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दोगुनी होती चिप, मूर का नियम (Moore's Law)

आपकी हथेली में रखा स्मार्टफोन कई दशक पहले एक पूरा कमरा घेरने वाले कंप्यूटर से कहीं तेज़ है और उसकी कीमत इतनी कम है कि तुलना करना मुश्किल है। हर साल कंप्यूटर का छोटा, तेज़ और सस्ता होते जाना हमें स्वाभाविक लगता है, लेकिन इस सिलसिले के पीछे एक ऐसा पूर्वानुमान है जिसे अर्धचालक उद्योग आधी सदी से भी अधिक समय से अपना लक्ष्य मानता आया है। यही है ‘मूर का नियम (Moore’s Law)’।

सरल शब्दों में, मूर का नियम एक अनुभवजन्य नियम है जिसके अनुसार ‘एक चिप में समाने वाले ट्रांजिस्टरों की संख्या लगभग हर 2 वर्ष में दोगुनी हो जाती है’। यह प्रकृति के नियमों की तरह अपने आप लागू होने वाला सिद्धांत नहीं, बल्कि तकनीकी विकास की गति के अवलोकन पर आधारित एक पूर्वानुमान और उद्योग द्वारा मिलकर अपनाई गई समयसारिणी जैसा है।

इस सामग्री में मूर के नियम की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि और उसका सटीक अर्थ, इस नियम ने दुनिया को किस तरह बदला, भौतिक सीमाओं से जूझती आज की स्थिति और इस नियम के आगे का रास्ता खोलने वाली नई तकनीकों को आसानी से समझने योग्य रूप में प्रस्तुत किया गया है।


मूर का नियम: अर्धचालक उद्योग की आधी सदी को दिशा देने वाला पूर्वानुमान

मूर का नियम क्या है?

मूर के नियम का इन्फोग्राफिक। इसमें समयरेखा के माध्यम से 1965 में एकीकृत परिपथ के घटकों की संख्या हर साल दोगुनी होने के पूर्वानुमान और 1975 में इसे संशोधित करके लगभग हर 2 वर्ष में दोगुना करने का अनुमान दिखाया गया है। वास्तविक उत्पाद के बजाय एक काल्पनिक उदाहरण से समझाया गया है कि शुरुआती समय में 100 × दस हज़ार ट्रांजिस्टरों की संख्या 2 वर्ष बाद 200 × दस हज़ार, 4 वर्ष बाद 400 × दस हज़ार और 6 वर्ष बाद 800 × दस हज़ार कैसे हो जाती है। इसमें ज़ोर दिया गया है कि ट्रांजिस्टरों की संख्या दोगुनी होना और प्रदर्शन या क्लॉक गति दोगुनी होना अलग बातें हैं, तथा यह न तो प्रकृति का कोई भौतिक नियम है और न ही भविष्य की गारंटी।

मूर के नियम की शुरुआत अर्धचालक कंपनी फेयरचाइल्ड (Fairchild Semiconductor) में अनुसंधान का नेतृत्व कर रहे गॉर्डन मूर (Gordon E. Moore) के उस लेख से हुई, जो 1965 में ‘इलेक्ट्रॉनिक्स (Electronics)’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने देखा कि एक एकीकृत परिपथ में रखे जा सकने वाले घटकों की संख्या हर साल लगभग दोगुनी होती आई थी और अनुमान लगाया कि अगले 10 वर्षों तक यह सिलसिला जारी रहेगा।

1975 में मूर ने इस गति का अनुमान संशोधित करके ‘हर 2 वर्ष में दोगुना’ कर दिया और बाद में यही कथन व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुआ। माना जाता है कि ‘मूर का नियम’ नाम स्वयं मूर ने नहीं, बल्कि अभियंता कार्वर मीड (Carver Mead) ने दिया था। मूर ने 1968 में रॉबर्ट नॉयस (Robert Noyce) के साथ इंटेल (Intel) की स्थापना की और इस पूर्वानुमान को स्वयं साबित करने की राह पर चल पड़े।

  • ट्रांजिस्टर (Transistor): विद्युत संकेतों को चालू और बंद करने वाला एक अत्यंत छोटा स्विच, जो कंप्यूटर की गणना की सबसे बुनियादी इकाई है।
  • एकीकृत परिपथ (Integrated Circuit): ऐसा घटक जिसमें नाखून जितने छोटे सिलिकॉन के टुकड़े पर बहुत सारे ट्रांजिस्टर और तारों के जोड़ एक साथ उकेरे जाते हैं।
  • एकीकरण घनत्व (Density): यह बताता है कि समान क्षेत्रफल में कितने ट्रांजिस्टर समाए हुए हैं।

मूर के नियम ने दुनिया को कैसे बदला

हर 2 वर्ष में दोगुना होने की गति शुरू में बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन समय बीतने पर यह ऐसा अंतर पैदा करती है जिसकी कल्पना करना मुश्किल है। ऐसा इसलिए है क्योंकि 20 वर्षों में यह लगभग 1,000 गुना और 40 वर्षों में लगभग 100 × दस हज़ार गुना हो जाती है।

(1) प्रदर्शन में जबरदस्त सुधार (Performance)
1971 में इंटेल द्वारा पेश किए गए पहले माइक्रोप्रोसेसर 4004 में लगभग 2,300 ट्रांजिस्टर थे। आज के उच्च प्रदर्शन वाले चिपों में कई दसियों अरब ट्रांजिस्टर होते हैं और वे उसी अनुपात में जटिल गणनाएँ पल भर में कर लेते हैं।

(2) कीमत में गिरावट (Cost)
समान आकार के सिलिकॉन में जितने अधिक ट्रांजिस्टर रखे जाते हैं, प्रत्येक ट्रांजिस्टर की कीमत उतनी ही कम होती जाती है। इसी की बदौलत, कभी केवल प्रयोगशालाओं और बड़ी कंपनियों में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटर घरों और जेबों तक पहुँच गए।

(3) उपकरणों का लघुकरण (Miniaturization)
घटकों का आकार छोटा होने के साथ पर्सनल कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन और स्मार्टवॉच जैसे लगातार छोटे होते उपकरण एक के बाद एक सामने आए।

(4) उद्योग की समयसारिणी (Roadmap)
अर्धचालक कंपनियों ने मूर के नियम को लक्ष्य बनाकर अनुसंधान योजनाएँ और निवेश की समयसारिणियाँ तैयार कीं। कुछ आकलनों के अनुसार, पूर्वानुमान के लक्ष्य बन जाने से ऐसा प्रभाव पैदा हुआ जिसमें उद्योग ने अपने प्रयासों से ही इस नियम को सच बनाए रखा।


भौतिक सीमाओं के करीब पहुँचता नियम

आधी सदी से भी अधिक समय तक जारी रहने वाले मूर के नियम की गति 2000 के दशक के मध्य से स्पष्ट रूप से धीमी होने लगी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ट्रांजिस्टरों का आकार घटकर कुछ दर्जन परमाणुओं के स्तर तक पहुँच गया और उनका आकार और छोटा करना लगातार कठिन और महँगा होता गया।

  • गर्मी की समस्या (Heat): ‘डेनार्ड स्केलिंग (Dennard Scaling)’ के अनुसार ट्रांजिस्टरों का आकार घटने के साथ बिजली की खपत भी घटती है। 2000 के दशक के मध्य के आसपास यह संबंध टूटने लगा, जिससे संचालन की गति लगातार बढ़ाने पर पैदा होने वाली गर्मी को सँभालना कठिन हो गया।
  • क्वांटम टनलिंग (Quantum Tunneling): जब विद्युतरोधी परत बहुत पतली हो जाती है, तो इलेक्ट्रॉन अवरोध को पार करके रिसने लगते हैं, जिससे स्विच ठीक से बंद नहीं हो पाता।
  • लागत में वृद्धि (Cost): अधिक सूक्ष्म परिपथ उकेरने के लिए अत्यधिक पराबैंगनी (EUV) एक्सपोज़र उपकरण जैसी बेहद महँगी मशीनों की आवश्यकता होती है, जिससे एक कारखाना बनाने की लागत बहुत बढ़ गई है।

इसी कारण एक चिप की गति बढ़ाने के बजाय कई कोर साथ-साथ रखने वाली मल्टी-कोर (Multi-core) पद्धति का व्यापक उपयोग होने लगा।


मूर के नियम से आगे का रास्ता खोलती तकनीकें

आकार घटाना कठिन होने पर उद्योग प्रदर्शन सुधारने के दूसरे रास्ते खोज रहा है। अब विकास को केवल परिपथों को छोटा बनाकर ही नहीं, बल्कि उन्हें परतों में रखकर, हिस्सों में बाँटकर और विशेष कार्यों के अनुकूल बनाकर आगे बढ़ाने का रुझान है।

  • 3-आयामी स्तरण (3D Stacking): परिपथों को एक समतल पर फैलाने के बजाय ऊपर की ओर परत-दर-परत रखा जाता है, ताकि समान क्षेत्रफल में अधिक अवयव समा सकें।
  • चिपलेट (Chiplet): एक बड़ी चिप के बजाय कार्यों के अनुसार बाँटी गई छोटी चिपों को एक साथ जोड़ा जाता है, जिससे उन्हें बनाना और अलग-अलग संयोजनों में जोड़ना आसान होता है।
  • विशेषीकृत चिप (Specialized Chip): कृत्रिम बुद्धिमत्ता की गणनाओं के अनुकूल GPU या NPU जैसे किसी विशेष कार्य के लिए अनुकूलित चिपों से दक्षता बढ़ाई जाती है।
  • नई सामग्रियाँ और संरचनाएँ (New Materials): ट्रांजिस्टरों का आकार बदलकर या सिलिकॉन की जगह लेने वाली सामग्रियों पर शोध करके सीमाओं तक पहुँचने में देरी करने का प्रयास किया जाता है।
मोर दैन मूर (More than Moore)

ट्रांजिस्टरों की संख्या बढ़ाने की होड़ से आगे बढ़कर सेंसर, संचार और विद्युत शक्ति जैसे विभिन्न कार्यों को एक साथ जोड़कर उपयोगिता बढ़ाने के रुझान को ‘मोर दैन मूर’ कहा जाता है।


मूर का नियम ब्रह्मांड का कोई नियम नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के अवलोकन से शुरू हुआ पूर्वानुमान था, फिर भी आधी सदी तक अनगिनत लोगों ने उसे वास्तविकता बनाया। नतीजतन, आज हम अपनी हथेली में ऐसी गणना क्षमता लेकर चलते हैं जिसका एक पीढ़ी पहले सपना देखना भी कठिन था।

आज इस्तेमाल किए जा रहे स्मार्टफोन और लैपटॉप में समाए इस लंबे इतिहास को कभी याद करके देखिए। छोटे-छोटे सुधार लगातार जुड़ते रहें तो दुनिया बदल सकते हैं—इस बात को समझना ही तकनीक के भविष्य को देखने की दिशा में पहला कदम है।

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