हवाई अड्डे के संकेतपट्ट पर शौचालय या निकास खोजते समय, या अख़बार के किसी लेख में मानव आकृति वाले कई चिह्नों की कतार वाला आलेख देखते समय, हम लगभग बिना कुछ पढ़े ही उसका अर्थ समझ जाते हैं। जिस देश की भाषा हमें नहीं आती, वहाँ भी एक चित्र की मदद से रास्ता खोज लेना आज एक सामान्य बात लगता है।
सरल चित्र संकेतों से जानकारी पहुँचाने की इस पद्धति की एक स्पष्ट शुरुआत है। लगभग 100 वर्ष पहले ऑस्ट्रिया के वियना शहर में एक दार्शनिक और अर्थशास्त्री ने पहल की कि कठिन सांख्यिकीय संख्याओं को चित्रों में बदला जाए, ताकि मज़दूर और बच्चे भी उन्हें एक नज़र में समझ सकें। बाद में इस पद्धति को ‘आइसोटाइप (Isotype)’ नाम मिला।
इस सामग्री में हम क्रम से वियना के उस संग्रहालय की कहानी जानेंगे जहाँ आइसोटाइप का जन्म हुआ, चित्रों को गिनकर पढ़ने के उसके मुख्य नियम समझेंगे, उसे मिलकर बनाने वाले लोगों से परिचित होंगे और आज के इन्फोग्राफिक्स तथा चित्र संकेतों पर उसके प्रभाव को देखेंगे।

संख्याओं को चित्रों के माध्यम से पढ़ने की भाषा
नॉयराथ और वियना का सामाजिक एवं आर्थिक संग्रहालय

आइसोटाइप की शुरुआती परिकल्पना ऑस्ट्रिया के ओटो नॉयराथ (Otto Neurath) ने की थी। वे विज्ञान के दार्शनिकों के समूह ‘वियना मंडल’ का नेतृत्व करने वाले विद्वान और सांख्यिकी तथा अर्थव्यवस्था का अध्ययन करने वाले सामाजिक वैज्ञानिक थे।
(1) ख़ज़ाने के भंडार के बजाय सीखने का संग्रहालय
1925 में नॉयराथ ने वियना नगर के सहयोग से सामाजिक एवं आर्थिक संग्रहालय खोला। वे इसे दुर्लभ पुरावशेष जमा करने की जगह के बजाय ऐसी जगह बनाना चाहते थे, जहाँ नागरिक अपने शहर के आवास, स्वास्थ्य और श्रम की परिस्थितियों के बारे में सीख सकें।
(2) निर्जीव आँकड़ों में जान डालना
नॉयराथ के अनुसार, संख्याओं से भरी तालिकाएँ आम नागरिकों के लिए ‘निर्जीव आँकड़े’ थीं। इसलिए संग्रहालय ने प्रदर्शनी के लिए चित्रात्मक आलेखों के कई सेट छपवाए और उनका उपयोग स्थायी तथा भ्रमणशील, दोनों तरह की प्रदर्शनियों में किया, ताकि लोग आँकड़ों को देखकर याद रख सकें।
(3) शब्द बाँटते हैं, चित्र जोड़ते हैं
अनेक भाषाएँ बोलने वाले लोगों के शहर वियना में नॉयराथ ने अपने कार्यालय की दीवार पर यह वाक्य टाँग रखा था: “शब्द बाँटते हैं, चित्र जोड़ते हैं।” शुरुआत में इस पद्धति को ‘चित्रात्मक सांख्यिकी की वियना पद्धति (Vienna Method of Pictorial Statistics)’ कहा जाता था।
आकार के बजाय गिनती से दिखाने का नियम

आइसोटाइप का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि अधिक मात्रा को बड़ा चित्र बनाकर नहीं दिखाया जाता। इसके बजाय समान आकार के संकेत को बार-बार दोहराकर कतार में रखा जाता है। इसी आधार पर नॉयराथ ने कुछ सिद्धांत बनाए।
- समान आकार की पुनरावृत्ति (Serial Repetition): यदि एक मानव आकृति को 100 × दस हज़ार लोगों के बराबर माना जाए, तो 300 × दस हज़ार लोगों को उसी मानव संकेत की तीन आकृतियों से दिखाया जाता है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें एक-एक करके गिना जा सके।
- आकार की तुलना का भ्रम (Size Comparison): संकेत का आकार दोगुना करने पर यह समझना कठिन हो जाता है कि उसकी ऊँचाई की तुलना की जाए या क्षेत्रफल की, इसलिए आकार बदलने की पद्धति से बचा जाता है।
- परिप्रेक्ष्य रहित समतल चित्र संकेत (Flat Pictogram): दूर या पास होने का प्रभाव जोड़ने से एक ही संकेत अलग दिख सकता है, इसलिए संकेत लगभग हमेशा सामने या बगल से दिखने वाली समतल छायाकृतियों के रूप में बनाए जाते हैं।
- सहायक भाषा (Helping Language): आइसोटाइप को शब्दों की जगह लेने वाली भाषा के रूप में नहीं, बल्कि छोटे पाठ के साथ इस्तेमाल होने वाले ऐसे साधन के रूप में बनाया गया था, जो समझने में मदद करे।
नॉयराथ ने इन नियमों को 1936 की अपनी पुस्तक ‘अंतरराष्ट्रीय चित्र भाषा (International Picture Language)’ में संकलित किया। संग्रहालय ने यह कथन अपना ध्येय बनाया: “सटीक संख्याएँ भूल जाने से बेहतर है सरल चित्र याद रखना।”
इसे मिलकर बनाने वाले लोग

आइसोटाइप किसी एक व्यक्ति का आविष्कार नहीं था। शुरुआत से ही यह कई लोगों के तालमेल से किए गए सामूहिक काम का परिणाम था। यानी इसमें पहले से ही आज की डिज़ाइन कंपनियों जैसी कार्यविभाजन की व्यवस्था मौजूद थी।
(1) संकेतों को तराशने वाले कलाकार, गेर्ड आर्न्त्स
जर्मनी के छापाकलाकार गेर्ड आर्न्त्स (Gerd Arntz) की सरल और प्रभावशाली काष्ठछाप शैली ने नॉयराथ का ध्यान खींचा। वे 1929 से संग्रहालय में काम करने लगे। अपने जीवन में उन्होंने मनुष्य, कारख़ाने, जहाज़ और अनाज जैसे लगभग 4,000 संकेत डिज़ाइन किए।
(2) आँकड़ों को चित्रों में बदलने वाली रूपांतरण विशेषज्ञ, मारी राइडेमाइस्टर
जटिल सांख्यिकीय सामग्री को पढ़कर यह रूपरेखा तैयार करने के काम को ‘रूपांतरण (Transformation)’ कहा जाता था कि उसे किन चित्रों से दिखाया जाए। यह काम सँभालने वाली मारी राइडेमाइस्टर (Marie Reidemeister) ने बाद में नॉयराथ से विवाह किया और मारी नॉयराथ कहलाने लगीं।
(3) अंतरराष्ट्रीय प्रणाली का नया नाम
1930 में टीम ने ‘समाज और अर्थव्यवस्था (Gesellschaft und Wirtschaft)’ नामक एक बड़ा चित्रात्मक संकलन प्रकाशित किया, जिसमें चित्रात्मक आँकड़ों के 100 पट्ट शामिल थे। लगभग 1935 में इसे ‘टाइपोग्राफिक चित्र शिक्षा की अंतरराष्ट्रीय प्रणाली (International System of Typographic Picture Education)’ के शुरुआती अक्षरों से बना आइसोटाइप नाम मिला।
निर्वासन और आज के इन्फोग्राफिक्स

आइसोटाइप को विकसित होने के लिए शांत वातावरण नहीं मिला। राजनीतिक उथल-पुथल से बचने के लिए एक देश से दूसरे देश जाते हुए वह दुनिया के विभिन्न हिस्सों में और भी फैलता गया।
(1) वियना से हेग, फिर ब्रिटेन
1934 में ऑस्ट्रिया में गृहयुद्ध छिड़ने और फ़ासीवाद का प्रभाव बढ़ने पर संग्रहालय बंद हो गया और ये तीनों नीदरलैंड के हेग चले गए। 1940 में जर्मन सेना ने नीदरलैंड पर आक्रमण किया, तो नॉयराथ और मारी एक छोटी नाव से ब्रिटेन पहुँचे और 1942 में आइसोटाइप संस्थान की स्थापना की।
(2) मारी नॉयराथ ने काम जारी रखा
नॉयराथ का निधन 1945 में हो गया, लेकिन मारी नॉयराथ ने आइसोटाइप का उपयोग करके बच्चों के लिए विज्ञान की पुस्तकें प्रकाशित कीं और 1950 के दशक में पश्चिमी नाइजीरिया के लिए चुनाव तथा नागरिक शिक्षा की सामग्री बनाकर काम जारी रखा। संस्थान की सामग्री 1971 में ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग को दान कर दी गई, जहाँ वह आज भी सुरक्षित है।
(3) हमारे आसपास का आइसोटाइप
माना जाता है कि मानव आकृति वाले चिह्नों की कतारों से जनसंख्या या अनुपात दिखाने वाले आज के इन्फोग्राफिक्स और हवाई अड्डों तथा खेल के मैदानों में इस्तेमाल होने वाले अंतरराष्ट्रीय चित्र संकेतों पर आइसोटाइप का गहरा प्रभाव है। पढ़ना न जानने वाले लोगों को भी जानकारी से वंचित न रहने देने का विचार आज की दृश्य भाषा में आगे बढ़ा है।
आइसोटाइप कठिन संख्याओं को केवल विशेषज्ञों तक सीमित रखने के बजाय सभी नागरिकों की पहुँच में लाने का प्रयास था। समान आकार के छोटे चित्रों को एक-एक करके कतार में रखने की यह सरल विधि 100 वर्ष बाद भी दुनिया भर के संकेतपट्टों और आलेखों में जीवित है।
जानकारी को इस तरह चित्रित करना कि देखने वाला कोई भी हो, उसे एक नज़र में समझ सके—यही संचार को आकार देने वाले डिज़ाइनशास्त्र का पहला कदम है।