छह बिंदु दो-दो करके पास रखे हों, तो हमें छह अलग बिंदुओं के बजाय तीन जोड़ियाँ दिखाई देती हैं। जगह-जगह टूटी रेखा से बना वृत्त भी हमें बिना किसी हिचक के वृत्त ही लगता है। आँख अलग-अलग टुकड़ों से पहले पूरे आकार को पकड़ लेती है। प्रत्यक्षण के ऐसे नियमों को व्यवस्थित रूप देने वाले सिद्धांत ही ‘गेस्टाल्ट के सिद्धांत (Gestalt Principles of Perception)’ हैं।
सरल शब्दों में, गेस्टाल्ट के सिद्धांत का अर्थ है ‘बिखरे हुए दृश्य तत्वों को अलग-अलग देखने के बजाय, निकटता, समानता और निरंतरता जैसे संकेतों के आधार पर समूह बनाकर एक इकाई के रूप में देखने की मानवीय प्रवृत्ति’। गेस्टाल्ट (Gestalt) एक जर्मन शब्द है, जिसका अर्थ ‘रूप’ या ‘संरचना’ है। आज ये सिद्धांत स्क्रीन और मुद्रित पृष्ठों को व्यवस्थित करने वाले डिज़ाइन का बुनियादी व्याकरण बन गए हैं।
इस सामग्री में हम क्रम से गेस्टाल्ट के सिद्धांतों की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि और प्रमुख सिद्धांतों, लोगो और स्क्रीन में उनके उपयोग के उदाहरणों तथा डिज़ाइनरों के लिए ध्यान देने योग्य बातों पर नज़र डालेंगे।

स्क्रीन की वह व्यवस्था जिसे आँख पहले ही व्यवस्थित कर लेती है
गेस्टाल्ट के सिद्धांत क्या हैं?

गेस्टाल्ट मनोविज्ञान की स्थापना 20वीं सदी की शुरुआत में जर्मनी में मैक्स वर्टहाइमर (Max Wertheimer), कुर्ट कोफ्का (Kurt Koffka) और वोल्फगांग कोहलर (Wolfgang Köhler) ने की थी। इसकी शुरुआत वर्टहाइमर द्वारा 1912 में प्रकाशित एक प्रयोग से हुई। बारी-बारी से जलने वाली दो प्रकाश किरणों को देखने वालों को ऐसा लगा मानो प्रकाश एक ओर से दूसरी ओर जा रहा हो, जबकि वास्तव में कोई वस्तु हिल नहीं रही थी। उन्होंने इस घटना को फाई परिघटना (Phi Phenomenon) कहा।
उस समय मनोविज्ञान की मुख्यधारा अनुभव को संवेदना की सबसे छोटी इकाइयों में बाँटकर उसका विश्लेषण करना चाहती थी। इसके विपरीत, गेस्टाल्ट के विद्वानों का तर्क था कि पहले समग्र का प्रत्यक्षण होता है और भागों का अर्थ उसी समग्र के भीतर निर्धारित होता है। कोफ्का ने इसे इस तरह व्यक्त किया: “समग्र अपने भागों के योग से भिन्न कुछ है।”
1923 में वर्टहाइमर ने एक शोधपत्र में उन नियमों को व्यवस्थित किया जिनके अनुसार लोग प्रत्यक्षण के तत्वों को समूहों में बाँधते हैं। यही आज के गेस्टाल्ट सिद्धांतों की जड़ बने। सभी सिद्धांतों के आधार में प्रेग्नान्ज़ का नियम (Law of Prägnanz) है। इसका अर्थ है कि लोग दिखाई देने वाली चीज़ों को यथासंभव सरल, नियमित और सुव्यवस्थित रूप में ग्रहण करने की कोशिश करते हैं।
गेस्टाल्ट के 5 प्रमुख नियम

गेस्टाल्ट के सिद्धांतों को कई तरह से व्यवस्थित किया जाता है, लेकिन डिज़ाइन में सबसे अधिक उपयोग होने वाले निम्नलिखित पाँच हैं।
(1) निकटता (Proximity)
पास-पास रखे तत्व अलग-अलग आकार के होने पर भी एक समूह के रूप में दिखाई देते हैं। केवल उनके बीच की दूरी बदलकर भी बताया जा सकता है कि कौन-से तत्व एक समूह का हिस्सा हैं।
(2) समानता (Similarity)
रंग, आकार या माप में मिलते-जुलते तत्व एक ही समूह के रूप में दिखाई देते हैं। एक ही रंग के बटन देखकर अनुमान होता है कि वे एक ही प्रकार के कार्य करते हैं।
(3) निरंतरता (Continuity)
लोग अचानक मुड़ने वाले रास्ते की तुलना में सहज रूप से आगे बढ़ती रेखा का अनुसरण करना पसंद करते हैं। दो रेखाएँ एक-दूसरे को काटती हों, तब भी हर रेखा एक अखंड रेखा के रूप में दिखाई देती है।
(4) पूर्णता (Closure)
रूपरेखा का कुछ हिस्सा गायब होने पर भी हम मन में उस खाली जगह को भरकर उसे एक पूरी आकृति के रूप में पहचानते हैं।
(5) आकृति और पृष्ठभूमि (Figure-Ground)
आँख स्क्रीन को सामने उभरती आकृति और उसके पीछे बिछी पृष्ठभूमि में बाँटती है। डेनमार्क के मनोवैज्ञानिक एडगर रुबिन (Edgar Rubin) ने लगभग 1915 में ‘रुबिन के फूलदान (Rubin Vase)’ के माध्यम से यह सिद्धांत दिखाया। यह चित्र दो लोगों के चेहरों के पार्श्व रूप जैसा भी दिखाई देता है और सफेद फूलदान जैसा भी।
आसान उदाहरणों से समझें गेस्टाल्ट के सिद्धांत

गेस्टाल्ट के सिद्धांत हमारे रोज़ दिखाई देने वाले लोगो और स्क्रीन में जगह-जगह छिपे हैं।
[उदाहरण] अक्षरों के बीच छिपा तीर: फेडएक्स का लोगो
1994 में लैंडर एसोसिएट्स (Landor Associates) के लिंडन लीडर (Lindon Leader) द्वारा बनाए गए फेडएक्स (FedEx) के लोगो में बड़े अक्षर E और x के बीच की खाली जगह में दाईं ओर इशारा करता एक तीर है। शुरुआत में केवल अक्षर दिखाई देते हैं, लेकिन एक बार तीर दिख जाए तो उसके बाद वह हमेशा नज़र आता है। यह आकृति और पृष्ठभूमि के सिद्धांत का चतुराई से उपयोग करने का उदाहरण है, जिसमें पहले पृष्ठभूमि रही खाली जगह एक आकृति बन जाती है।
- इनपुट फ़ॉर्म की बनावट (Form Layout): हर फ़ील्ड का नाम उसके इनपुट बॉक्स के ठीक ऊपर रखें और अलग-अलग फ़ील्ड के बीच पर्याप्त दूरी छोड़ें, तो निकटता के कारण यह भ्रम नहीं होता कि कौन-सा नाम किस बॉक्स का है।
- नेविगेशन मेन्यू (Navigation Menu): एक ही आकार और रंग वाले मेन्यू आइटम समानता के कारण एक समूह के रूप में दिखाई देते हैं।
- क्षैतिज स्क्रॉल सूची (Horizontal Scroll List): सबसे दाईं ओर का कार्ड जानबूझकर आधा कटा हुआ दिखाने पर लोग निरंतरता और पूर्णता के आधार पर अनुमान लगाते हैं कि आगे और कार्ड हैं तथा स्क्रीन पर स्वाइप करके देखते हैं।
गेस्टाल्ट के सिद्धांतों का उपयोग करते समय ध्यान देने योग्य बातें

गेस्टाल्ट के सिद्धांत प्रभावशाली हैं, लेकिन हर समस्या का समाधान देने वाला सूत्र नहीं हैं। उनकी आलोचना भी हुई कि प्रेग्नान्ज़ जैसी अवधारणाओं को सटीक रूप से परिभाषित करना कठिन है और वे केवल घटनाओं का वर्णन करती हैं, मस्तिष्क के भीतर काम करने वाले सिद्धांतों को नहीं समझातीं। इसलिए बाद में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक स्टीफन पामर (Stephen Palmer) और अन्य शोधकर्ताओं ने साझा क्षेत्र (Common Region) का सिद्धांत जोड़ा, जिसके अनुसार रेखाओं या बॉक्सों से घिरे तत्व एक समूह के रूप में दिखाई देते हैं। इस तरह शोध आगे बढ़ता रहा।
- सिद्धांतों का टकराव (Principle Conflict): पास-पास रखे लेकिन अलग-अलग रंग वाले तत्वों की तरह जब दो सिद्धांत परस्पर विरोधी संकेत देते हैं, तो उपयोगकर्ता तय करने में हिचकता है कि समूह किस आधार पर बनाया जाए। किसी एक समूह के सभी संकेतों को एक ही दिशा में रखें।
- ज़रूरत से अधिक हटाना (Excessive Omission): पूर्णता के सिद्धांत पर भरोसा करके रूपरेखा का बहुत अधिक हिस्सा हटा दिया जाए, तो आकृति पहचानी नहीं जाती। छोटी स्क्रीन पर विशेष सावधानी रखें।
- उपयोगकर्ता परीक्षण (User Testing): डिज़ाइनर को जो समूह स्वाभाविक लगता है, क्या वह उपयोगकर्ता को भी वैसा ही लगता है, यह उसे वास्तव में दिखाकर जाँचना चाहिए।
गेस्टाल्ट के सिद्धांत प्रत्यक्षण के वे नियम हैं जिनके अनुसार मानव आँख बिखरे हुए तत्वों को निकटता, समानता, निरंतरता, पूर्णता तथा आकृति और पृष्ठभूमि के आधार पर समूहों में बाँधकर एक समग्र के रूप में देखती है। लगभग 100 से अधिक वर्ष पहले मनोविज्ञान की प्रयोगशाला में शुरू हुआ यह विचार आज लोगो, वेब स्क्रीन, मानचित्र और सूचना-पट्टों को व्यवस्थित करने का आधार बन गया है।
हर तत्व को अलग-अलग सजाने से पहले यह सोचना कि आँख उन्हें किस तरह समूहों में देखेगी, आसानी से समझ में आने वाला डिज़ाइन बनाने की पहली सीढ़ी है।