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कीचड़ में छिपे भ्रष्टाचार की तह तक पहुँचने वाले पत्रकार, मकरैकर (Muckraker)

जब खाद्य कारखानों की अस्वच्छ स्थितियाँ या बड़ी कंपनियों के अनुचित कारोबारी व्यवहार किसी खबर के ज़रिए सामने आते हैं, तो लोग आक्रोशित होते हैं और सरकार उपाय पेश करती है। किसी पत्रकार की लगातार पड़ताल से तैयार एक लेख का कानूनों और व्यवस्थाओं को बदल देना आज कोई अनजानी बात नहीं है। लेकिन इस खोजी पत्रकारिता की जड़ों तक जाएँ, तो लगभग 100 से अधिक वर्ष पहले अमेरिका में ऐसे पत्रकार मिलते हैं जिन्हें ‘कीचड़ खुरचने वाला’ जैसा अप्रिय उपनाम मिला था।

यही पत्रकार ‘मकरैकर (Muckraker)’ कहलाते हैं। सरल शब्दों में, मकरैकर उन सुधारवादी पत्रकारों और लेखकों को कहते हैं जिन्होंने अमेरिका के प्रगतिवादी युग में, 1890 के दशक से 1920 के दशक तक, राजनीतिक भ्रष्टाचार, एकाधिकारवादी कंपनियों की मनमानी और कामकाज की बदहाल परिस्थितियों जैसे समाज के अँधेरे पहलुओं की लगातार पड़ताल करके उन्हें उजागर किया।

इस सामग्री में हम क्रम से देखेंगे कि मकरैकर नाम कैसे पड़ा, उन्होंने किस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में काम किया, उनके प्रमुख खुलासे और उनके प्रभाव क्या थे, और आज की खोजी पत्रकारिता को उनसे क्या विरासत मिली।


भ्रष्टाचार की तह तक पहुँचने वाले पत्रकारों का दौर

राष्ट्रपति का दिया हुआ नाम

20वीं सदी की शुरुआत के अमेरिका के एक सभागार के मंच पर खाली लकड़ी का व्याख्यान-मंच रखा है और मंच के किनारे लोहे की एक पुरानी रेक टिकी हुई है।

मकरैकर नाम पत्रकारों ने खुद नहीं चुना था; तत्कालीन राष्ट्रपति के एक भाषण के बाद इसका व्यापक इस्तेमाल होने लगा।

(1) ‘द पिलग्रिम्स प्रोग्रेस’ में खाद खुरचने वाली रेक थामे व्यक्ति
ब्रिटिश लेखक जॉन बन्यन (John Bunyan) की 1678 में प्रकाशित पुस्तक ‘द पिलग्रिम्स प्रोग्रेस (The Pilgrim's Progress)’ में खाद खुरचने वाली रेक थामे एक व्यक्ति आता है। उसके सिर के ऊपर स्वर्ग का मुकुट बढ़ाया जाता है, फिर भी वह उसकी ओर नहीं देखता और सिर झुकाए ज़मीन की गंदगी ही खुरचकर इकट्ठी करता रहता है।

(2) 1906 में रूज़वेल्ट का भाषण
राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट (Theodore Roosevelt) ने 1906 के 4वें महीने में दिए एक भाषण में इस पात्र से तुलना करके उन पत्रकारों पर कटाक्ष किया जो समाज के केवल बुरे पहलुओं को सामने लाते थे। हालाँकि, उसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि सच्चे खुलासे समाज के लिए बेहद ज़रूरी हैं।

(3) एक अप्रिय उपनाम
अधिकांश पत्रकारों को यह नाम सख्त नापसंद था। उन्हें लगा कि जिस राष्ट्रपति के साथ मिलकर वे सुधारों को आगे बढ़ाते आए थे, उसी ने उनका उपहास किया है। लेकिन यह उपनाम जल्द ही फैल गया और आज इसका इस्तेमाल सत्ता के भ्रष्टाचार की तह तक पहुँचने वाले पत्रकारों के लिए होता है।


पत्रिकाओं की अगुआई में खुलासों का दौर

1900 के दशक की एक पत्रिका के संपादकीय कार्यालय में लकड़ी की मेज़ पर पत्रिकाओं के ढेर, हाथ से चलने वाला टाइपराइटर और हरे शेड वाला टेबल लैंप रखा हुआ है।

मकरैकर पत्रकारों को काम करने का अवसर मिलने में सस्ती और व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली पत्रिकाओं के विकास का बड़ा योगदान था।

  • जनसाधारण की पत्रिका (Mass Magazine): ‘मैकक्लूर्स (McClure's)’ जैसी पत्रिकाओं ने प्रति प्रति 15 सेंट की कम कीमत और भरपूर चित्रों के ज़रिए बढ़ते मध्यवर्गीय पाठक समुदाय को आकर्षित किया।
  • खोजी रिपोर्टिंग (Investigative Reporting): पत्रकार कई महीनों से लेकर कई वर्षों तक सामग्री जुटाते और लोगों से मिलते थे तथा छोटी खबरों के बजाय लंबी लेखमालाएँ लिखते थे।
  • सुधार की भावना (Reform Spirit): पहले की पीत पत्रकारिता अखबारों की बिक्री बढ़ाने के लिए सनसनीखेज घटनाओं को उठाती थी, जबकि मकरैकर पत्रकारों का लक्ष्य दोषपूर्ण व्यवस्थाओं को सुधारना था।

(1) 1903 के 1वें महीने का अंक
‘मैकक्लूर्स’ के 1903 के 1वें महीने के अंक को अक्सर मकरैकर युग की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। इसी एक अंक में कंपनियों, शहरी राजनीति और श्रमिक समस्याओं की अलग-अलग पड़ताल करने वाले तीन खुलासापरक लेख एक साथ प्रकाशित हुए थे।

(2) तस्वीरों में दिखाई गई गरीबी
इससे पहले ही पत्रकार जेकब रीस (Jacob Riis) फ्लैश फोटोग्राफी के ज़रिए न्यूयॉर्क की गरीब बस्तियों के सामूहिक आवासों की दयनीय स्थिति की तस्वीरें खींचकर उसे सामने ला चुके थे। उन्होंने उस हकीकत को आँखों के सामने रख दिया जिसे केवल शब्दों से व्यक्त करना कठिन था।


दुनिया बदलने वाले प्रमुख खुलासे

20वीं सदी की शुरुआत के एक बूचड़खाने को फिर से रचकर बनाए गए स्थान में लकड़ी की लंबी कार्य-मेज़, लटकते लोहे के हुक और ईंटों की पुरानी दीवार दिखाई देती है।

मकरैकर पत्रकारों के लेखों ने पाठकों में आक्रोश पैदा किया और वह आक्रोश वास्तव में कानूनों और व्यवस्थाओं में बदलाव का कारण बना।

(1) स्टैंडर्ड ऑयल का इतिहास
आइडा टारबेल (Ida Tarbell) ने 1902 से 1904 तक ‘मैकक्लूर्स’ में एक लेखमाला प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि तेल कंपनी स्टैंडर्ड ऑयल ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को किस तरह बाहर किया था। इस लेखमाला ने विशाल एकाधिकारवादी कंपनियों को तोड़ने और एकाधिकार रोकने के लिए कानून बनाने की मुहिम को बल दिया।

(2) शहरों की शर्म
लिंकन स्टीफेंस (Lincoln Steffens) ने सेंट लुइस सहित कई शहरों में रिश्वत के ज़रिए नेताओं और कारोबारियों को जोड़ने वाले तंत्र की पड़ताल की और अपने लेखों को ‘शहरों की शर्म (The Shame of the Cities)’ नामक पुस्तक में संकलित किया।

(3) उपन्यास ‘द जंगल’ और खाद्य कानून
अप्टन सिंक्लेयर (Upton Sinclair) ने शिकागो के बूचड़खानों में 7 सप्ताह तक की गई पड़ताल के आधार पर 1906 में उपन्यास ‘द जंगल (The Jungle)’ प्रकाशित किया। पुस्तक का उद्देश्य श्रमिकों के दयनीय जीवन को सामने लाना था, लेकिन पाठकों को मांस प्रसंस्करण की अस्वच्छ प्रक्रिया पर अधिक आक्रोश आया। परिणामस्वरूप, उसी वर्ष शुद्ध खाद्य एवं औषधि अधिनियम और मांस निरीक्षण अधिनियम बनाए गए। सिंक्लेयर ने कहा था, “मैंने जनता के दिल पर निशाना साधा था, लेकिन अनजाने में उसके पेट पर जा लगा।”

मकरैकर पत्रकारों के खुलासों से कानून बदलने की प्रक्रिया दर्शाने वाला इन्फोग्राफिक। लंबे समय तक खोजी पड़ताल, पत्रिका में खुलासापरक लेखमाला का प्रकाशन, पाठकों का आक्रोश और कानूनों व व्यवस्थाओं में बदलाव तीरों से जुड़े हैं। नीचे उदाहरण के तौर पर आइडा टारबेल को दिखाया गया है, जिन्होंने स्टैंडर्ड ऑयल पर लेखमाला लिखकर एकाधिकार तोड़ने में योगदान दिया, और अप्टन सिंक्लेयर को, जिनके 1906 के उपन्यास ‘द जंगल’ ने शुद्ध खाद्य एवं औषधि अधिनियम तथा मांस निरीक्षण अधिनियम बनने का मार्ग प्रशस्त किया।
लगातार की गई पड़ताल पत्रिका के लेखों में प्रकाशित हुई और पाठकों का आक्रोश कानूनों तथा व्यवस्थाओं में बदलाव का कारण बना।

मकरैकर पत्रकारों की विरासत

एक आधुनिक खोजी पत्रकार का पीछे से दिखाई देता दृश्य, जो टेबल लैंप की रोशनी में दस्तावेज़ों के ढेर, लैपटॉप और रिकॉर्डर के साथ सामग्री की समीक्षा कर रहा है।

मकरैकर पत्रकारों का उत्कर्ष काल लंबे समय तक नहीं रहा, लेकिन उनकी पड़ताल की पद्धति ने आज की पत्रकारिता में गहरी जड़ें जमा ली हैं।

(1) खोजी पत्रकारिता का प्रारंभिक स्वरूप
लंबे समय तक सामग्री जुटाकर और साक्ष्य इकट्ठे करके सत्ता के गलत कामों को उजागर करने वाली खोजी पत्रकारिता ने मकरैकर पत्रकारों की पद्धति को सीधे अपनाया है। आज भी अमेरिका में खोजी पत्रकारों को अनौपचारिक रूप से मकरैकर कहा जाता है।

(2) प्रहरी के रूप में पत्रकारिता
यह विचार भी इसी दौर में मज़बूत हुआ कि पत्रकारिता को सरकार और कंपनियों पर नज़र रखने वाले प्रहरी (Watchdog) की भूमिका निभानी चाहिए। पाठकों ने खुद देखा कि लेख वास्तव में समाज को बदल सकते हैं।

(3) सटीकता की चुनौती
जैसा कि रूज़वेल्ट ने ज़ोर देकर कहा था, खुलासों में ताकत तभी होती है जब वे सच हों। अपुष्ट आशंकाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाली रिपोर्टिंग उलटे पत्रकारिता के प्रति विश्वास को तोड़ती है।


मकरैकर ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने असहज करने वाली सच्चाइयों का अंत तक पीछा किया। आलोचना सहते हुए भी उन्होंने उस कीचड़ में झाँका जिसे कोई देखना नहीं चाहता था और उनकी बदौलत समाज एक कदम आगे बढ़ सका।

यह याद रखना कि कीचड़ खुरचने का श्रम अंततः दुनिया को साफ करता है, अच्छी पत्रकारिता को पहचानने की समझ विकसित करने का पहला कदम है।

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