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स्मरण से सृजन तक सोच की सीढ़ियाँ, ब्लूम का वर्गीकरण (Bloom)

आपने कभी पाठ योजना या पाठ्यपुस्तक की शुरुआत में ऐसे वाक्य देखे होंगे: ‘इस इकाई को पूरा करने पर विद्यार्थी ~ की व्याख्या कर सकेगा।’ आखिर ‘जानता है’ या ‘समझता है’ के बजाय ‘व्याख्या कर सकेगा’, ‘तुलना कर सकेगा’ जैसे व्यवहार दर्शाने वाले शब्द क्यों लिखे जाते हैं? इसकी जड़ में एक ऐसा ढाँचा है, जिसमें सीखने को अलग-अलग स्तरों में व्यवस्थित किया गया है। यही ‘ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण (Bloom’s Taxonomy)’ है।

सरल शब्दों में, ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण एक ऐसा ढाँचा है, जो ‘कक्षा में विकसित की जाने वाली सोचने की क्षमता को आसान से कठिन स्तर तक क्रमबद्ध करता है।’ अमेरिकी शिक्षा मनोवैज्ञानिक बेंजामिन ब्लूम (Benjamin Bloom) ने अपने साथी शोधकर्ताओं के साथ इसे 1956 में ‘शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण: संज्ञानात्मक क्षेत्र’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इसकी शुरुआत इस चिंता से हुई कि परीक्षा के प्रश्न तैयार करते समय विश्वविद्यालयों के मानदंड अलग-अलग होते हैं, इसलिए एक साझा भाषा की आवश्यकता है।

इस सामग्री में हम क्रम से समझेंगे कि ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण क्या है, इसके मूल छह स्तर कौन-से थे, 2001 में आए संशोधित संस्करण में क्या बदला, और इसे शिक्षण तथा पढ़ाई में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।


ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण: सोच की गहराई मापने की सीढ़ी

ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण क्या है?

ब्लूम के शैक्षिक उद्देश्यों के वर्गीकरण का इन्फोग्राफिक। इसमें 1956 के मूल प्रारूप और 2001 के संशोधित संस्करण को अलग-अलग दिखाया गया है तथा भिन्नों की पढ़ाई के काल्पनिक उदाहरणों से संशोधित संस्करण की छह संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ—स्मरण, समझ, अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजन—समझाई गई हैं। साथ ही तथ्यात्मक, अवधारणात्मक, प्रक्रियात्मक और मेटासंज्ञानात्मक ज्ञान के चार आयाम प्रस्तुत किए गए हैं तथा प्रक्रियात्मक ज्ञान और अनुप्रयोग को जोड़ने वाला, समान हर बनाकर भिन्नों को जोड़ने का अधिगम उद्देश्य दिखाया गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि यह सीखने के ऐसे स्तरों की सूची नहीं है जिन्हें अनिवार्य रूप से क्रम से पार करना हो।

ब्लूम और उनके साथियों ने विद्यालय में विकसित की जाने वाली क्षमताओं को मोटे तौर पर तीन क्षेत्रों में बाँटा। फिर इनमें से मानसिक रूप से सोचने वाले क्षेत्र के विस्तृत स्तर तैयार किए।

  • संज्ञानात्मक क्षेत्र (Cognitive Domain): इसमें याद रखने, समझने और निर्णय करने जैसी सोचने की क्षमताएँ आती हैं।
  • भावात्मक क्षेत्र (Affective Domain): इसमें रुचि, दृष्टिकोण और मूल्यों जैसी मनोभावों से जुड़ी क्षमताएँ आती हैं। 1964 में डेविड क्रैथवोल (David Krathwohl) और अन्य विद्वानों ने इसे अलग से व्यवस्थित किया।
  • मनोदैहिक क्षेत्र (Psychomotor Domain): इसमें वाद्ययंत्र बजाने या प्रयोगशाला के उपकरण चलाने जैसी शरीर का उपयोग करने वाली क्षमताएँ आती हैं। 1970 के दशक की शुरुआत में अन्य विद्वानों ने इसके स्तर तैयार किए।

आमतौर पर ‘ब्लूम का वर्गीकरण’ कहने पर इनमें से संज्ञानात्मक क्षेत्र के स्तरों का उल्लेख किया जाता है। इसमें यह विचार निहित है कि ऊपरी स्तर तक पहुँचने के लिए निचले स्तर पर पैर टिकाना आवश्यक है, इसलिए इसकी तुलना अक्सर सीढ़ी या सोपानों से की जाती है।

आज प्रचलित पिरामिड का चित्र ब्लूम की पुस्तक में नहीं था; बाद में अन्य लोगों ने इसे आसानी से समझाने के लिए बनाया। स्वयं ब्लूम ने इन स्तरों को केवल एक-दूसरे पर क्रम से बनती संचयी संरचना के रूप में समझाया था; उन्होंने ऊपर की ओर सँकरे होते आकार पर ज़ोर नहीं दिया था।


मूल रूप से बनाए गए छह स्तर

1956 के संस्करण में संज्ञानात्मक क्षेत्र को छह स्तरों में बाँटा गया था। प्रत्येक स्तर का नाम संज्ञा के रूप में रखा गया था।

(1) आधार मज़बूत करने के स्तर
सबसे नीचे ज्ञान (Knowledge) है, जिसमें तथ्यों या शब्दों को याद किया जाता है। उसके ऊपर बोध (Comprehension) का स्तर है, जिसमें सीखी हुई बात को अपने शब्दों में समझाया जाता है, और अनुप्रयोग (Application) वह स्तर है, जिसमें सीखे हुए सिद्धांतों को नई परिस्थिति में इस्तेमाल किया जाता है।

(2) गहराई से सोचने के स्तर
विश्लेषण (Analysis) वह स्तर है, जिसमें सामग्री को भागों में बाँटकर उनके आपसी संबंधों को देखा जाता है। संश्लेषण (Synthesis) वह स्तर है, जिसमें विभिन्न तत्वों को जोड़कर एक नई समग्र रचना बनाई जाती है, और सबसे ऊपर मूल्यांकन (Evaluation) का स्तर है, जिसमें मानदंड तय करके मूल्य का निर्णय किया जाता है।

(3) प्रश्नों के माध्यम से अंतर समझना
एक ही उपन्यास पढ़ने पर भी ‘मुख्य पात्र का नाम क्या है?’ ज्ञान से जुड़ा प्रश्न है, जबकि ‘क्या मुख्य पात्र का चुनाव सही था?’ मूल्यांकन से जुड़ा प्रश्न है। इन स्तरों की जानकारी होने पर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आपका पूछा गया प्रश्न सोच की किस गहराई तक जाता है।

उस समय इन छह स्तरों में से पहले तीन को निम्न स्तर की सोच और बाद के तीन को उच्च स्तर की सोच कहने का तरीका भी प्रचलित हुआ। विद्यालयी परीक्षाओं के रटने पर अत्यधिक निर्भर होने की आलोचना को इस अंतर से बल मिला।


2001 के संशोधित संस्करण में हुए बदलाव

45 वर्षों तक व्यापक रूप से इस्तेमाल किए गए इस ढाँचे को 2001 में ब्लूम के शिष्य लॉरिन एंडरसन (Lorin Anderson), क्रैथवोल और अन्य विद्वानों ने मिलकर संशोधित किया और नए रूप में प्रकाशित किया।

[बदलाव 1] संज्ञा से क्रिया की ओर
  • याद करना (Remember) · समझना (Understand) · लागू करना (Apply): स्तरों के नाम क्रियाओं में बदल दिए गए, जो विद्यार्थियों द्वारा वास्तव में किए जाने वाले कार्यों को दर्शाती हैं।
  • विश्लेषण करना (Analyze) · मूल्यांकन करना (Evaluate) · सृजन करना (Create): संश्लेषण को सृजन करने में बदल दिया गया और उसे मूल्यांकन करने से भी ऊपर, सबसे ऊपरी स्थान पर रखा गया।
[बदलाव 2] ज्ञान के प्रकारों को अलग से बाँटना
  • ज्ञान आयाम (Knowledge Dimension): ज्ञान को तथ्यात्मक ज्ञान, अवधारणात्मक ज्ञान, प्रक्रियात्मक ज्ञान और मेटासंज्ञानात्मक ज्ञान के चार प्रकारों में बाँटा गया, ताकि यह भी देखा जाए कि ‘क्या’ सीखा जा रहा है।

इस तरह सोचने की प्रक्रियाओं और ज्ञान के प्रकारों को तालिका की पंक्तियों और स्तंभों में जोड़ने से अधिक सटीक रूप से पहचाना जा सकता है कि किसी पाठ का उद्देश्य तालिका के किस खाने में आता है। उदाहरण के लिए, ‘प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को क्रम से समझाना’ अवधारणात्मक ज्ञान को समझने वाले खाने में आता है, जबकि ‘पौधे उगाने का प्रयोग स्वयं तैयार करना’ प्रक्रियात्मक ज्ञान का सृजन करने वाले खाने में आता है।


शिक्षण और पढ़ाई में इस्तेमाल करने के तरीके

ब्लूम का वर्गीकरण केवल शिक्षकों का उपकरण नहीं है; यह स्वयं पढ़ाई करने वालों के लिए भी उपयोगी मार्गदर्शक है। इसका इस्तेमाल करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना अच्छा होगा।

  • क्रियाओं के रूप में उद्देश्य लिखना (Action Verbs): ‘जानता है’ के बजाय ‘सूची बनाता है’, ‘तुलना करता है’, ‘रूपरेखा तैयार करता है’ जैसी जाँची जा सकने वाली क्रियाओं में उद्देश्य लिखें।
  • उद्देश्य और मूल्यांकन में तालमेल रखना (Alignment): यदि विश्लेषण करना सिखाया गया है, तो परीक्षा में भी केवल याद की हुई जानकारी के बजाय विश्लेषण की माँग करने वाले प्रश्न होने चाहिए।
  • प्रश्नों की गहराई बढ़ाना (Questioning): तथ्यों की पुष्टि करने वाले प्रश्नों पर रुकने के बजाय कारण, निर्णय और नए विचार पूछने वाले प्रश्नों तक विस्तार करें।
  • क्रम से बँधे न रहना (Flexibility): इस आलोचना को भी ध्यान में रखें कि वास्तविक सीखने में स्तर कड़ाई से क्रम में नहीं आते, बल्कि उनके बीच आगे-पीछे जाते हुए विकास होता है।

केवल याद करने पर न रुककर समझना, इस्तेमाल करना, परखना और कुछ नया बनाना ही गहराई से सीखने की पहली सीढ़ी है।

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