कई बार कोशिश करने पर भी बात न बने, तो एक समय मन में यह विचार आने लगता है कि ‘कोशिश कर भी लूँ, तो कुछ नहीं होगा।’ लेकिन अजीब बात यह है कि परिस्थितियाँ बदलने और मेहनत से सफल हो सकने का अवसर आने पर भी व्यक्ति आसानी से दोबारा कदम नहीं उठा पाता।
सीखी हुई असहायता का सरल अर्थ है, ‘बार-बार ऐसे अनुभव होने के बाद, जिनमें कितनी भी कोशिश करने पर परिणाम नहीं बदलता, उन परिस्थितियों में भी कोशिश करना छोड़ देना जिनमें बदलाव संभव है।’ अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मार्टिन सेलिगमैन (Martin Seligman) और स्टीवन मायर (Steven Maier) ने 1960 के दशक में किए गए प्रयोगों में पहली बार इस अवधारणा को नाम दिया। बाद में इसने अवसाद के शोध, शिक्षा और संगठन प्रबंधन तक पर गहरा प्रभाव डाला।
इस लेख में हम क्रम से देखेंगे कि सीखी हुई असहायता की खोज किस प्रयोग में हुई, यह मनुष्यों में कैसे दिखाई देती है, आधी सदी बाद तंत्रिका विज्ञान ने इस सिद्धांत को कैसे संशोधित किया और असहायता से बाहर निकलने के क्या तरीके हैं।
सीखी हुई असहायता को समझना और उससे उबरना
वह प्रयोग जिसमें बच निकलना संभव होने पर भी कोई हरकत नहीं हुई

सीखी हुई असहायता की पहचान पहली बार सेलिगमैन और मायर द्वारा 1967 में प्रकाशित पशु प्रयोग में हुई। शोधकर्ताओं ने कुत्तों को तीन समूहों में बाँटा।
(1) नियंत्रण कर सकने वाला समूह
उन्हें बिजली के झटके दिए गए, लेकिन सामने रखे पैनल को दबाकर वे झटके रोक सकते थे।
(2) नियंत्रण न कर सकने वाला समूह
उन्हें पहले समूह जितनी ही मात्रा में बिजली के झटके दिए गए, लेकिन वे कुछ भी करके उन्हें रोक नहीं सकते थे।
(3) तुलना समूह
उन्हें कोई झटका नहीं दिया गया।
इसके बाद सभी कुत्तों को ऐसे बक्से में रखा गया, जिसमें बीच की बाधा पार करके झटकों से बचा जा सकता था। पहले और तीसरे समूह के कुत्ते जल्द ही बाधा पार करके झटकों से बच गए, लेकिन दूसरे समूह के कई कुत्ते वहीं औंधे पड़े झटके सहते रहे। शोधकर्ताओं ने इसकी व्याख्या यह कहकर की कि इन कुत्तों ने सीख लिया था कि ‘मैं कुछ भी करूँ, परिणाम नहीं बदलेगा।’

स्रोत: सेलिगमैन और मायर (1967) · मायर और सेलिगमैन (2016) · अब्रामसन एवं अन्य (1978) · जीके लाइब्रेरी द्वारा निर्मित
मनुष्यों में भी दिखाई देने वाली असहायता

इसी तरह की घटना मनुष्यों में भी देखी गई। 1970 के दशक में मनोवैज्ञानिक डोनाल्ड हिरोटो (Donald Hiroto) ने प्रतिभागियों को तेज़ शोर सुनाया, जिसे वे बार-बार बटन दबाने पर भी बंद नहीं कर सकते थे। इसके बाद उन्हें ऐसा कार्य दिया गया, जिसमें एक सरल क्रिया से शोर बंद किया जा सकता था। जो लोग पहले शोर बंद नहीं कर पाए थे, उनमें नए कार्य में भी आसानी से हार मान लेने की प्रवृत्ति दिखाई दी।
1978 में लिन अब्रामसन (Lyn Abramson), सेलिगमैन और जॉन टीज़डेल (John Teasdale) ने यह मानते हुए सिद्धांत को परिष्कृत किया कि मनुष्यों के मामले में यह महत्त्वपूर्ण है कि वे असफलता की व्याख्या कैसे करते हैं। इसे ही आरोपण शैली (Attributional Style) कहा जाता है।
- आंतरिकता (Internal): असफलता का कारण परिस्थिति के बजाय अपने भीतर खोजने की प्रवृत्ति।
- स्थिरता (Stable): यह मानने की प्रवृत्ति कि वह कारण भविष्य में भी नहीं बदलेगा।
- व्यापकता (Global): किसी एक असफलता को जीवन के सभी क्षेत्रों से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति।
अर्थात, जो लोग अक्सर ऐसी व्याख्या करते हैं जिसमें ये तीनों बातें शामिल हों, जैसे ‘मैं जन्म से ही कम बुद्धिमान हूँ, इसलिए कुछ भी करूँ, सफल नहीं हो सकता’, उनके असहायता और अवसाद में पड़ने की आशंका अधिक होती है।
ऐसे उदाहरण रोज़मर्रा के जीवन में भी अक्सर दिखाई देते हैं। परीक्षा में कई बार कम अंक पाने वाला विद्यार्थी यह कहकर पढ़ाई छोड़ देता है कि ‘मेरे पास गणित समझने की बुद्धि ही नहीं है’, या कई बार सुझाव अनसुने किए जाने के बाद कोई कर्मचारी अपनी राय देना बंद कर देता है। ऊपर से यह आलस्य जैसा दिखता है, लेकिन इसके पीछे कोशिशों के बेकार जाने के अनुभव छिपे होते हैं।
आधी सदी बाद उलट गई व्याख्या

2016 में मायर और सेलिगमैन ने एक शोधपत्र प्रकाशित किया, जिसमें पहले प्रयोग के बाद 50 वर्षों के दौरान पशुओं, मुख्यतः चूहों, पर हुए शोध से संचित तंत्रिका विज्ञान के निष्कर्षों को समेटा गया था। इसमें उन्होंने बताया कि मूल सिद्धांत की व्याख्या उलटी थी।
उनके अनुसार, लंबे समय तक पीड़ा झेलते हुए पशु का निष्क्रिय रहकर उसे सहना सीखी हुई प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। इस दौरान मस्तिष्क-तने का पृष्ठीय रैफे केंद्रक सक्रिय हो जाता है, जो बच निकलने के व्यवहार को दबाता है और चिंता बढ़ाता है।
इसके विपरीत, जब यह अनुभव होता है कि ‘मेरे व्यवहार से परिणाम बदल सकता है’, तो माथे की ओर स्थित मध्यवर्ती प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स उस नियंत्रण-बोध को पहचानता है और पृष्ठीय रैफे केंद्रक की सक्रियता को दबा देता है। यह व्याख्या प्रयोग के परिणामों को देखने का नज़रिया बदल देती है। पहले प्रयोग के कुत्तों ने नई तरह से असहायता नहीं सीखी थी, बल्कि पैनल दबाकर झटके रोकने वाले कुत्तों ने नियंत्रण करना सीखा और स्वाभाविक प्रतिक्रिया पर काबू पाया। इस पशु शोध में नियंत्रण के अनुभव ने बाद में तनाव के प्रति निष्क्रिय प्रतिक्रिया घटाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही व्याख्या मनुष्यों पर ज्यों की त्यों लागू नहीं की जा सकती।
असहायता से बाहर निकलने के तरीके

सीखी हुई असहायता का शोध सेलिगमैन के लिए सकारात्मक मनोविज्ञान का नेतृत्व करने का आधार बना, जो मनुष्य की खूबियों और उबरने की क्षमता का अध्ययन करता है। उनका मानना था कि यदि असहायता सीखी जा सकती है, तो आशावाद भी सीखा जा सकता है।
नियंत्रण-बोध वापस पाने के छोटे अभ्यास
- छोटी सफलताएँ जुटाना (Small Wins): ऐसे छोटे लक्ष्य पूरे करने से शुरुआत करें जिन्हें अंत तक पूरा किया जा सके, और ‘कोशिश करूँ तो कर सकता हूँ’ के अनुभव को फिर से जीवित करें।
- व्याख्या बदलना (Reframing): असफलता को किसी अस्थायी और विशिष्ट कारण से समझाने की कोशिश करें, जैसे ‘इस बार तैयारी कम थी।’
- चुनने के अवसर बढ़ाना (Choice): स्कूल, कार्यस्थल या देखभाल की परिस्थितियों में स्वयं चुनाव करने की गुंजाइश देने से नियंत्रण-बोध बढ़ता है।
- मदद माँगना (Seeking Support): यदि परिस्थिति को अकेले बदलना कठिन हो, तो आसपास के लोगों या विशेषज्ञ के साथ मिलकर रास्ता खोजना भी नियंत्रण का एक तरीका है।
हालाँकि, यदि वातावरण ऐसा हो जिससे अकेले निकलना कठिन हो, जैसे वास्तविक ख़तरा या दुर्व्यवहार, तो मनोवृत्ति बदलने से पहले उस वातावरण को बदलना ज़रूरी है। यदि उदासी लंबे समय तक बनी रहे, तो पेशेवर परामर्श लेना अच्छा है।
असहायता को केवल व्यक्तित्व या इच्छाशक्ति की समस्या मान लेना ज़रूरी नहीं है। इसके कारण और बदलाव की प्रक्रिया हर व्यक्ति में अलग हो सकती है।
सेलिगमैन और मायर के प्रयोगों से शुरू हुई सीखी हुई असहायता, आरोपण सिद्धांत के माध्यम से मानव मन को समझाने का ढाँचा बनी और तंत्रिका विज्ञान से गुज़रकर इस नए संदेश के साथ सामने आई कि ‘नियंत्रण-बोध सीखकर हासिल की जाने वाली शक्ति है।’
‘कोशिश करने से भी कुछ नहीं होगा’ के विचार के सामने फिर से एक छोटा कदम उठाना ही, सीखी हुई असहायता पर काबू पाने की दिशा में मनोविज्ञान का पहला कदम है।