आपने शायद अनुभव किया होगा कि दूर से आती एम्बुलेंस जब आपके सामने से गुजरती है, तो उसके सायरन की ‘पीं-पों’ आवाज़ अचानक नीची और खिंची हुई सुनाई देने लगती है। एम्बुलेंस ने सायरन का सुर बदला भी नहीं, फिर हमारे कानों को उसकी आवाज़ बिल्कुल अलग क्यों सुनाई देती है? इस परिचित घटना के पीछे छिपा भौतिक नियम ही ‘डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect)’ है।
सरल शब्दों में, डॉप्लर प्रभाव का अर्थ है ‘तरंग उत्पन्न करने वाली वस्तु या उसे प्रेक्षित करने वाले व्यक्ति के गतिमान होने पर प्रेक्षित तरंग की आवृत्ति बदलने की घटना’। यह सिद्धांत ध्वनि के साथ-साथ प्रकाश और रेडियो तरंगों पर भी समान रूप से लागू होता है। इसलिए इसका व्यापक उपयोग तेज़ रफ़्तार पकड़ने वाले उपकरणों से लेकर मौसम के पूर्वानुमान, अस्पतालों की जाँचों और ब्रह्मांड के विस्तार का पता लगाने वाले खगोल विज्ञान तक में होता है।
इस सामग्री में डॉप्लर प्रभाव की मूल अवधारणा, उसकी कार्यप्रणाली, प्रकाश में दिखाई देने वाले लाल विस्थापन और नीले विस्थापन तथा रोज़मर्रा के जीवन में उसके उपयोगों को आसानी से समझने योग्य ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
डॉप्लर प्रभाव का सिद्धांत और उपयोग
डॉप्लर प्रभाव क्या है?


डॉप्लर प्रभाव का नाम ऑस्ट्रिया के भौतिक विज्ञानी क्रिश्चियन डॉप्लर (Christian Doppler) के नाम पर पड़ा है। उन्होंने 1842 में प्रकाशित एक शोधपत्र में यह परिकल्पना प्रस्तुत की थी कि ‘यदि कोई तारा हमारे पास आए या हमसे दूर जाए, तो उसके प्रकाश का रंग अलग दिखाई देगा’।
इस परिकल्पना की पुष्टि 3 वर्ष बाद पहले ध्वनि के माध्यम से हुई। 1845 में नीदरलैंड के वैज्ञानिक बाइज़ बैलट (Buys Ballot) ने चलती ट्रेन में तुरही वादकों को बैठाकर लगातार एक ही सुर बजाने को कहा और पटरी के पास पूर्ण स्वरबोध वाले संगीतकारों से सुर की ऊँचाई पहचानने को कहा। परिणाम अनुमान के अनुरूप थे। ट्रेन के पास आते समय सुर ऊँचा और दूर जाते समय नीचा सुनाई दिया।
- पास आते समय (Approaching): तरंगों के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे सुर ऊँचा सुनाई देता है।
- दूर जाते समय (Receding): तरंगों के बीच की दूरी बढ़ जाती है, जिससे सुर नीचा सुनाई देता है।
- स्थिर रहने पर (Stationary): ध्वनि अपनी मूल आवृत्ति पर ही सुनाई देती है।
सुर की ऊँचाई बदलने की मुख्य कार्यप्रणाली

ध्वनि हवा के माध्यम से फैलने वाली तरंग है। ‘आवृत्ति (Hz)’ बताती है कि 1 सेकंड में कितने कंपन होते हैं, और आवृत्ति जितनी अधिक होती है, सुर उतना ही ऊँचा सुनाई देता है। डॉप्लर प्रभाव की मुख्य बात यह है कि ध्वनि स्रोत के चलने पर प्रेक्षक तक पहुँचने वाली आवृत्ति बदल जाती है।
(1) आगे की ओर तरंगें संकुचित होती हैं
जब ध्वनि स्रोत आगे बढ़ते हुए आवाज़ पैदा करता है, तो वह पहले भेजी गई तरंग का पीछा करते हुए अगली तरंग छोड़ता है। परिणामस्वरूप, गति की दिशा में आगे की तरंगें छोटी लहरियों की तरह पास-पास हो जाती हैं और पीछे की तरंगें दूर-दूर फैल जाती हैं।
(2) तरंगदैर्घ्य जितना छोटा होगा, सुर उतना ऊँचा होगा
समान वायु में ध्वनि की चाल लगभग 340 m/s पर स्थिर रहती है। इसलिए तरंगों के बीच की दूरी यानी तरंगदैर्घ्य घटने पर 1 सेकंड में कान तक पहुँचने वाली तरंगों की संख्या बढ़ जाती है। यही हमें ऊँचे सुर के रूप में सुनाई देता है।
(3) संख्याओं से समझें एक उदाहरण
मान लीजिए कि 700 Hz का सायरन बजाती हुई एम्बुलेंस 72 किलोमीटर प्रति घंटे (20 मीटर प्रति सेकंड) की चाल से चल रही है। पास आते समय उसकी आवाज़ लगभग 744 Hz और दूर जाते समय लगभग 661 Hz पर सुनाई देती है। सामने से गुजरते ही आवृत्ति अचानक लगभग 80 Hz या उससे अधिक गिर जाती है।
यदि ध्वनि स्रोत ध्वनि के बराबर चाल (माख 1) से चलता है, तो संकुचित तरंगें एक ही स्थान पर परत-दर-परत जमा होकर एक विशाल आघात तरंग पैदा करती हैं। पराध्वनिक लड़ाकू विमान के आकाश चीरते समय सुनाई देने वाला ज़ोरदार धमाका, जिसे ‘सोनिक बूम (Sonic Boom)’ कहते हैं, डॉप्लर प्रभाव का ही चरम रूप है।
प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव: लाल विस्थापन और नीला विस्थापन

जैसा कि डॉप्लर ने शुरू में कल्पना की थी, प्रकाश भी तरंग है, इसलिए उस पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। हालाँकि, प्रकाश की चाल लगभग 30 × दस हज़ार किलोमीटर प्रति सेकंड होती है, इसलिए रोज़मर्रा के जीवन में हम इस बदलाव को महसूस नहीं कर सकते। यह तारों और आकाशगंगाओं जैसे अत्यधिक तेज़ गति से चलने वाले खगोलीय पिंडों में स्पष्ट रूप से देखा जाता है।
- नीला विस्थापन (Blueshift): खगोलीय पिंड के पास आने पर प्रकाश का तरंगदैर्घ्य घटता है और वर्णक्रम नीले रंग की ओर खिसक जाता है।
- लाल विस्थापन (Redshift): खगोलीय पिंड के दूर जाने पर प्रकाश का तरंगदैर्घ्य बढ़ता है और वर्णक्रम लाल रंग की ओर खिसक जाता है।
1929 में अमेरिकी खगोलशास्त्री एडविन हबल (Edwin Hubble) ने पता लगाया कि आकाशगंगा जितनी दूर होती है, उसका लाल विस्थापन उतना ही अधिक होता है। यह इस बात का निर्णायक प्रमाण बना कि आकाशगंगाएँ हमसे दूर जा रही हैं और पूरा ब्रह्मांड फैल रहा है। सटीक रूप से कहें तो यह स्वयं अंतरिक्ष के फैलने से उत्पन्न ‘ब्रह्मांडीय लाल विस्थापन’ है, लेकिन इसकी व्याख्या का शुरुआती आधार डॉप्लर प्रभाव ही था।
इसके अलावा, 1995 में मिशेल मेयर (Michel Mayor) और दिदिए केलोज़ (Didier Queloz) ने तारों के प्रकाश में होने वाले सूक्ष्म डॉप्लर परिवर्तनों का विश्लेषण करके पहली बार सूर्य जैसे तारे की परिक्रमा करने वाले एक बाह्यग्रह का पता लगाया। इस उपलब्धि के लिए उन्हें 2019 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। उन्होंने ग्रह के कारण तारे के हल्का-सा डगमगाने से प्रकाश में पैदा होने वाले बदलाव तक को पहचान लिया था।
रोज़मर्रा के जीवन में डॉप्लर प्रभाव के उपयोग के 3 उदाहरण

डॉप्लर प्रभाव केवल पाठ्यपुस्तकों का सिद्धांत नहीं है। गतिमान वस्तुओं की ‘चाल’ को दूर से सटीक रूप से मापने के साधन के रूप में इसका उपयोग हमारे जीवन में जगह-जगह होता है।
[उदाहरण 1] तेज़ रफ़्तार पकड़ने वाली स्पीड गन
पुलिस की स्पीड गन चलती कार की ओर रेडियो तरंगें भेजती है और फिर मापती है कि परावर्तित होकर लौटी तरंगों की आवृत्ति कितनी बदली है। आवृत्ति में जितना अधिक बदलाव होगा, कार उतनी ही तेज़ चल रही होगी। इसलिए इसकी चाल की गणना पल भर में की जा सकती है।
[उदाहरण 2] मौसम संबंधी डॉप्लर रडार
मौसम रडार बादलों में मौजूद बारिश की बूँदों से परावर्तित रेडियो तरंगों का विश्लेषण करके पता लगाता है कि वर्षा वाले बादल किस दिशा में और कितनी तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इसकी मदद से तूफ़ान के घूर्णन या किसी क्षेत्र में भारी वर्षा के आने का पहले से पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
[उदाहरण 3] चिकित्सा में डॉप्लर अल्ट्रासाउंड
अस्पतालों में डॉप्लर अल्ट्रासाउंड जाँच के दौरान रक्त वाहिकाओं में बहने वाली लाल रक्त कोशिकाओं पर पराश्रव्य तरंगें भेजकर रक्त के प्रवाह और उसकी चाल को मापा जाता है। स्क्रीन पर आमतौर पर जाँच प्रोब की ओर आने वाले रक्त प्रवाह को लाल और उससे दूर जाने वाले रक्त प्रवाह को नीले रंग में दिखाया जाता है। इससे रक्त वाहिकाओं में संकुचन या रुकावट वाले स्थानों का पता लगाया जाता है।
डॉप्लर प्रभाव की शुरुआत इस सरल सिद्धांत से होती है कि ‘गति तरंगों को बदल देती है’। लेकिन इसी एक सिद्धांत के सहारे हमने एम्बुलेंस के सायरन को समझा, सड़क पर कारों की चाल मापी, शरीर के भीतर रक्त के प्रवाह को देखा और यह भी पता लगाया कि कई अरब प्रकाश-वर्ष दूर स्थित आकाशगंगाएँ हमसे दूर जा रही हैं।
अगली बार जब किसी सायरन की आवाज़ नीची होती हुई दूर जाए, तो याद कीजिए कि उस आवाज़ में ब्रह्मांड के विस्तार का पता लगाने की कुंजी छिपी है। परिचित घटनाओं के बारे में ‘क्यों?’ पूछना ही दुनिया को विज्ञान की नज़र से समझने की दिशा में सबसे पक्का पहला कदम है।