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बिक्री बढ़ाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई खबरें, पीत पत्रकारिता (Yellow Journalism)

सुबह के अखबार के पृष्ठ 1 पर हथेली जितने बड़े अक्षरों में ‘सनसनी’ या ‘हैरतअंगेज़’ जैसे शब्द छपे हों, तो किसी की भी नज़र एक बार उन पर पड़ ही जाती है। खबर पढ़ने पर अक्सर पता चलता है कि घटना उतनी बड़ी नहीं है जितना शीर्षक से लगा था, लेकिन तब तक अखबार बिक चुका होता है। जब तथ्य सही ढंग से पहुँचाने से ज़्यादा प्राथमिकता बिक्री बढ़ाने को दी जाती है, तो पत्रकारिता अक्सर ऐसा ही रूप ले लेती है।

इस तरह की रिपोर्टिंग को ही ‘पीत पत्रकारिता (Yellow Journalism)’ कहा जाता है। पीत पत्रकारिता का अर्थ ऐसी सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग है, जिसमें ध्यान खींचने वाले शीर्षकों और बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई सामग्री से पाठकों की दिलचस्पी जगाकर अखबार की बिक्री बढ़ाने की कोशिश की जाती है। यह शब्द अमेरिका के न्यूयॉर्क में 1890 के दशक में पाठकों को अपने पक्ष में करने के लिए दो अखबारों के बीच हुई कड़ी प्रतिस्पर्धा से पैदा हुआ।

इस सामग्री में हम क्रम से देखेंगे कि पीत पत्रकारिता नाम कैसे पड़ा, उस दौर के अखबारों की क्या विशेषताएँ थीं, युद्ध से जुड़े कौन-से विवाद उठे और आज यह हमें किन रूपों में दिखाई देती है।


बिक्री बढ़ाने के लिए खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का इतिहास

पीले कपड़े पहने एक बच्चे से मिला नाम

19वीं शताब्दी के अंत के एक अखबार के दफ्तर की मेज़ पर रखे खाली अखबारी कागज़ों के ढेर, पीले और लाल रंग के हिस्सों वाले पुराने अखबार के पन्ने, स्याही की दवात, कलम की निब और पीतल का दीपक

हैरानी की बात है कि पीत पत्रकारिता नाम की शुरुआत अखबार में छपने वाली एक कॉमिक से हुई थी।

(1) पुलित्ज़र और हर्स्ट की बिक्री की जंग
जोसेफ पुलित्ज़र (Joseph Pulitzer) ने 1883 में न्यूयॉर्क वर्ल्ड (New York World) खरीदने के बाद उसमें खूब चित्र छापकर और अपराध की खबरों को प्रमुखता देकर पाठकों को आकर्षित किया। 1895 में खनन उद्योग के एक धनकुबेर के बेटे विलियम रैंडोल्फ हर्स्ट (William Randolph Hearst) ने प्रतिस्पर्धी अखबार न्यूयॉर्क जर्नल (New York Journal) खरीद लिया और दोनों अखबार बिक्री की संख्या को लेकर सीधे मुकाबले में उतर गए।

(2) येलो किड एक से दो हो गया
उस समय वर्ल्ड में एक रंगीन कॉमिक छपती थी, जिसमें पीला नाइटसूट पहने एक गंजा बच्चा दिखाई देता था। यह बच्चा ‘येलो किड (Yellow Kid)’ के नाम से बहुत लोकप्रिय हुआ। जब हर्स्ट उसके रचनाकार रिचर्ड आउटकॉल्ट (Richard F. Outcault) को अपने यहाँ ले आए, तो पुलित्ज़र ने दूसरे चित्रकार से वही कॉमिक बनवाना जारी रखा और न्यूयॉर्क में दो येलो किड हो गए।

(3) आलोचना से प्रचलित हुआ नाम
गंभीर अखबार इन दोनों अखबारों को ताना मारते हुए ‘येलो किड अखबार’ कहने लगे। माना जाता है कि इस अभिव्यक्ति को पहली बार अखबार में न्यूयॉर्क प्रेस के संपादक एर्विन वार्डमैन (Ervin Wardman) ने लिखा था। बाद में यह अत्यधिक सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग के लिए प्रचलित शब्द बन गया।


पीत पत्रकारिता वाले अखबारों की पहचान की पाँच विशेषताएँ

पत्थर बिछी सड़क पर 1890 के दशक की शैली के अखबार के स्टॉल पर बड़े चित्रों वाले पुराने अखबारों के ढेर रखे हैं और शीर्षकों के अक्षर धुँधले किए गए हैं

पत्रकारिता के इतिहासकार फ्रैंक लूथर मॉट (Frank Luther Mott) ने पीत पत्रकारिता की पहचान करने वाली पाँच विशेषताएँ बताई थीं।

  • डर पैदा करने वाले शीर्षक (Scare Headlines): मामूली खबरों को भी बहुत बड़े अक्षरों वाले उत्तेजक शीर्षकों से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।
  • चित्रों का अत्यधिक इस्तेमाल (Lavish Use of Pictures): तस्वीरें और चित्र भरपूर छापे जाते हैं और कल्पना से बनाए गए चित्रों को भी वास्तविकता की तरह दिखाया जाता है।
  • गढ़ी हुई जानकारी (Faked Interviews and Pseudoscience): मनगढ़ंत साक्षात्कार, भ्रम पैदा करने वाले शीर्षक और तथाकथित विशेषज्ञों की विश्वसनीय लगने वाली निराधार बातें प्रस्तुत की जाती हैं।
  • रविवार के परिशिष्ट (Sunday Supplements): सतही लेखों और कॉमिक्स से भरे आकर्षक रंगीन रविवार संस्करणों को प्रमुखता दी जाती है।
  • कमज़ोर पक्ष के प्रति सहानुभूति (Sympathy with the Underdog): व्यवस्था के विरुद्ध खड़े कमज़ोर पक्ष का साथ देकर भावनाओं को उभारा जाता है।

इसके साथ अपराध की घटनाओं को सनसनीखेज़ ढंग से पेश करने वाली खबरें भी जुड़ गईं। हालाँकि, दोनों अखबार हमेशा केवल सनसनीखेज़ खबरें ही नहीं छापते थे। हर्स्ट द्वारा पहले संचालित सैन फ्रांसिस्को एग्ज़ामिनर (San Francisco Examiner) ने एक पत्रकार को अस्पताल भेजकर गरीब महिला मरीज़ों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार का खुलासा भी किया था।

पीत पत्रकारिता के उद्भव और उसकी विशेषताओं का सार प्रस्तुत करने वाला इन्फोग्राफिक। 1883 में पुलित्ज़र द्वारा न्यूयॉर्क वर्ल्ड की खरीद, 1895 में हर्स्ट द्वारा न्यूयॉर्क जर्नल की खरीद और दोनों अखबारों में येलो किड कॉमिक छपने के घटनाक्रम को तीरों से जोड़ा गया है। ‘येलो किड अखबार’ कहकर की गई आलोचना से यह नाम प्रचलित होने की व्याख्या के नीचे मॉट की बताई पाँच विशेषताएँ कार्ड के रूप में रखी हैं: डर पैदा करने वाले शीर्षक, चित्रों का अत्यधिक इस्तेमाल, गढ़ी हुई जानकारी, रविवार के परिशिष्ट और कमज़ोर पक्ष के प्रति सहानुभूति।
1890 के दशक में न्यूयॉर्क के दो अखबारों की बिक्री की प्रतिस्पर्धा से पीत पत्रकारिता नाम के जन्म तक का घटनाक्रम और मॉट की बताई पाँच विशेषताएँ एक नज़र में प्रस्तुत की गई हैं। आइकनों में दिखाए गए व्यक्तियों के चित्र समझने में सहायता के लिए बनाए गए हैं। संदर्भ: Wikipedia, Yellow journalism.

युद्ध भड़काने के आरोप से जुड़ा विवाद

सूर्यास्त के समय एक शांत उष्णकटिबंधीय बंदरगाह में लंगर डाले 19वीं शताब्दी के इस्पात के युद्धपोत और तट पर दिखाई देते पुराने पत्थर के किले का दृश्य

पीत पत्रकारिता की चर्चा में 1898 के अमेरिका-स्पेन युद्ध का ज़िक्र ज़रूर आता है।

(1) क्यूबा का विद्रोह और मेन युद्धपोत में विस्फोट
1895 में स्पेन के उपनिवेश क्यूबा में विद्रोह हुआ, तो दोनों अखबारों ने स्पेनी सेना की क्रूरता की खबरें लगातार प्रमुखता से छापीं। 1898 के 2वें महीने में अमेरिकी युद्धपोत मेन हवाना बंदरगाह में विस्फोट के बाद डूब गया, जिससे रिपोर्टिंग की प्रतिस्पर्धा और तेज़ हो गई। उसी वर्ष के 4वें महीने में अमेरिका स्पेन के साथ युद्ध में उतर गया।

(2) एक तार जिसकी सत्यता की पुष्टि नहीं हुई
यह किस्सा व्यापक रूप से प्रचलित है कि हर्स्ट ने क्यूबा भेजे गए चित्रकार को एक तार भेजकर कहा था, “तुम चित्रों का इंतज़ाम करो, युद्ध का इंतज़ाम मैं करूँगा।” लेकिन हर्स्ट ने इससे इनकार किया और ऐसे किसी तार के होने का प्रमाण भी नहीं मिला। इसलिए इतिहासकारों का मानना है कि इस किस्से के मनगढ़ंत होने की संभावना अधिक है।

(3) अनुमान से कम प्रभाव होने का आकलन
आज कई इतिहासकार मानते हैं कि पीत पत्रकारिता वाले अखबार युद्ध छिड़ने का मुख्य कारण नहीं थे। इसकी वजह यह है कि ऐसी रिपोर्टिंग मुख्य रूप से न्यूयॉर्क तक सीमित थी और राष्ट्रपति विलियम मैकिन्ले (William McKinley) जैसे निर्णय लेने वाले लोग इन अखबारों को खास नहीं पढ़ते थे।


आज भी जारी पीत पत्रकारिता

कैफ़े की लकड़ी की मेज़ पर रखा स्मार्टफोन, जिसकी स्क्रीन पर खबरें धुँधली दिखाई दे रही हैं, साथ में तह किया हुआ पुराना अखबार और एक कप कॉफ़ी

पीत पत्रकारिता का दौर बीत चुका है, लेकिन उसके तरीके रूप बदलकर आज भी जारी हैं।

(1) पुलित्ज़र का बदलाव
पुलित्ज़र ने बाद में वर्ल्ड को फिर से सामाजिक अनियमितताओं का पर्दाफाश करने पर केंद्रित अखबार बना दिया। उनकी वसीयत के अनुसार स्थापित पुलित्ज़र पुरस्कार (Pulitzer Prize) 1917 से पत्रकारिता में योगदान का सम्मान करने वाला पुरस्कार बन गया। इस तरह सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग से नाम कमाने वाला व्यक्ति अच्छी पत्रकारिता का प्रतीक छोड़ गया।

(2) क्लिक लुभाने वाले भ्रामक शीर्षक
आज बिक्री की संख्या की जगह खबर देखे जाने की संख्या प्रतिस्पर्धा का पैमाना बन गई है। सामग्री से अलग सनसनीखेज़ शीर्षक देकर क्लिक करने के लिए उकसाने वाली खबरों, जिन्हें क्लिकबेट (Clickbait) कहा जाता है, को पीत पत्रकारिता का आधुनिक रूप कहा जा सकता है।

(3) पाठकों के लिए ज़रूरी परख
केवल शीर्षक देखकर निर्णय लेने के बजाय यह जाँचने की आदत कि स्रोत स्पष्ट है या नहीं और दूसरे समाचार माध्यम उसी तथ्य को कैसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग को छाँटने का सबसे अच्छा तरीका है।


पीत पत्रकारिता एक पुराना आईना है, जो दिखाता है कि जब पत्रकारिता तथ्यों से ज़्यादा ध्यान आकर्षित करने के पीछे भागती है, तो क्या होता है। खबरें बनाने वालों की भी ज़िम्मेदारी है, लेकिन सनसनीखेज़ शीर्षकों पर आसानी से प्रतिक्रिया न देने वाले पाठकों की संख्या जितनी बढ़ेगी, ऐसी रिपोर्टिंग के लिए जगह उतनी ही घटेगी।

बड़े अक्षरों वाले शीर्षक के पीछे छिपे तथ्यों को एक बार फिर जाँचना ही पीत पत्रकारिता के प्रभाव में न आने वाले समझदार पाठक का पहला कदम है।

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