कुछ दोस्त गणित की परीक्षा में कम अंक लाते हैं, लेकिन पहली बार सुना हुआ गीत तुरंत गुनगुनाने लगते हैं। कुछ दोस्तों को लिखना कठिन लगता है, पर फुटबॉल के मैदान में वे सबसे तेज़ निर्णय लेते हैं, और कुछ अनजान लोगों से भी जल्दी खुलकर बात करने लगते हैं। ऐसे दोस्तों को देखकर सवाल उठता है कि क्या ‘बुद्धिमान’ होने का फैसला केवल परीक्षा के अंकों से किया जा सकता है।
अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक हॉवर्ड गार्डनर (Howard Gardner) ने 1983 में अपनी पुस्तक ‘मन के ढाँचे (Frames of Mind)’ में इस सवाल का एक नया जवाब दिया। उनका विचार था कि मनुष्य की बुद्धि कोई एक समग्र क्षमता नहीं, बल्कि एक-दूसरे से अपेक्षाकृत स्वतंत्र कई क्षमताओं का समूह है। इसे ‘बहुबुद्धि सिद्धांत (Theory of Multiple Intelligences)’ कहा जाता है।
इस सामग्री में हम क्रम से बहुबुद्धि सिद्धांत की पृष्ठभूमि, बुद्धि के आठ प्रकार, कक्षा में इस सिद्धांत के उपयोग के तरीके और इसकी आलोचनाओं पर नज़र डालेंगे।
बुद्धिमत्ता का केवल एक रूप नहीं है, बहुबुद्धि सिद्धांत की दुनिया

एक अंक से बुद्धि के अनेक रूपों तक

20वीं सदी की शुरुआत से बुद्धि को मुख्यतः बुद्धि परीक्षणों से मापा जाता रहा है। परीक्षण का परिणाम बुद्धिलब्धि (IQ) नामक एक संख्या के रूप में सामने आता था, और माना जाता था कि यह संख्या स्कूल के अंकों और भविष्य का काफ़ी सटीक अनुमान देती है। लेकिन गार्डनर का मानना था कि ऐसे परीक्षण मुख्यतः भाषा और तर्क से जुड़ी क्षमताओं को ही मापते हैं।
गार्डनर ने बुद्धि की व्यापक परिभाषा देते हुए इसे ‘किसी संस्कृति के भीतर मूल्यवान समस्याओं को हल करने या कुछ रचने की क्षमता’ कहा। उन्होंने यह भी कहा कि किसी क्षमता को बुद्धि के एक रूप के तौर पर स्वीकार करने के लिए कुछ मानदंडों पर खरा उतरना चाहिए।
(1) मस्तिष्क से संबंध
ऐसे उदाहरण होने चाहिए जिनमें मस्तिष्क के किसी विशेष हिस्से को क्षति पहुँचने पर केवल वही क्षमता अलग से नष्ट हो जाए या बची रहे।
(2) असाधारण व्यक्तियों का अस्तित्व
केवल एक क्षेत्र में अद्भुत प्रतिभा दिखाने वाले बाल प्रतिभाशालियों या सवांट व्यक्तियों का होना इस बात का संकेत है कि वह क्षमता अलग से मौजूद है।
(3) विशिष्ट विकास प्रक्रिया
शुरुआती सीखने के चरण से विशेषज्ञ स्तर तक उस क्षमता को अपने विशिष्ट विकास चरणों से गुज़रना चाहिए।
(4) विशिष्ट प्रतीक प्रणाली
उस क्षमता को व्यक्त करने की अपनी विशिष्ट संकेत प्रणाली होनी चाहिए, जैसे भाषा की लिपि या संगीत की स्वर-लिपि।
गार्डनर ने इन मानदंडों को लागू करने के लिए मनोविज्ञान के साथ-साथ मस्तिष्क विज्ञान, मानवशास्त्र और कला जैसे कई क्षेत्रों से प्रमाण जुटाए। इस तरह उनका शुरुआती आधार उस प्रचलित पद्धति से बहुत अलग था, जिसमें परीक्षा के अंकों का सांख्यिकीय विश्लेषण करके बुद्धि की पहचान की जाती थी।
बुद्धि के आठ प्रकार

गार्डनर ने शुरुआत में बुद्धि के सात प्रकार बताए और 1995 में घोषणा की कि वे प्रकृतिपरक बुद्धि को आठवें प्रकार के रूप में जोड़ेंगे।
- भाषायी बुद्धि (Linguistic Intelligence): शब्दों और लेखन के अर्थ तथा ध्वनियों का कुशलता से उपयोग करके पढ़ने, लिखने और समझाने की क्षमता है।
- तार्किक-गणितीय बुद्धि (Logical-Mathematical Intelligence): संख्याओं की गणना करने और कारण तथा परिणाम पर विचार करके समस्याएँ हल करने की क्षमता है।
- स्थानिक बुद्धि (Visual-Spatial Intelligence): मन में आकृतियों और स्थानों की कल्पना करने तथा स्थानिक संबंधों का उपयोग करने की क्षमता है।
- संगीतात्मक बुद्धि (Musical Intelligence): सुर की ऊँचाई, ताल और स्वर-गुण को महसूस करने तथा व्यक्त करने की क्षमता है।
- शारीरिक-गतिसंवेदी बुद्धि (Bodily-Kinesthetic Intelligence): शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करने और हाथों से वस्तुओं को कुशलतापूर्वक संभालने की क्षमता है।
- अंतरवैयक्तिक बुद्धि (Interpersonal Intelligence): दूसरे लोगों की भावनाओं और इरादों को पहचानने तथा उनके साथ मिलकर काम करने की क्षमता है।
- अंतर्वैयक्तिक बुद्धि (Intrapersonal Intelligence): अपनी भावनाओं, खूबियों और कमज़ोरियों को सही ढंग से जानने तथा स्वयं को नियंत्रित करने की क्षमता है।
- प्रकृतिपरक बुद्धि (Naturalistic Intelligence): पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और प्रकृति के विभिन्न रूपों को पहचानने तथा उनका वर्गीकरण करने की क्षमता है।
हर व्यक्ति में इन सभी प्रकार की बुद्धि कुछ न कुछ मात्रा में होती है; बस हर व्यक्ति की मज़बूत और कमज़ोर क्षमताओं का संयोजन अलग होता है। अक्सर कई प्रकार की बुद्धि मिलकर किसी एक काम को पूरा करती हैं।
कक्षा में बहुबुद्धि सिद्धांत का उपयोग

बहुबुद्धि सिद्धांत मनोवैज्ञानिकों की तुलना में शिक्षकों के बीच अधिक लोकप्रिय हुआ। गार्डनर ने शिक्षा में निम्नलिखित दिशाएँ अपनाने की सलाह दी।
(1) विद्यार्थी के अनुसार ढालना
हर विद्यार्थी की खूबियाँ अलग होती हैं, इसलिए जहाँ तक संभव हो, हर व्यक्ति के अनुकूल तरीके से पढ़ाएँ।
(2) कई तरीकों से पढ़ाना
महत्वपूर्ण विषयवस्तु को कहानी, चित्र, प्रयोग, चर्चा और शारीरिक गतिविधियों जैसे कई तरीकों से प्रस्तुत करें। इससे अधिक विद्यार्थी विषयवस्तु को समझ सकते हैं और एक ही बात को कई दृष्टिकोणों से जान पाते हैं।
(3) ठप्पा न लगाना
‘तुम संगीतात्मक बुद्धि वाले हो’ कहकर विद्यार्थी को बुद्धि के किसी एक प्रकार तक सीमित न करें। गार्डनर ने ज़ोर दिया कि इस सिद्धांत से विद्यार्थियों की संभावनाओं का विस्तार होना चाहिए, उन्हें सीमित नहीं करना चाहिए।
गार्डनर ने बार-बार यह भी कहा कि बहुबुद्धि को सीखने की शैलियों (Learning Styles) के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए। सीखने की शैलियाँ देखने या सुनने जैसी पसंद को दर्शाती हैं, जबकि बहुबुद्धि ऐसी क्षमताओं को दर्शाती है जिनके स्तर का आकलन किया जा सकता है।
बहुबुद्धि सिद्धांत की आलोचनाएँ

बहुबुद्धि सिद्धांत ने शिक्षा जगत पर गहरा प्रभाव डाला, लेकिन मनोविज्ञान जगत में इसकी काफ़ी आलोचना भी हुई।
- सामान्य बुद्धि से टकराव (General Intelligence): कई बुद्धि परीक्षणों में अक्सर अलग-अलग क्षमताओं के अंक एक साथ ऊँचे या नीचे पाए जाते हैं, जो इस दावे से मेल नहीं खाता कि बुद्धि के विभिन्न प्रकार एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं।
- अनुभवजन्य प्रमाणों की कमी (Lack of Empirical Evidence): आलोचना यह है कि बुद्धि के आठों प्रकारों को अलग-अलग मापने वाले प्रमाणित परीक्षण उपलब्ध नहीं हैं और इस सिद्धांत की कठोर जाँच करने वाले अध्ययन भी कम हैं।
- बुद्धि शब्द का विस्तार (Definition Problem): यह आपत्ति है कि संगीत या खेल जैसी क्षमताओं को प्रतिभा या योग्यता कहा जा सकता था, लेकिन उन्हें बुद्धि का नाम देकर इस शब्द का दायरा बढ़ा दिया गया।
गार्डनर ने स्वयं भी स्वीकार किया कि इस सिद्धांत का अभी तक मज़बूत प्रयोगात्मक सत्यापन नहीं हुआ है। फिर भी, बुद्धि को केवल एक संख्या के रूप में देखने से आगे बढ़ने की प्रेरणा देकर इसने शिक्षा के सामने एक सार्थक प्रश्न रखा।
बहुबुद्धि सिद्धांत हमें याद दिलाता है कि सभी विद्यार्थियों के लिए एक ही तरह से बुद्धिमान होना आवश्यक नहीं है। परीक्षा के अंकों से आगे बढ़कर हर व्यक्ति की खूबियाँ खोजना ही उस सीखने का पहला कदम है जो व्यक्ति की संभावनाओं का विस्तार करता है।