कैंपिंग स्थल या संगीत कार्यक्रम में जब किसी छड़ी को ‘चटाक’ से मोड़कर हिलाते हैं, तो उसमें चमकीला प्रकाश फैलने लगता है। उसमें न बैटरी होती है, न तार, और हाथ में पकड़ने पर वह गर्म भी नहीं लगती। मोमबत्ती या बल्ब की तरह किसी चीज़ को जलाए या तपाए बिना प्रकाश कैसे निकल सकता है? इसका रहस्य छड़ी के भीतर होने वाली रासायनिक अभिक्रिया में छिपा है। इसी घटना को ‘रासायनिक संदीप्ति (Chemiluminescence)’ कहते हैं।
सरल शब्दों में, रासायनिक संदीप्ति का अर्थ है ‘रासायनिक अभिक्रिया से निकली ऊर्जा का ऊष्मा के बजाय प्रकाश में बदलकर निकलना’। इसमें लगभग कोई ऊष्मा नहीं निकलती, इसलिए इसे ‘ठंडा प्रकाश’ भी कहते हैं। जब यह जीवों के शरीर के भीतर होती है, तो इसे अलग से जैव संदीप्ति कहा जाता है।
इस सामग्री में हम रासायनिक संदीप्ति की परिभाषा और प्रकाश उत्पन्न होने के सिद्धांत से शुरुआत करके ग्लो स्टिक, ल्यूमिनॉल और जुगनू जैसे उदाहरणों तथा प्रयोगशालाओं और उद्योगों में इसके उपयोग के तरीकों को क्रम से समझेंगे।

रासायनिक अभिक्रियाएँ प्रकाश कैसे उत्पन्न करती हैं
रासायनिक संदीप्ति क्या है?

हमें सामान्यतः दिखाई देने वाला अधिकांश प्रकाश गर्म वस्तुओं से निकलता है। मोमबत्ती या तापदीप्त बल्ब की तरह उच्च तापमान पर तपने वाली वस्तुओं के प्रकाश उत्सर्जन को तापदीप्ति कहते हैं। वहीं, रासायनिक संदीप्ति में कम तापमान पर भी अभिक्रिया स्वयं प्रकाश उत्पन्न करती है।
(1) लंबे समय से ज्ञात प्रकाश
1669 में जर्मनी के हेनिग ब्रांड (Hennig Brand) द्वारा खोजा गया श्वेत फॉस्फोरस हवा में अपने आप हल्का हरा प्रकाश देता था। यह दृश्य इतना प्रभावशाली था कि फॉस्फोरस (Phosphorus) का नाम ही ‘प्रकाश धारण करने वाला’ अर्थ देने वाले यूनानी शब्द से लिया गया। यह प्रकाश श्वेत फॉस्फोरस की हवा में मौजूद ऑक्सीजन से अभिक्रिया के कारण उत्पन्न होता है और रासायनिक संदीप्ति का एक प्रमुख उदाहरण है। प्रयोगशाला में बनाए गए पदार्थों में रासायनिक संदीप्ति का पहला अवलोकन पोलैंड के रसायनज्ञ ब्रोनिस्वाव रादज़िशेव्स्की (Bronisław Radziszewski) ने 1877 में लोफीन (Lophine) नामक यौगिक में किया था।
(2) मिलते-जुलते, लेकिन अलग प्रकाश
ऊर्जा कहाँ से मिलती है, इसके आधार पर प्रकाश के इन तीन प्रकारों को अलग किया जाता है।
- प्रतिदीप्ति (Fluorescence): वह घटना जिसमें प्रकाश अवशोषित करने वाला पदार्थ तुरंत दूसरे रंग का प्रकाश उत्सर्जित करता है।
- स्फुरदीप्ति (Phosphorescence): वह घटना जिसमें अवशोषित प्रकाश ऊर्जा कुछ समय तक संचित रहती है और फिर धीरे-धीरे निकलती है। अँधेरे में चमकने वाले स्टिकर इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
- रासायनिक संदीप्ति (Chemiluminescence): वह घटना जिसमें प्रकाश को अवशोषित किए बिना केवल रासायनिक अभिक्रिया की ऊर्जा से प्रकाश उत्पन्न होता है।
प्रकाश उत्पन्न होने का सिद्धांत

इसकी कुंजी ‘उत्तेजित अवस्था’ है। पदार्थ के भीतर इलेक्ट्रॉन सामान्यतः सबसे स्थिर मूल अवस्था में रहते हैं, लेकिन ऊर्जा मिलने पर वे अधिक ऊँचे ऊर्जा स्तर की उत्तेजित अवस्था में पहुँच जाते हैं। उत्तेजित अवस्था अस्थिर होती है, इसलिए इलेक्ट्रॉन जल्द ही अपनी मूल अवस्था में लौट आते हैं और उस समय बची हुई ऊर्जा को प्रकाश के कणों, यानी फोटॉनों, के रूप में उत्सर्जित करते हैं।
(1) अभिक्रिया उत्तेजित अणु बनाती है
सामान्य रासायनिक अभिक्रियाएँ अतिरिक्त ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में बाहर निकालती हैं। रासायनिक संदीप्ति में दो पदार्थों की अभिक्रिया से बनने वाला उत्पाद शुरू से ही उत्तेजित अवस्था में उत्पन्न होता है। यह अणु मूल अवस्था में लौटते समय प्रकाश उत्सर्जित करता है, इसलिए तापमान लगभग नहीं बढ़ता।
(2) प्रकाश का रंग अणु तय करता है
निचले ऊर्जा स्तर पर लौटते समय निकलने वाली ऊर्जा की मात्रा के अनुसार प्रकाश का रंग बदलता है। ऊर्जा अधिक हो तो प्रकाश नीले रंग के करीब और कम हो तो लाल रंग के करीब होता है। इसलिए प्रकाश उत्सर्जित करने वाले अणु के अनुसार एक ही सिद्धांत से कई रंग उत्पन्न किए जा सकते हैं।
रोज़मर्रा के जीवन में रासायनिक संदीप्ति

प्रयोगशाला के बाहर भी रासायनिक संदीप्ति हमारी सोच से कहीं अधिक निकट है। मनोरंजन के साधनों से लेकर अपराध की जाँच और प्रकृति के जीवों तक, इसके उपयोग विविध हैं।
[उदाहरण 1] मोड़ने पर चमकने वाली ग्लो स्टिक
ग्लो स्टिक के भीतर ऑक्सैलिक अम्ल के एस्टर और प्रतिदीप्त रंजक वाला एक विलयन तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड से भरी काँच की एक पतली नली होती है। छड़ी को मोड़ने पर काँच की नली टूट जाती है और दोनों विलयन मिल जाते हैं। अभिक्रिया से निकली ऊर्जा रंजक को उत्तेजित करती है, जिससे प्रकाश निकलता है। यह तरीका 1960 के दशक में अमेरिका की बेल प्रयोगशालाओं के एडविन चैंड्रॉस (Edwin Chandross) द्वारा खोजी गई अभिक्रिया पर आधारित है। रसायन कंपनी अमेरिकन सायनामिड (American Cyanamid) के माइकल राउहट (Michael Rauhut) ने इसमें सुधार करके इसे आज का रूप दिया। रंजक का प्रकार बदलने से हरा, नीला और नारंगी जैसे रंग मिलते हैं। गर्म जगह पर यह अधिक चमकती है लेकिन जल्दी बुझ जाती है, जबकि ठंडी जगह पर कम चमकती है लेकिन अधिक समय तक चलती है।
[उदाहरण 2] खून के निशान खोजने वाला ल्यूमिनॉल
ल्यूमिनॉल (Luminol) हाइड्रोजन परॉक्साइड से अभिक्रिया करने पर नीला प्रकाश देने वाला पदार्थ है, जिसका पहली बार संश्लेषण 1902 में जर्मनी में हुआ था। 1928 में जर्मन रसायनज्ञ एच. ओ. अल्ब्रेख्ट (H. O. Albrecht) ने पाया कि रक्त इस प्रकाश को अधिक तीव्र बना देता है, क्योंकि रक्त के हीमोग्लोबिन में मौजूद लोहा अभिक्रिया में सहायता करता है। इसके बाद 1937 में जर्मन विधि-चिकित्सा विशेषज्ञ वाल्टर श्पेख्ट (Walter Specht) ने अपराध स्थल पर रक्त के निशानों की जाँच में इसके उपयोग की विधि का विस्तृत अध्ययन किया। पोंछी गई जगह पर बची रक्त की अत्यंत थोड़ी मात्रा भी अँधेरे में लगभग 30 सेकंड तक प्रकाश देती है।
[उदाहरण 3] रात को रोशन करने वाले जुगनू
जुगनू के शरीर में मौजूद ल्यूसिफेरिन (Luciferin), ल्यूसिफेरेज़ (Luciferase) नामक एंज़ाइम की सहायता से ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके प्रकाश उत्पन्न करता है। यह जीवों द्वारा उत्पन्न रासायनिक संदीप्ति ही है। गहरे समुद्र की जेलीफ़िश और मछलियाँ भी इसी तरह के सिद्धांत से प्रकाश उत्पन्न करती हैं, हालाँकि पदार्थ प्रजाति के अनुसार अलग-अलग होते हैं।
रासायनिक संदीप्ति के उपयोग और सीमाएँ

रासायनिक संदीप्ति के लिए बाहर से प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए पृष्ठभूमि अँधेरी रहती है और प्रकाश की अत्यंत थोड़ी मात्रा भी सटीकता से पहचानी जा सकती है। इस लाभ के कारण इसका विश्लेषण के साधन के रूप में व्यापक उपयोग होता है।
(1) अत्यंत थोड़ी मात्रा का पता लगाती है
वायुमंडलीय मापन उपकरण नाइट्रिक ऑक्साइड की ओज़ोन से अभिक्रिया के दौरान निकलने वाले प्रकाश को गिनकर हवा में प्रदूषक पदार्थों की मात्रा मापते हैं। जीवविज्ञान के प्रयोगों में किसी विशेष प्रोटीन से प्रकाश उत्पन्न करने वाली अभिक्रिया जोड़कर उसकी इतनी कम मात्रा का भी पता लगाया जाता है जो आँखों से दिखाई नहीं देती।
(2) एक बार चालू होने पर इसे वापस नहीं पलटा जा सकता
अभिक्रिया करने वाले पदार्थ समाप्त होते ही प्रकाश भी समाप्त हो जाता है, इसलिए ग्लो स्टिक केवल एक बार इस्तेमाल की जा सकती है। ल्यूमिनॉल लोहे या ताँबे वाले पदार्थों तथा ब्लीच से भी अभिक्रिया करके प्रकाश देता है। इसलिए प्रकाश दिखाई देने पर तुरंत उसे रक्त मान लेने के बजाय अन्य जाँचों से दोबारा पुष्टि करनी चाहिए।
रासायनिक संदीप्ति दिखाती है कि आग जलाए बिना भी केवल पदार्थों के आपस में मिलने से प्रकाश उत्पन्न हो सकता है। संगीत कार्यक्रम की ग्लो स्टिक, जाँच स्थल का नीला प्रकाश और गर्मियों की रात के जुगनू—सभी एक ही सिद्धांत से चमकते हैं।
आँखों के सामने मौजूद प्रकाश कहाँ से आया, यह एक बार फिर पूछना ही रोज़मर्रा के जीवन में रसायन की खोज का पहला कदम है।