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मज़ाक या गंभीर बात, पो का नियम (Poe's Law)

इंटरनेट पर किसी ने लिखा, “पृथ्वी असल में सपाट है, और हवाई जहाज़ की खिड़की से बाहर का दृश्य गोल इसलिए दिखता है क्योंकि खिड़की घुमावदार है।” क्या उसने सचमुच इस बात पर विश्वास करके यह लिखा था, या ऐसे दावों का मज़ाक उड़ाने के लिए? अक्सर केवल लिखी हुई बात देखकर इसका पता लगाना बिल्कुल संभव नहीं होता, और वास्तव में बहुत से लोग मज़ाक पर गुस्सा हो जाते हैं या गंभीर बात को मज़ाक समझकर टाल देते हैं।

इस तरह, लेखक का इरादा बताने वाला कोई स्पष्ट संकेत न हो तो अतिवादी विचारों की नकल करने वाले व्यंग्य को कोई न कोई ज़रूर गंभीर बात समझ लेता है। इंटरनेट के अनुभव पर आधारित इस नियम को ‘पो का नियम (Poe's Law)’ कहते हैं। सरल शब्दों में, इसका अर्थ है कि ‘ऑनलाइन व्यंग्य और गंभीर बात के बीच अंतर करना कठिन है।’

इस लेख में हम क्रम से पो के नियम की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि, लिखित बातों में व्यंग्य ठीक से समझ में न आने के कारण, व्यंग्य को असली समाचार समझ लिए जाने के उदाहरण, और गलतफ़हमियाँ कम करते हुए लिखने तथा पढ़ने के तरीकों पर नज़र डालेंगे।


व्यंग्य और गंभीर बात के बीच, पो का नियम

पो के नियम की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि

घर में मेज़ पर रखे लैपटॉप पर इंटरनेट फ़ोरम पढ़ता एक व्यक्ति, जिसकी एक भौंह उठी हुई है और चेहरे पर उलझन का भाव है

पो का नियम 2005 के 8वें महीने में ईसाई विषयों से जुड़े एक इंटरनेट फ़ोरम पर विकासवाद और सृष्टिवाद को लेकर हुई बहस से निकला था। जब एक उपयोगकर्ता ने दूसरे से कहा, “अच्छा हुआ आपने आँख मारने वाला संकेत लगा दिया। वरना मैं इसे गंभीर बात समझ लेता,” तो नेथन पो (Nathan Poe) नाम के उपयोगकर्ता ने यह जवाब दिया।

उन्होंने कहा, “आँख मारने वाले इमोटिकॉन या ऐसे हास्य संकेत के बिना जिसे हर कोई पहचान सके, सृष्टिवादी की नकल में लिखी गई पैरोडी चाहे जैसे लिखी जाए, कोई न कोई उसे असली बात समझ ही लेगा।”

शुरुआत में यह बात सृष्टिवाद के बारे में थी, लेकिन उनके नाम पर इसे ‘पो का नियम’ कहा जाने लगा और जल्द ही यह हर तरह के अतिवादी दावों के लिए इस्तेमाल होने लगी। 2017 में अमेरिकी पत्रिका वायर्ड (Wired) ने पो के नियम को उस वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण इंटरनेट परिघटना भी चुना था।


लिखित बातों में व्यंग्य ठीक से समझ में क्यों नहीं आता

बाईं ओर कैफ़े में आमने-सामने बैठे हँसते हुए दो दोस्त और दाईं ओर अकेले स्मार्टफ़ोन देखते हुए गंभीर तथा उलझे भाव वाला एक व्यक्ति

आमने-सामने किए गए मज़ाक आम तौर पर आसानी से समझ में आ जाते हैं। लेकिन वही बात लिख दी जाए तो स्थिति बदल जाती है।

(1) आवाज़ और चेहरे के भावों का गायब होना
बोलते समय आवाज़ का उतार-चढ़ाव, हँसी का पुट और आँखों के इशारे साथ मिलकर ‘यह मज़ाक है’ का संकेत देते हैं। लिखित बात में ये संकेत नहीं होते, इसलिए पाठक को इरादे का अनुमान लगाना पड़ता है।

(2) वास्तव में मौजूद अतिवादी दावे
बात चाहे कितनी भी बेतुकी हो, कहीं न कहीं कोई व्यक्ति उस पर गंभीरता से विश्वास करता है। इसीलिए बढ़ा-चढ़ाकर किया गया व्यंग्य किसी वास्तविक दावे के लगभग समान दिखाई देने लगता है।

(3) अनजान लोगों से बातचीत
अगर बात किसी दोस्त ने कही हो तो उसके स्वभाव को ध्यान में रखकर उसका अर्थ समझा जा सकता है, लेकिन इंटरनेट पर अक्सर हमें पता ही नहीं होता कि लिखने वाला कौन है।

(4) जल्दी पढ़कर आगे बढ़ जाने की आदत
छोटी-छोटी पोस्ट पर सरसरी नज़र डालते हुए आगे बढ़ने पर, आसपास का संदर्भ देखे बिना केवल एक वाक्य को ही सच मान लेना आसान होता है।

इस समस्या की ओर पो से बहुत पहले ध्यान दिलाया जा चुका था। 1982 के 9वें महीने में अमेरिका के कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के कंप्यूटर वैज्ञानिक स्कॉट फ़ालमैन (Scott Fahlman) ने देखा कि विभाग के फ़ोरम पर मज़ाक को गंभीरता से लेने वालों के कारण बहस चलती जा रही थी। तब उन्होंने मज़ाक के साथ लगाने के लिए आड़े पड़े मुस्कुराते चेहरे ‘:-)’ का सुझाव दिया। अगले वर्ष शुरुआती इंटरनेट चर्चा नेटवर्क यूज़नेट (Usenet) की शिष्टाचार संबंधी मार्गदर्शिका में भी यह सलाह दी गई कि इस संकेत के बिना व्यंग्य पोस्ट करने पर, वह कितना भी स्पष्ट क्यों न लगे, लोग उसे गंभीरता से ले सकते हैं।


जब व्यंग्य को असली समाचार समझ लिया गया

रोशनी से भरे समाचार कक्ष में पत्रकार मॉनिटर देख रहे हैं; एक पत्रकार हैरान चेहरे से स्क्रीन को देख रहा है और उसका सहकर्मी स्क्रीन की ओर इशारा कर रहा है

पो का नियम केवल व्यक्तियों के बीच की बातचीत पर लागू नहीं होता। समाचार की पुष्टि करने की ज़िम्मेदारी रखने वाले मीडिया संस्थान भी यही गलती करते हैं।

2012 में ‘सबसे सेक्सी पुरुष’ को लेकर हंगामा

2012 के 11वें महीने में अमेरिकी व्यंग्य प्रकाशन द अनियन (The Onion) ने एक फ़र्ज़ी लेख प्रकाशित किया, जिसमें कहा गया कि उसने उत्तर कोरिया के किम जोंग उन को उस वर्ष का ‘दुनिया का सबसे सेक्सी जीवित पुरुष’ चुना है। लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपल्स डेली (People's Daily) के ऑनलाइन संस्करण ने इसे असली समाचार की तरह प्रकाशित कर दिया और साथ में 55 तस्वीरें भी जोड़ दीं।

बताया गया कि चीन के कई ऑनलाइन मीडिया संस्थानों से होकर फैलते समय इस खबर से ‘व्यंग्य लेख’ होने की जानकारी गायब हो गई थी। इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने इसका जमकर मज़ाक उड़ाया तो पीपल्स डेली ने एक दिन के भीतर लेख हटा दिया, और द अनियन ने पीपल्स डेली को ‘अपनी गौरवपूर्ण सहायक कंपनी’ कहते हुए एक बार फिर मज़ाक किया।

यह उदाहरण दिखाता है कि किसी लेख को कुछ ही बार आगे साझा करने पर उसका मूल संदर्भ कितनी आसानी से गायब हो सकता है।


गलतफ़हमियाँ कम करते हुए लिखने और पढ़ने के तरीके

सोफ़े पर बैठा एक व्यक्ति जवाब लिखने से पहले स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन के ऊपर उँगली रोके कुछ पल सोच में डूबा हुआ है

पो के नियम से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन लिखने और पढ़ने वाले थोड़ा-थोड़ा ध्यान दें तो गलतफ़हमियाँ काफ़ी कम की जा सकती हैं।

  • इरादे का संकेत (Tone Indicator): मज़ाक या कटाक्ष के साथ मुस्कुराता इमोटिकॉन या ‘यह मज़ाक है’ जैसा संकेत जोड़ें। अंग्रेज़ी भाषा के फ़ोरम पर कभी-कभी पोस्ट के अंत में ‘/s’ लगाकर भी बताया जाता है कि बात कटाक्ष के रूप में कही गई है।
  • स्रोत की जाँच (Source Check): खबर जितनी चौंकाने वाली हो, उतना ही यह जाँचें कि वह सबसे पहले कहाँ प्रकाशित हुई थी और कहीं वह व्यंग्य प्रकाशन तो नहीं है।
  • संदर्भ देखकर पढ़ना (Context Reading): लेखक की दूसरी पोस्ट या बातचीत के आगे-पीछे की बातें देखकर उसके इरादे का आकलन करें।
  • उदार व्याख्या (Charitable Reading): गुस्सा होने से पहले एक बार फिर सोचें, ‘कहीं यह मज़ाक तो नहीं?’

हालाँकि, कुछ लोग इस नियम का उलटा इस्तेमाल भी करते हैं। वे नफ़रत भरी बात कहने के बाद आलोचना होने पर ‘वह तो मज़ाक था’ कहकर बच निकलते हैं। इसलिए यह तय करना जितना महत्वपूर्ण है कि बात व्यंग्य है या नहीं, उतना ही महत्वपूर्ण यह देखना भी है कि उस बात से वास्तव में किसे और कैसी चोट पहुँचती है।


पो का नियम हमें याद दिलाता है कि लिखित बातचीत में हमारी सोच से कहीं अधिक आसानी से गलतफ़हमी पैदा हो सकती है। स्क्रीन के उस पार ऐसा व्यक्ति है जिसे हमारे इरादे का बिल्कुल पता नहीं है।

लिखते समय अपना इरादा और स्पष्ट करना तथा पढ़ते समय राय बनाने में थोड़ा ठहरना—यही स्क्रीन के उस पार मौजूद व्यक्ति के मन की बात ठीक से समझने वाले संवाद का पहला कदम है।

पो के नियम को समझाने वाला चित्र। यह दिखाता है कि बढ़ा-चढ़ाकर किया गया व्यंग्य जब चेहरे के भाव और बोलने के लहजे के बिना लिखित रूप में पहुँचता है, तो उसे व्यंग्य समझा जा सकता है या गलती से गंभीर बात माना जा सकता है; साथ ही यह इरादे का संकेत देने, स्रोत जाँचने और संदर्भ देखने से गलतफ़हमियाँ कम करने की प्रक्रिया दिखाता है।
पो के नियम का एक सरल काल्पनिक उदाहरण और गलतफ़हमियाँ कम करने के तरीके। संदर्भ: CMU, स्कॉट फ़ालमैन का इमोटिकॉन संबंधी अभिलेख (लिखित बात में लहजे और हावभाव के संकेत गायब होने की समस्या तथा हास्य के संकेत)। यह चित्र अनुभव पर आधारित नियम को समझाता है; इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गलतफ़हमी को रोका जा सकता है।

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