विद्यालय का खयाल आते ही सबसे पहले समय-सारणी में लिखे कोरियाई भाषा, गणित और विज्ञान जैसे विषय याद आते हैं। लेकिन विद्यालय में बिताए समय को याद करें, तो हमने बहुत कुछ ऐसा भी सीखा जो पाठ्यपुस्तकों में नहीं था। जैसे कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार करना, हाथ उठाकर बोलना और शिक्षक के हावभाव से उनका मिज़ाज समझना।
शिक्षाशास्त्र में, बिना किसी योजना या प्रत्यक्ष शिक्षण के भी विद्यार्थियों द्वारा विद्यालयी जीवन में स्वाभाविक रूप से सीखी जाने वाली इन बातों को ‘छिपा पाठ्यक्रम (Hidden Curriculum)’ कहा जाता है। अमेरिकी शिक्षाशास्त्री फ़िलिप जैक्सन (Philip W. Jackson) ने 1968 में अपनी पुस्तक ‘कक्षाओं में जीवन (Life in Classrooms)’ के माध्यम से इस शब्द को व्यापक रूप से परिचित कराया।
इस सामग्री में छिपे पाठ्यक्रम के अर्थ और उसकी अवधारणा के उभरने की पृष्ठभूमि से लेकर कक्षा में उसके बनने के तरीकों, इस अवधारणा से जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों और शिक्षकों तथा विद्यालयों द्वारा उसे सँभालने के उपायों तक को आसानी से समझने योग्य रूप में प्रस्तुत किया गया है।
छिपे पाठ्यक्रम की समझ और उपयोग
छिपा पाठ्यक्रम क्या है?


छिपे पाठ्यक्रम से आशय उन मूल्यों, दृष्टिकोणों और व्यवहार संबंधी आदतों से है, जिन्हें विद्यालय ने आधिकारिक दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं किया होता, लेकिन विद्यार्थी वास्तव में सीखते हैं। यदि समय-सारणी और पाठ्यपुस्तकें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली सीख हैं, तो छिपा पाठ्यक्रम विद्यालय के नियमों, वातावरण और आपसी संबंधों में छिपी सीख है।
- औपचारिक पाठ्यक्रम (Explicit Curriculum): वे विषय और विषयवस्तु जिन्हें देश और विद्यालय योजनाबद्ध ढंग से दस्तावेज़ों में निर्धारित करके पढ़ाते हैं। इसे प्रत्यक्ष पाठ्यक्रम भी कहते हैं।
- छिपा पाठ्यक्रम (Hidden Curriculum): वे बातें जिन्हें सिखाने का इरादा नहीं होता, फिर भी विद्यार्थी विद्यालयी जीवन के माध्यम से सीखते हैं।
- शून्य पाठ्यक्रम (Null Curriculum): इलियट आइज़नर (Elliot W. Eisner) द्वारा 1979 में प्रस्तुत यह अवधारणा उस विषयवस्तु को दर्शाती है जिसे विद्यालय पढ़ाने से छोड़ देता है और जिसके कारण विद्यार्थी उसे सीखने का अवसर खो देते हैं।
छिपा पाठ्यक्रम पाठ्यपुस्तकों में शामिल नहीं होता, इसलिए उसे परीक्षा से मापना भी कठिन है। इसी कारण लंबे समय तक शैक्षिक योजनाओं में उस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन विद्यार्थियों के दृष्टिकोण और मूल्यों पर वह औपचारिक पाठ्यक्रम जितनी ही गहरी छाप छोड़ता है।
इस अवधारणा का केंद्रीय विचार यह है कि विद्यालय क्या सिखाना चाहता था, जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण यह भी है कि विद्यार्थी ने वास्तव में क्या सीखा। एक ही पाठ पढ़ाए जाने पर भी कक्षा के वातावरण के अनुसार विद्यार्थियों को मिलने वाली सीख बहुत अलग हो सकती है।
कक्षा में छिपा पाठ्यक्रम कैसे बनता है

जैक्सन ने लंबे समय तक कक्षाओं का अवलोकन किया और पाया कि जिस कक्षा में विद्यार्थी दिन का अधिकांश समय बिताते हैं, उसकी तीन विशेषताएँ होती हैं।
(1) समूह (Crowds)
कक्षा में बहुत से विद्यार्थी एक साथ रहते हैं। वे अनुभव के माध्यम से अपनी बारी का इंतज़ार करना, अपनी बात बाद में कहना और व्यवधान सहना सीखते हैं।
(2) प्रशंसा (Praise)
विद्यार्थियों की बातों और व्यवहार का लगातार मूल्यांकन होता रहता है। वे सीखते हैं कि अंक और प्रशंसा पाने के लिए क्या करना चाहिए, और कभी-कभी यह भी कि अपनी गलतियाँ कैसे छिपानी हैं।
(3) सत्ता (Power)
कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सत्ता का स्पष्ट अंतर होता है। विद्यार्थी प्राधिकार का पालन करना और तय नियमों के भीतर रहकर काम करना सीखते हैं।
अपने विद्यालयों में भी इसके उदाहरण आसानी से मिल जाते हैं। घंटी बजते ही काम रोककर अपनी जगह बैठ जाने की आदत, सही उत्तर जल्दी देने वाले सहपाठी को मान्यता मिलने का माहौल और अंकों के क्रम के अनुसार अलग-अलग अपेक्षाएँ रखना—ये सब विद्यार्थियों को कुछ न कुछ सिखाते हैं।
उसी वर्ष समाजशास्त्री रॉबर्ट ड्रीबेन (Robert Dreeben) ने भी अपनी पुस्तक ‘विद्यालय में क्या सीखा जाता है (On What Is Learned in School)’ में समझाया कि विद्यार्थी विद्यालय के माध्यम से स्वतंत्रता, उपलब्धि, सार्वभौमिकता और विशिष्टता जैसे सामाजिक मानदंड सीखते हैं।
छिपे पाठ्यक्रम को देखने के विभिन्न दृष्टिकोण

छिपे पाठ्यक्रम को एक शब्द में अच्छा या बुरा कहना कठिन है। अलग-अलग विद्वान इसे अलग-अलग नज़रिए से देखते हैं।
ड्रीबेन की तरह कुछ लोग इसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानते हैं, जिसके माध्यम से विद्यालय विद्यार्थियों को समाज के अनुकूल बनाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि समय का पालन करना और नियमों के अनुसार चलना सामाजिक जीवन में भी आवश्यक क्षमताएँ हैं।
दूसरी ओर, अर्थशास्त्री सैमुअल बोल्स (Samuel Bowles) और हर्बर्ट गिंटिस (Herbert Gintis) ने 1976 में अपनी पुस्तक ‘पूँजीवादी अमेरिका में विद्यालयी शिक्षा (Schooling in Capitalist America)’ में अनुरूपता सिद्धांत (Correspondence Principle) प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार विद्यालय का पदानुक्रम और अनुशासन कार्यस्थल के पदानुक्रम से मिलता-जुलता है। यह इस बात की आलोचना है कि विद्यालय विद्यार्थियों को मौजूदा सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ढलने का अभ्यस्त बनाता है।
यह भी कहा जाता है कि एक ही कक्षा में होने पर भी हर विद्यार्थी की सीख अलग हो सकती है। हमेशा प्रशंसा पाने वाला विद्यार्थी आत्मविश्वास सीखता है, जबकि हमेशा पीछे धकेला जाने वाला विद्यार्थी आसानी से यह धारणा सीख सकता है कि वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकता।
[दृष्टिकोण के मुख्य बिंदु]
- प्रकार्यवादी दृष्टिकोण: समाज के लिए आवश्यक मानदंडों और आदतों को सीखने की प्रक्रिया
- आलोचनात्मक दृष्टिकोण: असमान व्यवस्था को स्वाभाविक मानकर स्वीकार करना सिखाने की प्रक्रिया
- साझा विचार: विद्यालय केवल विषयों का ज्ञान देने की जगह नहीं है
- शेष प्रश्न: विद्यार्थी क्या सीख रहे हैं?
छिपे पाठ्यक्रम को सँभालने के 4 तरीके

छिपे पाठ्यक्रम को समाप्त नहीं किया जा सकता; उसे पहचानना और सँवारना आवश्यक है।
(1) कक्षा को नई नज़र से देखें
बैठने की व्यवस्था, प्रस्तुति देने का क्रम और प्रशंसा करने का तरीका जैसी सामान्य मान ली गई स्थितियाँ विद्यार्थियों को क्या संदेश देती हैं, इस पर ध्यान दें।
(2) कथनी और करनी में मेल रखें
यदि सम्मान सिखाते हुए शिक्षक विद्यार्थी की बात बीच में काट देते हैं, तो विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक से अधिक शिक्षक के व्यवहार से सीखता है। पढ़ाई जाने वाली बातों और विद्यालय के व्यवहार में असंगति न होने दें।
(3) मिलकर विद्यालय की संस्कृति बनाएँ
नियम तय करते समय विद्यार्थियों की बात सुनें और ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ गलतियों पर डाँटने के बजाय फिर से प्रयास करने का अवसर दिया जाए।
(4) छूटी हुई विषयवस्तु पर भी विचार करें
क्या नहीं पढ़ाया गया, इससे भी विद्यार्थियों को एक संदेश मिलता है। शून्य पाठ्यक्रम के दृष्टिकोण से शैक्षिक विषयवस्तु की समीक्षा करें।
अंततः छिपा पाठ्यक्रम हमें यह याद दिलाता है कि विद्यालय का हर क्षण एक पाठ है। विद्यार्थी श्यामपट्ट पर लिखी बातों की तुलना में कक्षा में हुए अनुभवों को अधिक समय तक याद रखते हैं।
कक्षा में प्रवाहित हो रहे अदृश्य संदेशों को पहले पहचानना ही विद्यार्थियों के समग्र विकास की शिक्षा की ओर पहला कदम है।