साफ-सुथरे संयोजन के लिए शूटिंग के तरीके

क्रोमा की की गुणवत्ता संपादन से पहले ही शूटिंग स्थल पर तय हो जाती है। पृष्ठभूमि एकसमान न हो या उसमें ऐसा रंग हो जो व्यक्ति में भी मौजूद हो, तो बेहतरीन प्रोग्राम के लिए भी दोनों को साफ-साफ अलग करना कठिन होता है।
- एकसमान प्रकाश व्यवस्था (Even Lighting): पृष्ठभूमि में छाया या सिलवटें होने पर उन हिस्सों का रंग बदल जाता है और वे मिट नहीं पाते। कम परावर्तन वाला मैट कपड़ा इस्तेमाल करें और पूरी पृष्ठभूमि पर समान रूप से रोशनी डालें।
- रंग का फैलाव (Spill): हरी पृष्ठभूमि से परावर्तित रोशनी व्यक्ति के बालों या कंधों पर पड़कर उन्हें हरा रंग दे दे, तो किनारे अस्वाभाविक लगते हैं। व्यक्ति को पृष्ठभूमि से पर्याप्त दूरी पर खड़ा करने से रंग का फैलाव कम किया जा सकता है।
- पोशाक का चयन (Wardrobe): पृष्ठभूमि के रंग जैसे कपड़ों या सहायक वस्तुओं से बचें। इसके विपरीत, कभी-कभी जानबूझकर शरीर के किसी हिस्से पर हरा कपड़ा डालकर उसे गायब किया जाता है, जिससे अदृश्यता के लबादे का प्रभाव पैदा होता है।
- ट्रैकिंग चिह्न (Tracking Markers): कैमरे की गति वाले दृश्यों में पृष्ठभूमि पर टेप से X के निशान लगाए जाते हैं, ताकि बाद में कंप्यूटर कैमरे की गति की गणना करके पृष्ठभूमि को भी उसके साथ हिला सके।
- प्रकाश का मिलान (Lighting Match): संयोजन स्वाभाविक दिखे, इसके लिए व्यक्ति पर पड़ने वाली रोशनी की दिशा और रंग को बाद में जोड़ी जाने वाली पृष्ठभूमि की रोशनी से मिलाना चाहिए।
एक रंग मिटाने के सरल विचार से शुरू हुई क्रोमा की वीडियो निर्माण की एक प्रमुख तकनीक है, जिसने स्टूडियो के भीतर रहकर रेगिस्तान, अंतरिक्ष और काल्पनिक शहरों तक आना-जाना संभव बनाया है। हाल के समय में विशाल LED दीवारों पर सीधे पृष्ठभूमि दिखाकर शूट करने वाले वर्चुअल प्रोडक्शन का उपयोग भी बढ़ रहा है, लेकिन कम खर्च और कहीं भी आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने के कारण ग्रीन स्क्रीन व्यक्तिगत प्रसारणों से लेकर बड़े बजट की फिल्मों तक में अब भी अपनी जगह बनाए हुए है।
जिस रंग को मिटाना है और जिस रंग को बनाए रखना है, उनके बीच स्पष्ट अंतर करना ही स्वाभाविक संयोजित वीडियो बनाने की वीडियो विद्या का पहला कदम है।
