कभी आपने अलमारी के भीतर लंबे समय से रखी पेरिला के तेल की बोतल खोली होगी, तो सोंधी खुशबू के बजाय खट्टी और बासी गंध ने नाक में चुभन पैदा की होगी। मेवों या बिस्कुट जैसे खाद्य पदार्थों से भी ऐसी गंध आ सकती है, भले ही उनकी उपयोग की अंतिम तिथि अभी बाकी हो। आम बोलचाल में तेल की यह बासी दुर्गंध भोजन खराब होने का संकेत लगती है, लेकिन अक्सर इसका कारण फफूँद या जीवाणु नहीं, बल्कि स्वयं तेल में होने वाला बदलाव होता है। इसी घटना को ‘विकृतगंधिता (Rancidity)’ कहते हैं।
सरल शब्दों में, विकृतगंधिता वह प्रक्रिया है जिसमें खाद्य पदार्थों की वसा हवा की ऑक्सीजन, पानी या एंजाइमों से अभिक्रिया करके टूटती है, जिससे अप्रिय गंध और स्वाद पैदा होते हैं तथा गुणवत्ता घटती है। यह तेल वाले सभी खाद्य पदार्थों में हो सकती है और उनकी उपयोग की अंतिम तिथि तथा भंडारण का तरीका तय करने का एक महत्वपूर्ण आधार है।
इस सामग्री में हम क्रम से विकृतगंधिता के दो रास्तों, ऑक्सीकरण के फैलने की प्रक्रिया, विकृतगंधिता को तेज करने वाली परिस्थितियों और घर पर अपनाए जा सकने वाले बचाव के उपायों को समझेंगे।

वसा में वह बदलाव जो सोंधापन मिटा देता है: विकृतगंधिता
विकृतगंधिता के दो रास्ते

खाद्य पदार्थों में अधिकांश वसा ‘ट्राइग्लिसराइड’ के रूप में होती है, जिसमें ग्लिसरॉल के एक अणु से तीन वसीय अम्ल जुड़े होते हैं। यह ट्राइग्लिसराइड किस तरह बिगड़ता है, इसके आधार पर विकृतगंधिता को मुख्यतः दो प्रकारों में बाँटा जाता है।
(1) जल-अपघटनीय विकृतगंधिता
यह वह अभिक्रिया है जिसमें पानी और एंजाइम ट्राइग्लिसराइड को तोड़कर उससे वसीय अम्ल अलग करते हैं। वसा को तोड़ने वाला एंजाइम लाइपेज (Lipase), गर्मी और नमी इस अभिक्रिया में मदद करते हैं। पुराने मक्खन में खट्टी और तीखी दुर्गंध आने का कारण उससे अलग हुए ब्यूटिरिक अम्ल (Butyric Acid) जैसे छोटी शृंखला वाले वसीय अम्ल होते हैं।
(2) ऑक्सीकरणीय विकृतगंधिता
यह बदलाव वसीय अम्लों के द्विबंध वाले हिस्सों की ऑक्सीजन से अभिक्रिया के कारण होता है। यह विशेष रूप से खाद्य तेल, मेवों और मछली जैसे असंतृप्त वसीय अम्लों से भरपूर खाद्य पदार्थों में आसानी से होता है। आम तौर पर हम जिस विकृतगंधिता की बात करते हैं, वह अधिकतर इसी प्रकार की होती है।
इसके अलावा, सूक्ष्मजीवों से निकलने वाले एंजाइम भी वसा को तोड़ सकते हैं। लेकिन अंततः वे एंजाइम जल-अपघटन या ऑक्सीकरण ही कराते हैं, इसलिए यह भी ऊपर बताए गए दोनों रास्तों से जुड़ा है।
शृंखला अभिक्रिया के रूप में फैलता ऑक्सीकरण

ऑक्सीकरणीय विकृतगंधिता चिंताजनक इसलिए है क्योंकि एक बार शुरू होने पर यह अपने आप फैलती जाती है। इस प्रक्रिया को ‘स्वतः ऑक्सीकरण (Autoxidation)’ कहते हैं और आम तौर पर इसे तीन चरणों में समझाया जाता है।
- आरंभ चरण (Initiation): प्रकाश, गर्मी या धातुओं की सहायता से वसीय अम्ल से हाइड्रोजन अलग हो जाता है और एक अस्थिर ‘मुक्त मूलक’ बनता है।
- प्रसार चरण (Propagation): यह मूलक ऑक्सीजन से जुड़ने के बाद पास के दूसरे वसीय अम्ल से हाइड्रोजन छीन लेता है। इससे परॉक्साइड और एक नया मूलक बनता है तथा अभिक्रिया लगातार आगे बढ़ती रहती है।
- समापन चरण (Termination): मूलक आपस में जुड़ जाते हैं या एंटीऑक्सिडेंट पदार्थ उन्हें पकड़ लेते हैं, जिससे अभिक्रिया शांत होने लगती है।
प्रसार चरण में बने परॉक्साइड लगभग गंधहीन और स्वादहीन होते हैं। लेकिन जब वे और छोटे टुकड़ों में टूटते हैं, तो हेक्सानैल (Hexanal) जैसे छोटे वाष्पशील पदार्थ बनते हैं। यही पदार्थ तेल की बासी दुर्गंध का वास्तविक कारण हैं। इसीलिए खाद्य अनुसंधान में कभी-कभी हेक्सानैल की मात्रा को विकृतगंधिता की程度 का अनुमान लगाने वाले संकेतक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि ऑक्सीकरण शुरू से ही तेज गति से नहीं होता। शुरुआत में एक ‘प्रेरण अवधि’ होती है, जिसमें बाहर से लगभग कोई बदलाव दिखाई नहीं देता। फिर परॉक्साइड एक निश्चित मात्रा तक जमा हो जाने पर अभिक्रिया अचानक तेज हो जाती है। इसी कारण देखने में ठीक लगने वाला तेल भी किसी दिन अचानक बासी दुर्गंध देने लगता है।
विकृतगंधिता को तेज करने वाली परिस्थितियाँ

एक ही तेल की विकृतगंधिता की गति भी उसे रखने की परिस्थितियों के अनुसार बहुत बदल सकती है।
- ऑक्सीजन (Oxygen): हवा के संपर्क में आने वाला सतही क्षेत्र जितना बड़ा होता है, ऑक्सीकरण उतना ही तेज होता है। इसी कारण खुली बोतल में रखा तेल या बारीक कुटे मेवे आसानी से बिगड़ जाते हैं।
- प्रकाश (Light): धूप या फ्लोरोसेंट लैंप का प्रकाश ऑक्सीकरण शुरू करने के लिए ऊर्जा देता है। इसी कारण तेल गहरे रंग की बोतलों में भी बेचा जाता है।
- तापमान (Temperature): तापमान जितना अधिक होता है, अभिक्रिया उतनी ही तेज होती है। इसलिए गैस चूल्हे के पास रखा तेल जल्दी विकृतगंधित होता है।
- धातु (Metal): लोहा और ताँबा जैसी धातुएँ परॉक्साइड को तोड़कर नए मूलक बनाती हैं और ऑक्सीकरण को बढ़ावा देती हैं।
- असंतृप्तता (Unsaturation): जिन वसीय अम्लों में अधिक द्विबंध होते हैं, वे ऑक्सीकरण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। पेरिला का तेल तिल के तेल से जल्दी इसलिए बिगड़ता है क्योंकि उसमें असंतृप्त वसीय अम्ल अल्फा-लिनोलेनिक अम्ल अधिक होता है।
इसके विपरीत, तिल के तेल में सेसामोल (Sesamol) जैसे तिल से प्राप्त प्राकृतिक एंटीऑक्सिडेंट पदार्थ होते हैं, इसलिए वह अपेक्षाकृत लंबे समय तक टिकता है। यही कारण है कि अलग-अलग तेलों के लिए भंडारण के उपयुक्त तरीके अलग होते हैं।
विकृतगंधिता रोकने के रोजमर्रा के उपाय

एक बार विकृतगंधिता हो जाने पर उसे उलटा नहीं जा सकता, इसलिए शुरू से ही उसकी गति धीमी करना सबसे अच्छा उपाय है।
घर पर अपनाए जा सकने वाले भंडारण के तरीके
- वायुरुद्ध भंडारण (Airtight Storage): इस्तेमाल के तुरंत बाद तेल की बोतल का ढक्कन बंद करें और मेवों को छोटे हिस्सों में बाँटकर वायुरुद्ध डिब्बों में रखें।
- ठंडी और अँधेरी जगह (Cool and Dark Place): तेल को ऐसी जगह रखें जहाँ धूप न पड़े और जो आँच से दूर हो। पेरिला के तेल जैसे जल्दी बिगड़ने वाले तेलों को फ्रिज में रखना बेहतर है।
- एंटीऑक्सिडेंट (Antioxidant): खाद्य कंपनियाँ विटामिन E के नाम से जाने जाने वाले टोकोफेरॉल (Tocopherol) जैसे एंटीऑक्सिडेंट पदार्थ मिलाकर मूलकों की शृंखला अभिक्रिया को रोकती हैं।
- इंद्रियों से जाँच (Sensory Check): यदि तेल या मेवों में बासी गंध या कड़वा स्वाद आए, तो उन्हें फेंकना खले भी, फिर भी उन्हें न खाना सुरक्षित है।
विकृतगंधित तेल का केवल स्वाद और सुगंध ही नहीं बिगड़ते, उसमें विटामिन जैसे पोषक तत्व भी कम हो जाते हैं। यह भी माना जाता है कि लंबे समय तक अधिक मात्रा में ऑक्सीकृत तेल खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
विकृतगंधिता दिखाई देने वाली फफूँद के बिना भी चुपचाप बढ़ती रहती है, इसलिए गंध से इसका पता चलने तक यह अक्सर काफी आगे बढ़ चुकी होती है। लेकिन ऑक्सीजन, प्रकाश और गर्मी से दूर रखने की छोटी-सी आदत भी इसकी गति बहुत धीमी कर सकती है।
सोंधे स्वाद का आनंद तभी मिलता है जब वसा ताजा हो। तेल की बोतल का ढक्कन समय पर बंद करना और उसे सही जगह रखना भी ताजे स्वाद तथा स्वास्थ्य की रक्षा करने वाली खानपान की आदतों की पहली सीढ़ी है।