इस बार हम सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले शोध की प्रक्रिया को समझाने वाली सामग्री तैयार करना चाहते हैं।
पदार्थों पर विभिन्न प्रयोगों और विकास कार्यों के माध्यम से किए जाने वाले प्राकृतिक विज्ञान के शोध से भिन्न, सामाजिक विज्ञान का शोध मनुष्यों को अध्ययन का विषय बनाता है और संकल्पित प्रतिज्ञप्तियों तथा चरों से बनी शोध परिकल्पनाओं के बीच संबंधों की व्याख्या करता है।
प्रयोगशाला आधारित शोध पद्धति अपनाने में सामाजिक विज्ञान के शोध की कुछ सीमाएँ हैं। फिर भी, यह अनुभवजन्य साक्ष्यों के आधार पर सामाजिक घटनाओं को सैद्धांतिक दृष्टि से समझता और उनकी व्याख्या करता है तथा अनिश्चित भविष्य का पूर्वानुमान लगाने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें प्रमाणित करता है।
सामाजिक विज्ञान में शोध की प्रक्रिया

सामाजिक विज्ञान के शोधकर्ता सामान्यतः परिकल्पना निर्धारित करना → शोध पद्धति चुनना → आँकड़े एकत्र करना → व्याख्या करना → पुनः समीक्षा करना → फिर से पिछली प्रक्रिया दोहराना, इस क्रम में शोध करते हैं।
इस संबंध में, शोध की शुरुआत से निष्कर्ष तक की सामान्य 6 चरणों वाली शोध प्रक्रिया इस प्रकार है।
चरण 1: शोध समस्या की पहचान
आपकी रुचि शोध के किस क्षेत्र में है?
शोध का विषय निर्धारित करने के लिए सबसे पहले अवलोकन के माध्यम से यह तय करना चाहिए कि किस क्षेत्र में किस चीज़ पर शोध करना है।
इस समय यदि शोध क्षेत्र का दायरा बहुत व्यापक रखा जाए, तो जाँचने के लिए साहित्य और पृष्ठभूमि संबंधी सामग्री बहुत अधिक हो जाती है। वहीं, दायरा बहुत सीमित रखने पर शोध का विषय निर्धारित करना और प्रयोग की रूपरेखा बनाना कठिन हो जाता है।
इसलिए इन लाभों और कमियों पर पर्याप्त विचार करके शोध का क्षेत्र और उसका विषय निर्धारित करना उचित है।
चरण 2: मौजूदा साहित्य की समीक्षा और विश्लेषण
त्रुटियाँ खोजें और नए मूल्य की पहचान करें
मौजूदा साहित्य की समीक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें पिछले शोधों में किसी त्रुटि की जाँच की जाती है और ऐसे पहलुओं को खोजा जाता है जिन पर आगे शोध करना उपयोगी हो सकता है।
कभी-कभी साहित्य की समीक्षा से पिछले शोध की त्रुटियों और कमियों का पता लगाकर उन्हें ही शोध का विषय बना लिया जाता है।
चरण 3: शोध परिकल्पना का निर्धारण
OO, OO होगा / XX, XX नहीं होगा
इसके बाद प्रयोगों या साहित्य की समीक्षा से प्राप्त जानकारी के आधार पर जाँची जा सकने वाली संभावना या अनुमान को परिकल्पना के रूप में निर्धारित किया जाता है।
तर्क के माध्यम से नई या संशोधित परिकल्पना बनाई जाती है और प्रयोग की परिस्थितियों की रूपरेखा तैयार की जाती है, ताकि उस परिकल्पना का परीक्षण किया जा सके।
इस संबंध में निगमन और आगमन उपयोगी अवधारणाएँ हैं, जिन्हें जानना लाभदायक होगा। नीचे दी गई सामग्री इसमें मदद करेगी।
निगमन और आगमन को आसानी से समझें
चरण 4: आँकड़ों का संग्रह
परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए आँकड़े खोजें
आँकड़ों के संग्रह का चरण वह है जिसमें पिछले चरण में निर्धारित परिकल्पना के सत्य या असत्य होने का निर्णय करने के लिए आँकड़े एकत्र किए जाते हैं। इसमें पहले से उपलब्ध आँकड़ों का वर्गीकरण किया जाता है या पहले तैयार किए गए प्रयोग के माध्यम से नए आँकड़े प्राप्त किए जाते हैं।
ऐसे आँकड़े एकत्र करने के प्रमुख तरीकों में प्रश्नावली के माध्यम से मापन और अवलोकन, जनमत सर्वेक्षण, प्रयोग तथा सरकार और शोध संस्थानों आदि द्वारा प्रकाशित आँकड़ों का उपयोग शामिल हैं।
चरण 5: आँकड़ों का विश्लेषण और व्याख्या
एकत्र किए गए आँकड़ों को संसाधित करके सार्थक जानकारी में बदलें।
आँकड़ों के विश्लेषण और व्याख्या के चरण का अर्थ है एकत्र किए गए आँकड़ों को समेकित करके ऐसी स्थिति में लाना जिसमें उनकी व्याख्या की जा सके।
विश्लेषण आँकड़ों को समझने और उनकी व्याख्या करने योग्य रूप देता है, जबकि व्याख्या विश्लेषण के परिणामों के आधार पर उचित अनुमान लगाने और निष्कर्ष निकालने में सहायता करती है।
चरण 6: निष्कर्ष और प्रतिक्रिया
क्या परिकल्पना का परीक्षण हो गया? क्या परिणाम प्राप्त हुए?
अंतिम चरण में पिछले चरण 5 (आँकड़ों का विश्लेषण और व्याख्या) की प्रक्रिया से प्राप्त निष्कर्ष प्रस्तुत किए जाते हैं और उन पर प्रतिक्रिया ली जाती है।
यदि निष्कर्ष ठीक से नहीं निकल पाया है, तो नई परिकल्पना बनाई जाती है या अतिरिक्त आँकड़े एकत्र करके प्रतिक्रिया ली जाती है। संतोषजनक परिणाम मिलने तक यह प्रक्रिया दोहराई जाती है।
यहाँ हमने सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले शोध की प्रक्रिया को समझा। ऊपर बताई गई 6 चरणों वाली प्रक्रिया का हमेशा इसी क्रम में पालन करना आवश्यक नहीं है; शोध के उद्देश्य के अनुसार प्रक्रिया बदल सकती है।
उदाहरण के लिए, जनमत सर्वेक्षण में प्रक्रिया को यथासंभव सरल रखना अच्छा है। वहीं, किसी सामाजिक समस्या का गहराई से अध्ययन करते समय विभिन्न चरणों में सावधानी बरतने से शोध में पक्षपात या त्रुटियों को कम किया जा सकता है।