आपने समाचारों में कभी मीडिया को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद चौथी सत्ता कहते सुना होगा। पत्रकार न चुनाव से चुने जाते हैं, न कानून बनाते हैं, तो फिर उन्हें सत्ता का नाम कैसे मिला? इस अभिव्यक्ति के पीछे संसद की पत्रकार दीर्घा और पुरानी सामाजिक वर्ग व्यवस्था से जुड़ी एक कहानी छिपी है।
इस कहानी के केंद्र में है 4था स्तंभ (Fourth Estate)। इसे 4था वर्ग या 4थी सत्ता भी कहा जाता है। यह मीडिया की उस शक्ति को दर्शाता है जो सरकार या संसद से अलग रहकर समाज पर नज़र रखती है और जनमत को प्रभावित करती है। हालाँकि, यह शब्द सबसे पहले किसने कहा था, यह आज भी स्पष्ट नहीं है, इसलिए इसकी उत्पत्ति की खोज अपने आप में एक दिलचस्प कहानी बन जाती है।
इस सामग्री में हम तीन सामाजिक वर्गों की पृष्ठभूमि से लेकर 4थे स्तंभ शब्द की उत्पत्ति, इस नाम के तहत मीडिया की भूमिकाओं और इंटरनेट के युग में इसके बदलते प्रयोग तक को क्रम से समझेंगे।
सामाजिक वर्ग व्यवस्था से मीडिया के स्थान तक
तीन सामाजिक वर्ग और संसद की पत्रकार दीर्घा

estate का मूल अर्थ समाज का एक सामाजिक वर्ग है। फ्रांस की एस्टेट्स जनरल में पादरी, कुलीन और आम लोग—ये तीन वर्ग शामिल थे, जबकि ब्रिटिश संसद धर्माधिकारी कुलीनों, सांसारिक कुलीनों और आम लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले निचले सदन में बँटी थी। माना जाता था कि देश के मामलों पर निर्णय लेने की शक्ति इन तीन हिस्सों में बँटी हुई है।
लेकिन संसद की चर्चाओं को बाहर तक पहुँचाने वाले पत्रकारों की संख्या बढ़ने के साथ स्थिति बदलने लगी। ब्रिटिश निचले सदन में 1803 से दर्शक दीर्घा का एक हिस्सा पत्रकारों के लिए निर्धारित कर दिया गया। जब सांसदों की बातें अखबारों के माध्यम से नागरिकों तक पहुँचने लगीं, तो यह विचार फैला कि पत्रकार दीर्घा में बैठे लोग इन तीन सामाजिक वर्गों से अलग स्थान से राजनीति को प्रभावित करते हैं। 4थे स्तंभ की अभिव्यक्ति इसी पत्रकार दीर्घा से विकसित हुई।
इस शब्द का सबसे पहले किसने प्रयोग किया?

सबसे प्रचलित कहानी ब्रिटिश विचारक थॉमस कार्लाइल (Thomas Carlyle) के 1840 के एक व्याख्यान से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि राजनेता एडमंड बर्क (Edmund Burke) ने कहा था कि संसद में तीन सामाजिक वर्ग हैं, लेकिन पत्रकार दीर्घा में उन सबसे अधिक महत्वपूर्ण 4था स्तंभ बैठा है। इसकी पृष्ठभूमि के रूप में निचले सदन की रिपोर्टिंग को लेकर 1771 में हुए विवाद के आसपास का समय बताया जाता है, लेकिन बर्क ने वास्तव में ऐसा कहा था, इसकी पुष्टि करने वाला कोई अभिलेख नहीं मिला है।
(1) कार्लाइल का लेखन
कार्लाइल ने 1837 की अपनी पुस्तक ‘फ्रांसीसी क्रांति’ में भी लिखा कि कुशल संपादकों से बना 4था सामाजिक वर्ग उभर रहा है। यह निश्चित है कि इस अभिव्यक्ति को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाने वाले व्यक्ति वही थे।
(2) मैकॉले का कथन
इतिहासकार थॉमस मैकॉले (Thomas Macaulay) ने 1828 में एडिनबरा रिव्यू में प्रकाशित एक लेख में लिखा कि पत्रकारों के बैठने की दर्शक दीर्घा अब देश का 4था स्तंभ बन गई है। इसे प्रायः अब तक प्रमाणित सबसे पुराना प्रयोग माना जाता है।
इसलिए आज इसे बर्क का गढ़ा हुआ शब्द निश्चित रूप से कहने के बजाय यह मानना अधिक सावधानीपूर्ण है कि 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन में कई लोगों के प्रयोग से यह स्थापित हुआ। 1891 में लेखक ऑस्कर वाइल्ड (Oscar Wilde) ने भी पूछा कि यह बात किसने कही थी, क्या वह बर्क थे, और व्यंग्य किया कि अब मीडिया बाकी तीन सामाजिक वर्गों को निगल चुका है। इससे पता चलता है कि तब तक यह अभिव्यक्ति कितनी प्रचलित हो चुकी थी।

यह भी दिलचस्प है कि शुरू से इस शब्द का अर्थ केवल मीडिया नहीं था। 1752 में ब्रिटिश लेखक हेनरी फील्डिंग (Henry Fielding) ने व्यंग्य करते हुए कहा था कि राजा, कुलीनों और आम लोगों के अलावा एक बड़ा और शक्तिशाली 4था सामाजिक वर्ग भी है, और वह भीड़ है। इतालवी चित्रकार जुसेप्पे पेलित्सा दा वोल्पेदो (Giuseppe Pellizza da Volpedo) की 1901 की पेंटिंग ‘4था वर्ग’ भी हड़ताल कर रहे मजदूरों के जुलूस को दर्शाती है। इस तरह एक ही शब्द समय और देश के अनुसार भीड़, मजदूरों और मीडिया के लिए इस्तेमाल होता रहा।
4थे स्तंभ की भूमिकाएँ

4थे स्तंभ के नाम में यह अपेक्षा निहित है कि मीडिया सत्ता रखने वालों पर नज़र रखने वाला प्रहरी बने। मतदान से सौंपी गई सत्ता से अलग, मीडिया की शक्ति जानकारी जुटाने और उसे लोगों तक पहुँचाने से आती है, इसलिए इस शक्ति का सही उपयोग करने के लिए सटीकता और स्वतंत्रता का आधार आवश्यक है।
- निगरानी (Watchdog): सरकार, संसद और कंपनियों के काम पर नज़र रखना और गलतियों को उजागर करना।
- सूचना (Information): नागरिकों को निर्णय लेने का आधार देने वाले तथ्य पहुँचाना।
- सार्वजनिक विमर्श का मंच (Public Forum): अलग-अलग विचारों के आदान-प्रदान के लिए जगह उपलब्ध कराना।
वहीं अमेरिका में 4थे स्तंभ जैसी ही एक अभिव्यक्ति ‘सरकार की 4थी शाखा’ भी इस्तेमाल होती है। जहाँ 4था स्तंभ सरकार से अलग स्वतंत्रता पर ज़ोर देता है, वहीं 4थी शाखा की अभिव्यक्ति मीडिया के राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा होने का भाव बढ़ाती है। एक पुरानी चिंता यह भी है कि यदि मीडिया विज्ञापनदाताओं या मालिकों को खुश रखने की कोशिश करे, तो उसकी निगरानी की शक्ति कमज़ोर हो जाती है, और सत्ता के करीब जाने पर वह उलटे उन्हीं का पक्ष लेने लग सकता है जिनकी उसे निगरानी करनी चाहिए।
इसीलिए मीडिया जगत अपने पालन के लिए आचार मानदंड बनाता आया है। तथ्यों की पुष्टि करना, स्रोत बताना और गलती सामने आने पर उसे सुधारना इनका आधार है। इसका अर्थ है कि 4थे स्तंभ का नाम गर्व का विषय बने, तो सत्ता पर नज़र रखने के साथ अपने काम की समीक्षा भी आवश्यक है।
5वें स्तंभ का उदय और आज का 4था स्तंभ

इंटरनेट के प्रसार के साथ खबरें बनाने वाले केवल पत्रकार नहीं रह गए। ब्लॉगरों, नागरिक दस्तावेज़कर्ताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की सूचना फैलाने की सामूहिक शक्ति को कभी-कभी 5वाँ स्तंभ (Fifth Estate) भी कहा जाता है। अमेरिकी विधि विद्वान योखाई बेंक्लर (Yochai Benkler) ने 2011 के अपने शोधपत्र में उस संरचना को ‘नेटवर्क से जुड़ा 4था स्तंभ (Networked Fourth Estate)’ कहा, जिसमें समाचारपत्र संस्थानों के साथ गैर-लाभकारी मीडिया और व्यक्ति भी मिलकर सत्ता पर अंकुश रखते हैं।
बेशक, शब्द बदलने से चुनौतियाँ समाप्त नहीं हो जातीं। जिस युग में हर कोई सूचना दे सकता है, उसमें तेज़ी से फैलती अफवाहें और सत्यापित रिपोर्टें आसानी से आपस में मिल सकती हैं, इसलिए सावधानी से पुष्टि करने और जिम्मेदारी लेने के रवैये का महत्व और बढ़ गया है। साथ ही, 4थे स्तंभ की अभिव्यक्ति अब किसी व्यक्तिगत पत्रकार के बजाय एक ऐसे वचन के रूप में समझी जाती है, जिसमें मीडिया के प्रति समाज का विश्वास और उसकी अपेक्षाएँ समाहित हैं।
सत्ता रखने वालों के बजाय नागरिकों के साथ खड़े होकर तथ्य जाँचने और सवाल पूछने की भावना ही 4थे स्तंभ की पहली सीढ़ी है।